लोकतंत्र और चुनाव

Posted by NooruDdin Khan
December 11, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

लोकतंत्र में चुनावों का जितना महत्त्व है ,चुनावों का लोकतान्त्रिक रूप से होना भी उससे काम महत्व नहीं रखता । चुनाव हमारे लोकतान्त्रिक शाशन प्रक्रिया का एक हिस्सा है परंतु लोकतंत्र को सिर्फ चुनाव तक ही सिमित कर देना किसी भी मूर्खता से कम नहीं है और ऐसा करना लोकतंत्र के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी है। एक मजबूत लोकतंत्र में शाशन हमेशा जनता के हाथों में होना चाहिए न की कुछ गिने चुने तथाकथित नेताओं के पास। लोकतंत्र में जनता के लिए नियमों का पालन करना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक नियमों का जनता की मर्जी के अनुसार होना भी है। किसी भी चुनी हुई सरकार को कोई अधिकार नहीं होना चाहिए की उसके नेता बिना जनता की मर्जी के नियम बनाकर जनता को उसका पालन करने को मज़बूर करें। आज ये देख कर बड़ा अफ़सोस होता है कि जिस चुनाव का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूती देना था वही आज लोकतंत्र को कमज़ोर किये जा रहा है , चुनाव में निर्वाचित होने को जीत और हार के नज़रिये से देखा जाने लगा। नेताओं के सामने नीतियां कमज़ोर होने लगी हैं। जिस लोकतंत्र ने राजनीती का अवसर दिया आज वही राजनीती लोकतंत्र का जनाज़ा निकाले जा रही है। आज के जनता खासकर युवाओं को ये अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए की चुनाव एक जनादेश होता है हार- जीत नहीं। कोई चुनाव जीतता नहीं बल्कि निर्वाचित होता है। अगर नेताओं का उद्देश्य जनसेवा हो तो निर्वाचित होने पर उन्हें अपार ख़ुशी और निर्वाचित न होने पर उन्हें निराशा नहीं होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से चुनाव लड़ने वालों का उद्देश्य जनसेवा न होकर पद और सत्ता होती है और यही सोच चुनाव को हार- जीत के नज़रिये से देखने को मज़बूर करती है। जब ये बात पूरी तरह निर्धारित है कि लोकतंत्र में सत्ता सदैव देश के जनता के पास होती है तो फिर कैसी हार जीत। लोकतंत्र में न कोई राजा होता है न ही कोई प्रजा होता है सब नागरिक होते हैं।
इतने अधिक राज्य होने के कारण हमेशा किसी न किसी प्रदेश में चुनावी माहौल होता है और और जगह का चुनावी माहौल जनादेश की जगह हार – जीत पर केंद्रित हो जाता है। कोई भी सरकार हो चाहे वो किसी भी दल की हो वह सम्पूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व करती है न की सिर्फ उसको चुनने वाले लोगो का। तो फिर हार जीत कैसा। हार जीत तो सिर्फ राजाओं की लड़ाई में होता है जहाँ जीतने वाले शाशक और हारने वाले गुलाम बनते हैं। जब तक चुनाव को हार जीत के नज़रिये से देखने वाले चश्मे को हमलोग निकाल कर फेक नहीं देंगें तब तक क्रन्तिकारी सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती है। आज़ादी से लेकर अब तक देश की जनता ने ही शाशन किया है और आगे भी जनता ही करती रहेगी चाहे सरकार किसी की भी हो। जिसे आप मत दे रहे हों उसके निर्वाचित होने पर ख़ुशी और निर्वाचित न होने पर दुखी होने का कोई औचित्य नहीं बनता है। हमें देश में किसी भी दल के नहीं बल्कि आम जनता के शाशन को मजबूत करनी चाहिए। जो भी युवा राजनीती में रूचि लेते हैं उन्हें मेहनत करनी चाहिए जनता की मजबूती के लिए न की किसी दल की मजबूती के लिए।
लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ और सिर्फ जनादेश है हार या जीत नहीं।

जय हिन्द।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.