राजनीती और उन्माद

Posted by Umesh Gupta
December 4, 2017

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सत्ता मे बने रहने के लिए जनसमूह मे उन्माद का बने रहना जरूरी है ताकि लोग अपने मूल्यों के प्रति उदासीन हो जाये और क्षणिक उन्मादी लहरों मे अपने अस्तित्व को खो दे।हर इकाई,संगठन जो सत्ता मे शीर्ष पर बने रहना चाहती है वह यही चाहती है कि उन्माद किसी न किसी स्वरुप मे चलता रहे,सिर्फ शांति के प्रयास भर होने चाहिए,लेकिन वह भी सतह पर क्योंकि शांति कोई सत्ता नही चाहती।लोग शांति के लिए युद्ध तक कर लेते है लेकिन शांति नही चाहते।है ना कितना विरोधाभासी?यही विरोधाभास तो हमे उलझाये रखता है।ऊपर ऊपर ऐसा लगता है कि सब कुछ हमारे भले के लिए हो रहा है पर हक़ीक़त कुछ और है।

जितनी भी भलाई हमें होती दिखाई देती है ये तो सत्ता और जनता मे सामंजस्य और तालमेल बैठाने का एक तरीका है और राजनीतिज्ञ इसमें बहुत निपुण और प्रतिभाशाली होते है,कुशल होते है तभी तो सत्ता मे बने रहते है।अन्यथा ये वहम बनाये रखना की सब कुछ तो आपके भले के लिए है,हम तो बस सेवक मात्र है,इतना आसान नही।असाधारण प्रतिभा चाहिए होती है इसलिए जब कोई ये कहता है कि राजनीतिज्ञ प्रतिभाशाली नही होते तो ये सर्वथा गलत है।

ये प्रतिभा ही है जो उन्माद की लहर को बनाये रखती है।इसे कब बढ़ाना है,कब नियंत्रित करना है ये सब जानती है।ठीक ऐसे जैसे बर्नर पे गैस की आंच को कब तेज करना है,कब मद्धम करना है और कब बंद करना है और इस पूरी प्रक्रिया मे पकाना कितना है यह सब राजनीती जानती है।

हमे लगता है कि हम आक्रोशित होते है लेकिन रिमोट किसी और के हाथ में होता है।

धर्म के नाम पर,जात के नाम पर,आरक्षण के नाम पर,गरीबी के नाम पर,देशभक्ति के नाम पर,सारे उन्माद कही और से नियंत्रित होते है,हम तो बस कठपुतली मात्र है।ये सारे उन्माद अफीम की भांति होते है।सच तो ये है कि ये उन्माद हमे जीवंतता का एहसास देते है अन्यथा हम तो मृतप्राय के तरह होते है।अक्सर उन्माद में हमारी ऊर्जा का स्तर बढ़ जाता है लेकिन आत्मनियंत्रण और विवेक  लुप्त हो जाता है।

जाती का,धर्म का,और देशभक्ति का उन्माद तो शास्वत है अन्यथा सभी अचानक किसी खतरे मे आ जाते है।हिटलर ने जर्मनी की सत्ता को इसी उन्माद को प्रक्षेपित कर जनता को नियंत्रित किया और एक कुशल घुड़सवार की भांति सत्ता और जनता की लगाम अपने हाथों मे ले ली।

सिर्फ जनता को यह एहसास कराना जरूरी है कि वह खतरे में है कारण कोई भी हो सकता है,नैतिकता की कोई जरुरत नही।फिर देखिये जनता कैसे आपके हाँथों में कठपुतली की तरह आती है।

हमारे पड़ोसी मुल्क की राजनीती का केंद्र ही यह उन्मादी जहर रहा है जो कई दशकों से पोषित होते आ रही है,भले ही देश का infrastructure कितना ही जर्जर क्यों न हो लेकिन रक्षा बजट मे कटौती नही होनी चाहिए क्योंकि भारत से खतरा है।

अमेरिका को तो सारी दुनिया ही खतरे ने नजर आती है और उसे खुद को सबका रहनुमा समझने का मुगालता हमेशा ही रहा है अन्यथा उसे हथियार बेचने के अवसर कैसे प्राप्त होंगे जो उसका प्रमुख व्यापार है।

चीन को तो दुनिया के सबसे शांत संप्रदाय तिब्बत के लामाओं से खतरा है।अगर तिब्बत जैसा शांत और पवित्र स्थान से किसी शक्तिशाली देश को खतरा हो सकता है तो समझ लीजिए कुछ भी हो सकता है।

क्या ये सब शांति चाहते है?बिलकुल नही! शांति मात्र दिखावा है,छलावा है।

राजनीती शांति के नाम पर छुरा घोपने का नाम है और हर बार यह छुरा जनता की पीठ मे घोप दिया जाता है।

उमेश गुप्ता(हस्ताक्षर)

 

 

 

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