मैं कैसे कहूं जानेमन …

Posted by Vishesh Chandra Naman
December 14, 2017

Self-Published

“वो आंखों की स्याही वो होठों का उजाला, यही है मेरे दिन रात… मैं कैसे कहूं जानेमन …”

आजकल तुम यह क्या गुनगुनाते रहते हो सुशांत ? कहां खोए रहते हो ?हम दोस्तों से बातें भी कम करते हो, कुछ हुआ है क्या ?

अरे नहीं यार, कुछ भी तो नहीं, बस यूं ही अकेले में कुछ ग़ज़लें गुनगुनाना अच्छा लगने लगा है आजकल।

तो फिर तुम बस दो चार लाइने क्यों गुनगुनाते हो, कभी हमें भी सुना दिया करो पूरी ग़ज़ल, इतना सुंदर तो गाते हो।

नहीं यार आजकल मैं गीतों के छोटे-छोटे टुकड़ों को जीता हूं । तुम्हें पता है ना छोटे-छोटे गीत जल्दबाज होते हैं , वह खुद को जल्दी से जी लेना चाहते हैं, वे खत्म होने का इंतजार नहीं करते। मैं भी खुद को जल्दी से जी लेना चाहता हूं । छोटे-छोटे गीतों में असंतोष होता है और इस कारण वे बचे रह जाते हैं।

तुम्हीं देखना, जब तुम गाने को पूरा सुन लोगे तो वह तुम्हें इतना संतुष्ट कर देगा कि तुम उसे भूल जाओगे, जबकि उसी गाने के टुकड़े को गुनगुनाने से वह तुम्हें इस कदर असंतोष देगा कि वह तेरी यादों में समा जाएगा। बस यूं समझ लो कि मेरे जीवन में भी कुछ स्मृतियां हैं जिन्हें मैं कभी भूलना नहीं चाहता बस उंहें टुकड़ों में याद रखना चाहता हूं । अब खत्म होने का इंतजार तो नहीं कर सकता न ।

अच्छा छोड़ो भी, बताओ कौन सा टुकड़ा सुनोगे ? “वो आंखों की स्याही वो होठों का उजाला, यही है मेरे दिन रात…”

 

~ विशेष चंद्र ‘नमन’

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