राजनिति में गिरता भाषाओ का स्तर

Posted by Gaurav Kumar
December 16, 2017

Self-Published

लोकतंत्र का अपना महत्व है और इसमें भाषाओ की मर्यादा का ख्याल भी रखा जाना जाना चाहिये. आज के दौर में जिस प्रकार से भाषाओ का स्तर गिर  रहा है उसको देख के यही प्रतीत होता है कि लोकतंत्र में अब एक दूसरे कि मर्यादा करने वाले नेताओ कि कमी हो रही है हमारे देश कि दोनों बड़ी पार्टियों का यही हाल है जब यह समस्या देश कि दो बड़ी पार्टियों में है तो सोचा जा सकता है कि स्थानीय पार्टिया किस प्रकार से एक दूसरे पे आरोप- प्रत्यारोप  लगाती होंगी हाल ही में प्रधानमंत्री के ऊपर जिस प्रकार से हमला हुआ है उसको देख कर यही लगता है कि लोगो में धैर्य नाम की चीज कि कमी होती  जा रही है.कांग्रेस के बड़े नेता मणि शंकर ने जिस प्रकार से  प्रधानमंत्री के खिलाफ़ बोला है यह निंदनीय है इस से पहले भी कई बार हमले कर चुके है और भाषा कि सारी मर्यादा को लांघ चुके है. यह किसी भी व्यक्ति के लिए सोचने वाली बात है कि इतनी उम्र में और बड़ी पार्टी के बड़े नेता होने के नाते ऐसे बयान देना उचित है. इस प्रकार के बयान असोभनीय है. जब -जब चुनाव नजदीक आता है तो व्यक्तिगत टिपण्णी से बचना चाहिये ऐसा  नही है केवल कांग्रेस के लोग ही ऐसा करते है बल्कि बीजेपी में बड़ी तादात में ऐसे नेता है जो कुछ भी बोलते रहते  है. बीजेपी को टिपण्णी से बचना चाहिये चुनावो को मुददों पे लड़ने कि जरुरत है न कि व्यक्तिगत तौर पे किसी पर आरोप लगा के.२०१४ के लोक सभा के चुनाव के दौरान जिस प्रकार से राहुल गाँधी के ऊपर टिपण्णी कि गयी यह भी  गलत था.राज्य स्तर की पार्टियों में भाषा का स्तर एक दम गिर चूका है हाल ही में उत्तर प्रदेश में नगर निगम  चुनाव के दौरान जिस प्रकार से भाषा का उपयोग हो रहा था उसको देख के लगा कि राजीनीति में भाषा का स्तर गिर चूका है लोकतंत्र में चुनाव को मुददों के आधार पे लड़ना चाहिये न कि भाषा के स्तर पे .

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