मणिशंकर अय्यर ने सब गुड़ गोबर कर दिया

Posted by Paritosh Kumar
December 9, 2017

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गुजरात चुनाव समाप्ति की ओर चल चला है। 14 दिसंबर को दूसरे चरण की वोटिंग और फिर 18 को नातीजे। इस बाबत बयानों का बाज़ार भी गर्म हैं।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्वमंत्री ने इसे और भी गर्म कर दिया है। जनाब ने माननीय प्रधानमंत्री जी को बेहद अपमाजनक शब्दों से कोट किया है। चुनावों का क्या है कि अगर कोई पक्ष दूसरे पक्ष पर जातीय टिप्पणी (Racial Comment) करता है या फिर अपशब्दों का इस्तेमाल करता है,तो दूसरा पक्ष इस अपमान को वोटों में तब्दील करने में बखूबी इस्तेमाल करता है।बड़ी विनम्रता से अपने अपमान को जन अपमान साबित करने में पूरी कसर लगा देता है।चुनावी राजनीति में इस process को sympathy votes हासिल करना कहा जाता है।

बहरहाल,बात मणिशंकर अय्यर और उनके कटुवचन की हो रही थी।शुक्र है उन्होंने इसके लिए खेद प्रकट कर दिया। चूँकि मामला ‘शब्द’ का था इसलिए उन्हें राजनीति में सबसे फेमस वाक्य “मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया” चिपकाने का स्पेस नहीं मिला। हालाँकि जो तर्क उन्होंने अपने माफीनामे में दिया है,वो चौंका देने वाला है। उन्होंने अपनी हिंदी में अशक्तता को ढाल बनाकर खुद के फैलाये रायते को समेटने की कोशिश की। पर लगता है वो उर्दू में जरूर सशक्त हैं,इसीलिए उन्होंने अंग्रेजी से हिंदी में तर्जुमा किया। अनुवाद या ‘Translate’ नहीं।

(उन्होंने अपने माफीनामे में मीडिया के समक्ष ‘अनुवाद’ या ‘ट्रांसलेट’ के लिए ‘तर्जुमा’ शब्द का इस्तेमाल किया है)

अय्यर दक्षिण के जरूर हैं,पर उनकी पहचान क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं है। वो एक राष्ट्रीय राजनेता हैं।कैबिनेट मंत्री और डिप्लोमैट भी रह चुके हैं।ऐसे में वो भारतीय समाज एवं यहाँ के समीकरणों को एक आम हिंदुस्तानी से ज्यादा समझते होंगे। हिंदी पर उनकी पकड़ भी किसी भी आम दक्षिण भारतीय से अधिक ही होगी।उनके एक्सेंट से भी ऐसा प्रतीत होता है। उसी हिंदी भाषा में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री के लिए इतनी अहुट शब्दावली का इस्तेमाल करना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

हम अक्सर बातचीत में कहते हैं कि राजनीति में पढ़े-लिखे लोगों को आना चाहिए। पर अगर अय्यर जैसे विदेशों में शिक्षित और बुद्धिजीवी नेता मर्यादा का पालन नहीं करेंगे,तो आम भारतीय का देश की दिशा और दशा को लेकर चिंतित होना लाजिमी है।

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