बेदर्द दिल्ली में तो ज़हरीली सांसों पर भी राजनीति चलती है

Posted by Abhijeet Thakur in Environment, Hindi, Society
December 11, 2017

मुद्दे की जड़ में जाकर समस्या का समाधान ढूंढने की बजाय अगर आपस में सिंह-भिड़ंत का खेल देखना चाहते हैं तो स्वागत है, आप दिल्ली में हैं। जी हां, देश की राजधानी के राजनेता और जनप्रतिनिधी कुछ इस कदर विवश हैं कि तमाम वायदों और दावों के बाद वो आज तक यहां के कूड़े को भी संभाल नहीं सके हैं।

डोमेस्टिक एंड इंडस्ट्रियल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के नाम पर दिल्ली में निगम और पीडब्लूडी के पास बड़े-बड़े ट्रक हैं, जो रोज़ाना पहाड़ से ऊंचे हो चुके खत्तों (लैंडफिल्स) पर कूड़ा उड़ेल आते हैं।

नॉर्थ दिल्ली के भलस्वा और साउथ एमसीडी अंतर्गत आने वाले गाज़ीपुर स्थित इन खत्तों की मियाद दशकों पहले पूरी हो चुकी है, लेकिन देश की राजधानी की सत्ता में काबिज़ हुक्मरान आज तक इनके स्थानांतरण के उपाय नहीं ढूंढ पाए हैं। हां, समय-समय पर स्थानीय लोगों का नेतृत्व करते हुए तमाम राजनीतिक दलों के नेता बारी-बारी से खत्ते के मुद्दे को उठाकर विरोध प्रदर्शनों में अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज कराते रहे हैं।

दिल्ली के एलजी अनिल बैजल भी उपराज्यपाल बनते ही गाड़ियों के काफिले के साथ मुंह पर मास्क लगाए खत्ते के पहाड़ पर चढ़े थे। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रमुख लोगों से मिलकर इस गंभीर समस्या पर उन्होंने बातचीत भी की थी, लेकिन ये कार्यक्रम भी महज औपचारिकता ही साबित हुआ।

आज दिल्ली में प्रदूषण का स्तर खतरनाक की श्रेणी में है और स्थिति को नियंत्रित करने के लिये कागज़ों पर आदेश और निर्देश की झड़ियां बेशक लग रही हों, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट ज़ीरो ही है। निर्माणकार्य पर रोक, खुले में कूड़ा जलाने पर रोक और दिल्ली बॉर्डर से ट्रकों की एंट्री पर रोक जैसे तमाम उपाय भी अगर प्रदूषण के स्तर को नीचे लाने में नाकाफी साबित हुए हैं तो इसकी एकमात्र वजह है ज़मीनी स्तर पर निर्देशों का पालन न होना।

फोटो आभार: getty images

दिल्ली सरकार की तरफ से प्रदूषण नियंत्रण के लिये ऑड-इवन फार्मूला फिर से लागू करने की पैरवी की जाती है, लेकिन 800 करोड़ से ज़्यादा वसूले गए ग्रीन टैक्स के फण्ड को प्रदूषण नियंत्रण करने हेतु किसी भी योजना में खर्च न कर पाने के सवाल पर केजरीवाल सरकार कोई ठोस और संतोषप्रद जवाब नहीं दे पाती। जवाब तो दूर, उच्च न्यायालय ने मौजूदा दिल्ली सरकार के प्रति निराशा जताते हुए ये तक कहा कि केजरीवाल सरकार प्रदूषण नियंत्रण से सम्बंधित कोई योजना तक बनाने में विफल रही है, जो कि दु:खद है।

ग्रीन टैक्स वसूली प्रक्रिया और निविदा आवंटन में तमाम गड़बड़ियों और सवालों के बीच भी यह फंड 800 करोड़ के पार पहुंचा। दिल्ली सरकार इस रेवेन्यू को कई प्रकार की योजनाओं में खर्चकर प्रदूषण नियंत्रण में कुछ रचनात्मक कार्य कर के दिखा सकती थी। साथ ही अगर ग्रीन टैक्स वसूली की प्रणाली में आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाए तो प्रतिदिन लम्बी लाइनों में घंटों खड़े होकर ग्रीन टैक्स की पर्ची कटाने वाले कमर्शियल वाहनों से जो प्रदूषण फैलता है, उसको तो रोका ही जा सकता है।

ऐसी तकनीक आज आसानी से मौजूद है और बेहद कम समय में दिल्ली बॉर्डर्स के सभी टोल बूथों पर लगाई भी जा सकती है, लेकिन दिल्ली सरकार दो साल से इस पर महज़ विचार ही कर रही है और टैक्स वसूली करने वाली ठेकेदार कंपनी अरबों रुपयों के वारे-न्यारे कर चुकी है। कुल मिलाकर ग्रीन टैक्स की वसूली प्रक्रिया भी प्रदूषण और भ्रष्टाचार दोनों को बढ़ावा दे रही है, साथ ही सरकार को भी रेवेन्यू मिल रहा है।

तमाम उपायों और दिशानिर्देशों के बावजूद दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित या कम करने की राह में सबसे बड़ी चुनौती है इम्प्लीमेंटेशन। बातें और आदेश-निर्देश तो बहुत निकलते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनको सख्ती से लागू करने की ज़िम्मेदारी जिस तंत्र पर है, उनको कभी ड्यूटी निभाने की आदत नहीं रही।

पूरे मामले में विपक्ष और विपक्षी पार्टियों के रुख पर भी गौर किया जाना चाहिये। विपक्ष और विपक्षी नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर दोष मढ़ने और सवाल उठाने का काम जितनी कुशलता के साथ करते हैं, उतनी ही कुशलता और परिश्रम के साथ मिलजुलकर कुछ समाधान निकालने की बात क्यों नहीं कर पाते? आखिरकार ये सवाल लाखों लोगों के जीवन से सीधे-सीधे सम्बंधित है। कम से कम इस एक मुद्दे को राजनीति से परे रखकर सोचा जा सकता था। भाजपा शासित दिल्ली नगर निगम, आम आदमी पार्टी शासित दिल्ली सरकार और मोदी की केन्द्र सरकार अधीन डीडीए एकसाथ मिलकर इस गंभीर समस्या के निदान के लिये कुछ ठोस कर सकते हैं।

डोमेस्टिक और इंडस्ट्रियल वेस्ट मैनेजमेंट के लिये विदेशों से आधुनिक तकनीक लाई जा सकती है, वाटर स्प्रिंकलर्स का इस्तेमाल कर धूल को नियंत्रित किया जा सकता है। खत्तों को बंदकर उनको पार्कों के रूप में विकसित किया जा सकता है।  ग्रीन टैक्स की वसूली प्रक्रिया को अत्याधुनिक तकनीक से पारदर्शी और सुगम बनाकर लाखों लीटर डीजल की बर्बादी और प्रदूषण को रोका जा सकता है।

सम्बंधित विभागों के कर्मचारियों को अगर सख्ती से नियमों के पालन करवाने और नियम तोड़ने पर सख्ती से दंड के प्रावधान को लागू करने के लक्ष्य दिए जाएं तो ट्रैफिक चालान की तरह प्रदूषण फैलाने वालों पर भी चालान होने शुरू हो जाएंगे जिससे प्रदुषण नियंत्रण में मदद मिलेगी। प्रदूषणरहित और ग्रीन गाड़ियों की खरीद से लेकर टैक्स और बीमा पर भी सब्सिडी के प्रावधान से ज़्यादा लोग ग्रीन कांसेप्ट की ओर आकर्षित हो सकते हैं। औद्योगिक क्षेत्रोंमें चल रही फैक्ट्रियों को भी सख्ती से सभी प्रदूषण मानकों पर खरा उतरना चाहिए और ऐसा न करने पर सख्त प्रावधानों को उतनी ही सख्ती से लागू भी किया जाए न कि बातचीत और मैनेजमेंट के तहत मामले को रफा-दफा कर दिया जाए।

निष्कर्ष यही है कि दिल्ली को प्रदूषणमुक्त करने के लिये आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, क्योंकि सत्ता के केन्द्र में राजनीति ही है, जिसके पास शक्ति भी है और संसाधन भी। जनजागृति और सामाजिक ज़िम्मेदारी तो बाद की बात है, समाधान की सोच को पहला पड़ाव तो पार करने दें। सरकारें पहले अपनी ज़िम्मेदारियों को तो निभाएं।

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