बेनाम रह गया रिशता…..

Posted by Lincoln Mahendra
December 8, 2017

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दुख मनाऊ तो कितनी बातों का और किस बात का – अक्सर मैं यही सोचता हूँ। बातकरीब तीन साल पहले की है,  मैं अकेला पर खुश था,जब वो मेरी जिन्द्गी में आयी तब मैं  उससे उमर में 6 साल छोटा था ! दोनों बस दोस्त बने, दर्द को बांटने वाले दोस्त… एक दूसरे की केयर करने वाले ! पर पता ही नहीं चला कब प्यार करने लगे ! मन से दोनों एक हो गये कभी गलत नहीं सोचा एक दूसरे के बारे में… जबकि हम दोनों कभी मिलते नहीं थे, लेकिन फोन पर बात अक्सर हो जाती थी मतलब रोज़ दिन मे 2 बार … वो भी अपनी जिंदगी से खुश नहीं थी क्युकिं उसके घरवाले उसे प्यार कम करते थे.. ना उसे कभी वो प्यार मिला ना अपनापन ! वो  मानती थी कि उसकी जिन्द्गी की सारी खुशियां मेरे साथ और प्यार के सहारे ही मिली हैं ! पर हाल ये थे कि दोनों ही ना इक दूसरे को अपना पा रहे थे ना छोड़ पा रहे थे ! और मैं जिसके लिये प्यार कभी सिर्फ बकवास और फ़ालतू की चीज रहा पर उससे दोस्ती करने के बाद प्यार को महसूस किया ! लेकिन मैंने एक ऐसे इंसान से प्यार किया, एक ऐसे इंसान को सबकुछ समझा, जो मेरी कभी थी ही नहीं, जिस्पे हक ही नहीं था कभी ” बल्कि मैं उसकी जिन्द्गी में दूसरा बनके आया क्योंकि उसकी जिन्द्गी 2 जगह बंट गयी – प्यार और जिम्मेदारी ! वो शादीसुदा हो गई और अपने पति की थी भी और नहीं भी लेकिन मेरी नहीं थी ! मैं बोलता था कि मेरे साथ रूक जाओ कुछ समय, तो सोचना पड़ता था क्युकिं रिश्ता छुपा हुआ था ! डर था किसी के सामने ना सच खुल जाये कि दोनों एक दूसरे को चाहते हैं ! किसी को बता नहीं सकते थे ! लेकिन मेरी तो हर तरफ़ से हार थी, ना उसे अपनी कह सकता था , ना उसका बन के रह सकता था ! ना उससे कुछ कहने का अधिकार था, ना उसपे कोई अधिकार था ! फ़िर उसके पास समय बहुत कम रहता था मेरेे लिये, अपने पति के साथ वक्त गुजारने के कारण एक दिन उसके पास बिल्कुल समय नहीं था मेरे लिये… तब मैंने सोचा कि रोज़ ऐसा ही होता है उसके पास मुझे छोड़ कर सबके लिये समय है, सच जानते हुए भी ” क्युं मेनें उसे अधिकार देकर रखे हैं, खुद पे… दिल पे… दिमाग पे ??? अगर कभी वो मुझे मिलती भी है अकेली तब ही वो मेरी बनकर रहती है ! बाकी तो मुझे उम्मीद भी नहीं है उससे, लेकिन खुद पे यकीन नहीं आता कि मेने क्या किया खुद के साथ, उस इंसान को अपना सब कुछ माना जिसके लिये में कभी सबकुछ नहीं हो सका था, जानता था और आज भी मानता हुं कि मैंने उस इंसान से प्यार किया है जो मेरा कभी नहीं था ! उसने भी प्यार किया लेकिन आखिरी में, मैं किसी का पहला प्यार बनना चाहता था, लेकिन मेरा ही पहला प्यार मेरा नहीं हुआ ! मेनें प्यार किया था बिना शर्त और निश्वार्थ के, लेकिन हालातों और जरूरतों ने मुझे स्वार्थी बना दिया है ! और अब मुझे ….. मैं कभी ऐसा नहीं था जैसा मैं आज हुं, मैं ऐसे इंसान के साथ दिल से एक हुआ/जुडा… जिसके दिल पर किसी और का हक था/है लेकिन मेरे दिल पर जिसने हक जमाया और मेने ज़माने भी दिया, दुख मुझे इस बात का नहीं है ! दुख इस बात का है कि सच सामने होते हुए भी मैंने उस सच को क्युं नहीं समझा ! लेकिन अब क्या करुं, कैसे मांगू अपने प्यार का हक ? उसका साथ… अलग हो जाऊ तो कुछ दिन परेशानी फ़िर आदत बन जायेगी लेकिन वही परेशानी झेल्ने की हिम्मत कहा से लाऊ ! नहीं जानता उसने मेरी जिन्द्गी तबाह की या मेने उसकी… लेकिन वो कहती है कि जबसे तुम मेरी जिन्द्गी में आये हो मेने जीना सिखा है, मुस्कुराना सीखा है ! तुम्हारे जीना मुझे बहुत भाता है, और में चाहता हुं कि जब हम मन से जुड़ ही गये हैं तो एक हो जाये ! क्युकी इस तरह तीन लोगों की जिन्द्गी बर्बाद हो रही है ! ” लंबा-चौडा सोचने के बाद जब फोन की घंटी बज़ी तो विचारो की श्रंखला टूटी और तुरंत ही फोन उठाया…” सौरी जान, बहुत कोशिश की लेकिन ये यहीं थे तो फोन ना कर सकी !” जेसे ही इतने शब्द मेरे कानों में पडे तो गुस्से को दिल में दबाकर बोला – मैं भी बिजी था, अभी फ्री हुआ हुं , कोई बात नहीं ! वक्त गुजरा और अक्सर समय को लेकर हम दोनों के बीच झगडे बड़ने लगे, उसे अपने पति को समय देना पड़ता था और मुझे भी ! मुझे वो चाहिये थी और उसको पति-बच्चे, परिवार और मैं सब कुछ ! और एक दिन 2 साल पुरानी दोस्ती जो अब बेबुनियाद और बेनाम रिश्ते को समेटे थी वो टूट गयी ! और रिश्ते के साथ साथ दो संगदिल इन्सानों को तोड़ गयी ! जीने और मुस्कुराने की सारी वज्ह अब दोनों के लिये खतम हो गयी थी ! मुझकोे कहीं जायदा कुछ उसकी जिन्द्गी से गया था, खत्म हुआ था लेकिन मिला भी उसीको ही बहुत कुछ सिवाय एक ऐसे इंसान के जो सिर्फ उसी का हुआ करता था ! बेनाम सा ये रिशता रह् गया………

लेखक

Lincoln Mahendra@Lincoln Mahendra Forever

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