मेरे लिये 1984, 2002 ओर 2017,कुछ नही बदला..

Posted by H. Singh
December 10, 2017

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तारीख 31-अक्टूबर-1984, एक आम सा ही दिन ओर एक आम सी ही सुबह थी, मैं उस वक़्त 6 साल का रहा हूंगा, मेरा भाई अमूमन 3 साल का, ताया जी का परिवार ओर हमारा परिवार, मिलाकर कुल 8 लोगों का ये परिवार, अपने मूल वतन पंजाब से कुछ 900 किलोमीटर की दूरी पर शहर अहमदबाद में, मौजूद था, हम इस शहर में 1947 से मौजूद थे, जंहा मेरे पापा, ताया जी, ये पूरी पीढ़ी हिंदी माध्यम में शिक्षित थी वही गुजराती भाषा के साथ गुजराती समाज का खान पान ओर पहनावा भी, हमारे परिवार ने स्वीकार कर लिया था, मुझे याद है, मैंने एक कड़ा पहना था, जिसमे दो शेर बने हुये थे और ये कड़ा सौराष्ट्र के लोग, बड़ी शान से पहनते है, कहने का तातपर्य है की ऐसा कुछ भी नही था जिसके तहत, हमें या हमारे परिवार को इस बात का एहसास हुआ हो, की हमारा वतन सिर्फ और सिर्फ पंजाब है.

लेकिन, तारीख 31-अक्टूबर-1984, के दिन, शाम होते ये खबर, आग की तरह फैल रही थी कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी है, रात दूरदर्शन पर, के हिंदी और अंग्रेजी, दोनों न्यूज़ बुलेटिन में, विस्तार से प्रस्तारित की गई जंहा न्यूज़ एंकर सिर्फ और सिर्फ, खबर पढ़ रहा था लेकिन उसके शब्दो में दुख और क्रोध दोनों झलक रहा था, तस्वीरों के माध्यम से, दिखाया जा रहा था कि, आक्रोशित हो रही भीड़, “खून का बदला खून से लेंगे” के नारे लगा रही थी, मेरे ताया जी, भयभीत थे, उनका एक ही सवाल था, की ये सरकारी चैनल, क्यो इस तरह की तस्वीरे दिखा रहा है, उनका जवाब, तारीख 01-नवंबर-1984 के दिन देखनो को मिला जिस दिन, सरकारी भीड़, सरकारी कागजो के साथ उन घरों की निशान देही कर रही थी, जंहा सिख मौजूद थे, दिल्ली का सरकारी कत्लेआम, इतिहास बनने वाला था जंहा कलम की सियाही का रंग काला ही होगा, यंहा एक तथ्य सबसे गोर करने लायक है की इस समय मौजूदा राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के सरकारी काफले पर पत्थर मारे गये, 1971 की पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई में हीरो बनकर उभरे जगजीत सिंह अरोड़ा को भी श्री इंद्र कुमार गुजराल के घर छुपकर जान बचानी पड़ी थी, ऐसे में, एक मध्यमवर्गी सिख परिवार को बचाने वाला कोन था, कहने को ये देश की राजधानी दिल्ली थी लेकिन इस समय सिख असहाय, असुरक्षित ओर बिल्कुल अकेला था मानो हमारे देश के समाज ने उसे अपनाने से मुह फेर लिया था.

यंहा, मेरा परिवार भी भयभीत था, पापा ओर ताया जी जो रोज सुबह अपनी सरकारी नोकरी पर जाया करते थे, लेकिन अब वह घर पर ही रहते थे, घर के पास बहुत बड़ा मैदान था,जंहा इस समय पापा, ताया जी ओर पास के कुछ सिख अंकल आकर बैठ जाया करते थे, चर्चा का विषय अक्सर दिन बद दिन बिगड़ते हालात ही थे, गनीमत रही कि हम बच गये, सात दिनों के बाद पापा ओर ताया जी, ने नोकरी जाना शुरू कर दिया और हमारी भी जिंदगी, अपनी पटड़ी पर वापस आ गयी लेकिन तारीख 31 अक्टूबर 1984 के पहले, जंहा जीने का अधिकार हमारा हक था अब वह लोगो की सहानुभूति पर निर्भर करने लगा था, कत्लेआम तो तीन दिन के बाद रुक गया था लेकिन इसकी निशानदेही बहुत ज्यादा थी.

मुझे याद है, मेरे स्कूल की एक बहुत सी साधारण, सामान्य सी दिखने वाली महिला टीचर ने जब समाजविधा के एक विषय के अंतर्गत, पंजाब और इस प्रांत की पहचान श्री हरमिंदर साहिब गुरुद्वारा का जिक्र आया था, तब इन्ही महिला टीचर के शब्द थे कि ये तो अब आतंकवादियों का ठिकाना बन गया है, इसी के साथ एक बार यादव सर ने मुझे क्लास में खड़ा करके पूछा था कि सिख समुदाय का मांसाहारी खान के बारे में क्या विचार है, उस समय में भी मासाहारी था और मेरे ब्यान करने मात्र से, कुछ सहपाठियो द्वारा कहे गये शब्द छी छी मुझे आज भी याद है, दरअसल ये 1984 का कत्लेआम, शारीरिक कत्ल तक नही सीमित था, इसके पश्चात,कई ऐसे परिवार थे जिन्होंने शहर छोड़ कर पंजाब का रुख किया, यंहा तक कि लोगो ने अपने घर बेच दिये, सरकारी नोकरी तक छोड़ दी, 1984 का मतलब, सिख समुदाय को देश के मुख्य समाज से अलग करना भी था जंहा शिक्षा, रोजगार उन तमाम जरूरतों से हमें अलग किया जा रहा था जिसके माध्यम से एक जीवन का गठन होता है. इसके साथ साथ कई सिख नोजवानो ने अपनी पहचान छुपाने के लिये अपने केश कटवा दिये थे, ताकि वह समाज में अपनी स्वीकृति बना सके, यंहा सिख पहनावा, वेशभूषा,भाषा सब का कत्ल हो रहा था.

यही तर्क साल 2002 में हुये गुजरात दंगों से निकलता है, की यंहा भी मुसलमान समाज को शारीरिक रूप से मारना, इन दंगों की एक मुख्य तस्वीर बन कर जरूर उभरती है लेकिन इसका अगर अध्ध्यन करेगे तो, यंहा भी मुसलमान समाज को शिक्षा ओर रोजगार से वंचित किया जा रहा था, आज गुजरात में सड़क किनारे कई ऐसे होटल है जिनका मालिक तो मुसलमान है लेकिन होटल के नाम से इस बात की तसल्ली नही होती क्योकि इसका नाम हिंदू समाज में स्वीकार शब्दो से होता है. लेकिन व्यक्तिरूप से मैंने 2002 के बाद जो बदलाव देखा है कि साल 2002 के दंगों के तुरंत बाद, हिंदू मालिकाना गाड़ियों पर शब्द “राम” को भगवे रंग में लिखा जाना शुरू हो गया, भगवान का नाम ये बताने के लिये पर्याप्त था की ये गाड़ी या संपति एक हिंदू की है लेकिन इसकी मुख्य वजह असुरक्षा से जुड़ी है क्योकि 2002 की आगजनी में मुसलमान समझ कर कई जगह हिंदू परिवार की जायदाद को भी नुकशान पहुचाया गया,वही दूसरी तरफ मुस्लमान समाज के पहनावे में ओर चेहरे पर मौजूद दाढ़ी भी अब रुखसत हो गई थी.

साल 1984 में कई ऐसे दंगा पीड़ितों के बयान है दनगियो ने सिख समुदाय के गले में टायर डालकर, सफेद पाउडर डालकर जलाया गया, इसी तरह 2002 में गर्भवती महिलाओं को भी नही बख्सा गया यंहा भी मारने का तरीका, आग लगाकर जलाना ही था. इस तरह निर्मम कत्ल किया गया ता की समाज में इन दोनों समुदायो के बीच असुरक्षा ओर डर का माहौल बनाया जा सके, शायद इसका कारण ये भी था की इनकी पहचान ही खत्म कर दी जाये.

इसी माध्यम से अगर अफलाक, पहलू खान, जुनेद ओर अब हाल ही में कत्ल किये गये, अफराजुल का कत्ल भी अगर इसी माध्यम से समझा जाये तो साल 1984 ओर 2002 के दंगो से अलग नही है, ये सारी घटनाये अलग अलग समय पर अलग अलग जगह हुई है, पर इन घटनाओं को अंजाम देने वाले आरोपी की मानसिकता समझी जाये तो वह एक ही तरह की है, इस तरह ये सारी घटनाये सुनियोजित होने की आसंका पैदा करती है, जंहा एक जनसंहार की परिभाषा ही ले रहा है यहा शारीरिक कत्ल की संख्या कम हो सकती है, इनके अलग अलग कारण भी बनाये जा रहे है लेकिन इनकी निर्मम हत्या, सिर्फ और सिर्फ इसलिये की गयी क्योकि ये मुसलमान समुदाय से तालुखात रखते थे इसी के साथ ये सभी हत्याये अल्पसंख्यक समुदाय के बीच असुरक्षा ओर भय का माहौल बनाने के लिये पर्याप्त है, इसके पश्चात हो रहे पलायन, डर के कारण एक जगह रहने को मजबूर हो रहा समुदाय, इनसे शिक्षा और रोजगार का छीना जा रहा अधिकार, इसे समझने की जरूरत है जो 1984 ओर 2002 को ही दोहरा रही है.

व्यक्तिगत रूप से अफराजुल की हत्या ने मुझे बहुत भीतर से चिंतित कर दिया है, अब मैं फिर से साल 1984 की तरह डरने लगा हूँ, मैं निराश हूँ, मुझे अफराजुल की मौत से फिर से इस बात का एहसास हो रहा है की मैं आज भी बहुसंख्यक समाज की सहानुभूति पर ही जिंदा हूँ जंहा मेरी व्यक्तिगत कोई पहचान नही है. अगर कानून की परिभाषा दी जाये तो 33 साल से 1984 को न्याय नही मिला वह किस तरह 2002 ओर अफराजुल को न्याय दिला सकती है. इसलिये ही आज मेरा मुख्य सवाल ये नही है की इन हत्याओं का कारण क्या है ? बल्कि मेरा सवाल, हमारे समाज से यही है की इन हत्याओं का चलन कब रुकेगा ? रुकेगा भी या नही ? ओर सबसे जरूरी सवाल की क्या हम एक लोकतंत्र देश और सवेदनशील समाज है?

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