मेरा व तेरा अस्तित्व

Posted by Meena Naidu
December 11, 2017

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अक्सर आपने सुना होगा क़ि महिला और पुरुष दोनों एक ही गाड़ी के पहिये है।और दोनों को कन्धे से कन्धा मिलाकर चलना चाहिए ।और ऐसी बात सुनकर मन को अच्छा लगता है की दोनों को बराबर कहा जा रहा हैं । और आप सभी जानते है की हमारा देश बहुत तरक्की कर रहा है चाहे वह किसी भी क्षेत्र मे हो ।और समाज के हर कोने की खबर आप तक पहुंच ही जाती है क्योंकि (सोशल नेटवर्क) की अपनी एक पहचान है ,फिर उसमें “अख़बार,रेडियो,टेलीविजन,फेसबुक, वटस-अप, ईमेल इत्यादि ऐसे माध्यम है जो सभी को सूचनाये देने का काम करते रहते है ।इन्ही के चलते अच्छी सूचनाये और दिल को दहला देनी वाली घटनाये भी हम तक पहुंचती है ।
पिछले वर्ष हरियाणा मे हुए नेपाली युवती निर्भया काण्ड का नाम सुनते ही शरीर की रूह कांप जाती है रोंगटे खड़े हो जाते है ।दिल दहला देने वाले इस काण्ड ने फिर ये साबित कर दिया की महिलाओ की स्थिति मे सुधार नही बल्कि और बदतर हालात हो गए है ।
बलात्कार जैसे शब्द रोज हमारे कानो मे गूंजते है ,कभी दो साल की बच्ची ,तो कभी अस्सी साल की महिला के साथ ,कभी गैंग रेप,कभी घर मे घुसकर ,कभी गिड़नेप  करके बलात्कार हो रहा है ,यानि यौन शोषण हर दिन कही-न-कही ,किसी-न-किसी  महिला या लड़की के साथ हो रहा होता है ।
अगर अब बात करे महिलाओ की सुरक्षा को लेकर आपने सुना होगा की बहुत से प्रावधान किये गए है ,लेकिन जन्म से लेकर मरण तक महिला की सूरक्षा का ठेका भी किसी और को दिया जाता है …
चाहे उसमें पिता,भाई,पति देव,या रिश्तेदारो मे से कोई न कोई पुरुष हो ।
महिलाओ को ये भी हक नही कि वह अपनी रक्षा खुद कर सके ।
हमारे समाज मे प्रत्येक महिला या लड़की का मानसिक तनाव हर दिन बढ़ता जाता है ,घर की गली से लेकर नोकरी के स्थान तक हजारो,लाखो या करोड़ो पुरषों की नज़र उन्हें देख रही होती है ,उस समय लगता है जैसे महिला का होना ही कोई गुनाह हो ,और हर दिन ये नज़र सभी महिलाओ को डराने मे कामयाब रहती है ।
चाहे तो ऑटो रिक्शा हो,बस हो,जीप हो,या कोई भी साधन हो सभी के शीशे महिलाओ और लड़कियों को घूर रहे होते है और भद्दे गाने चलाकर इंतजार किया जाता है कब दुपटा इधर-से-उधर हो और कब महिला का वो हिस्सा नज़र आये जिसके लिए शीशे का रुख बदला गया है ।
बाइक पर सवार नोजवान लड़के न जाने कितनी बार महिलाओ और लड़कियों के उस हिस्से को थपड़ मारकर भाग जाते है जहा हल्का सा हाथ लगते ही जान पर बन जाती है ,और फिर दोस्तों के बिच वही लड़के उस थपड़ का मजाक बनाते है और जशन मनाया जाता है ।
कितनी बार महिलाये और लड़कियां ऐंकांत और सुंशान रास्तो पर महफ़िल ढूंढती है और कितनी बार अकेलापन खोजती है ताकि वह अपने घर पहुँच जाये ,और उसी समय बहुत बार इतने भदे शब्द कानो को सुनाई देते है …..(माल,गड़ासा,पटाका, अगर मिल जाये तो पूरी जिंदगी एक दिन मे जी लूँ )
उस समय सभी महिलाओ और लड़कियों को ये शब्द मजबूर करते है अपना वज़ूद ढूंढने पर और जब -जब कोई भी महिला और लड़की अपनी रक्षा के लिए आगे बढ़ी है तो हमेशा एक झुण्ड ने उनके हौसले को खत्म किया है या फिर उन्हें चरित्रहीन कहा गया है ।
और कभी घर की चार दिवारी के बिच,कभी स्कुल ,कभी दफ्तर ,तो कभी सड़को पर ऐसे ही किसी -न-किसी लड़की और महिला के वजूद को खत्म किया जाता है ।
आपको सुनकर बैचनी होगी की हर दिन,हर पल,हर किसी लड़की या महिला के साथ वो गन्दी पुरुष की मानसिकता और नजऱ जब लड़की के सिर से लेकर पाँव तक और शरीर के हर हिस्से को ऐसे देखते है जैसे अभी खा जायेंगे तो उस समय वो बलात्कार जैसी ही स्थिति होती है उस महिला के लिए ।
क्योंकि पुरुष समाज मे यह स्वभाविक है और वह अपना हक समझते है लड़कियों को घूरना और वही अपने ही घरो मे महिलाओ की सुरक्षा के ठेकेदार बने फिरते है जो उनकी इच्छाओ को खत्म करते है ।उनके होने पर सवाल खड़े करते है ।
सच तो यह है की पुरुष महिलाओ को अपने नियंत्रण मे रखना चाहते है ,महिला अपनी स्वेच्छा से कुछ नही कर सकती हैं ।वह अपने पहनावे को भी तय नही कर सकती है  और उन पर नियंत्रण रखने वाले पुरुष जब चाहे उसे पर्दे मे रख सकते है जब चाहे अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए उनके साथ जबरदस्ती कर सकते है और अगर महिला उसका विरोध करे तो उसकी मार पिटाई करना ,मारने की धमकी देना सब होता है ।
ऐसे हालात मे (सुरक्षा ) जैसे शब्द को सुनकर भी दम घुटने लगता है ।
हमारे समाज मे महिलाओ को इंसान ही नही समझा जाता तो कैसे उनकी सुरक्षा के बारे मे बात करे ,महिला अपनी पूरी जिंदगी इस सोच मे निकाल देती है की वह कौन हैं,उसका वजूद क्या हैं ,और क्या उसका अस्तित्व है ।और कभी भी इन सवालो के जवाब नही मिल पाते हैं , आज तक हम महिलाओ की सुरक्षा इतनी ही है की खुद को नही पहचान पाते बस सारी जिमेदारी निभाने मे जिंदगी खत्म हो जाती है ।
सविधान बना है ,अधिकार भी मिले है ,और उनमें महिलाओ के हक का जिकर भी किया गया है ।लेकिन ये एक कड़वा सच है की महिलाओ की स्थिति आज भी  वही खड़ी है जहा सदियों पहले थी ।

आज भी खुद को तलाश रही है और अपने अस्तित्व को ढूंढ रही हैं । लेकिन इंसान  आज भी नही माना जाता है ।

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