विश्वविद्यालय को राजनीति के शिकार से बचाना जरुरी

Posted by SUSHIL KUMAR VERMA
December 27, 2017

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भारत में हर साल लगभग 40 लाख युवा स्नातक होते हैं, मगर ज्यादातर को ऐसा कोई कौशल नहीं सिखाया जाता जिससे वे किसी उद्योग या व्यवसाय में नौकरी पा सकें अथवा अपना व्यवसाय खुेद शुरू कर सकें। नैसकॉम और मैकिन्से की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मानविकी के दस फीसद तथा इंजीनियरिंग के 25 फीसद छात्र ही नौकरी पाने की जरूरी काबिलियत रखते हैं।

ऐसे में भारत को अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार की मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाले कौशल की शिक्षा देना भी जरूरी है। इसके लिए उद्योगों से मिले फीडबैक पर आधारित कौशल विकास पाठ्यक्रम तैयार करने चाहिए जो समय-समय पर नवीनतम तकनीक के अनुसार अद्यतन होते रहें।

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों पर गैर-अकादमिक कार्यों का बोझ कम करने की भई जरूरत है। साथ ही सभी विश्वविद्यालयों में एक तय सीमा के बाद पाठ्यक्रम में बदलाव होते रहना चाहिए क्योंकि उच्च शिक्षा के तीन मुख्य निर्धारित उद्देश्य हैं- शिक्षण, शोध एवं विस्तार कार्य। इन उद्देश्यों को पाने का माध्यम पाठ्यक्रम ही होता है।

भारत में अगर उच्च शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाना है तो सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि उन्नीसवीं सदी में विचरण करती भारत की स्कूली शिक्षा को 21 वीं सदी के मानकों के अनुरूप ढाला जाए। अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों को भी आइआइएम की तरह अधिक स्वायत्तता दी जाए। साथ ही इन्हें यूजीसी जैसे नियामकों के अनावश्यक हस्तक्षेप से भी बचाया जाए। आज देश के कई विश्वविद्यालय राजनीति के अखाड़े बनते जा रहे हैं। इन परिसरों को राजनीति और सत्ता से दूर रख क र अकादमिक रुझान पैदा करने की आवश्यकता है। तभी भारत ज्ञान की महाशक्ति बनने के साथ-सा वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना भी पूरा कर सकेगा।

सुशील वर्मा,सिन्दुरियां,महराजगंज

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