संकीर्ण मानसिकता

Posted by Neeraj Chaurasia
December 8, 2017

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आज रायपुर की छोटी से गली के छोटे से मकान मे फिर किलकारियां सुनाई देने जा रही हैं, मकान के बाहर एक उम्रदराज औरत उसका बेटा और बेटे की चार बेटियां सभी दरवाजे पर टकटकी लगाएं बैठे हैं,

सभी के मन मे अलग-अलग चिन्ताएं है साक्षी के बच्चो को तो पता भी नही है किस बात की चिन्ता है उन्हे बस इतना पता है जब घर के सभी सदस्य गम्भीर मुद्रा मे हो तो हँसी मजाक नही करते, साक्षी के पतिदेव को अपनी पत्नी की चिन्ता है कि वो ठीक है भी की नही, चेहरे के हावभाव से बेहद गम्भीर, हाथ जोडे और पोते की उम्मीद मे बैठी है साक्षी की  सास ।

तभी अचानक दरवाजा खुलता है सबसे पहले सासू जी आगे बढती हैं उनके कुछ पूछने के पहले ही काकी अम्मा बोली पडती हैं मुबारक हो आपको बेटी हुई है  थोडी देर का सन्नाटा तो समझ आता है लेकिन अगले ही पल सासू जी का आवाज सुनाई पडती है “सत्यानाश”

हमारे ही कर्म फूटे हैं जो हमे ऐसी बहू मिली चार चार बेटी पैदा करने के बाद भी इससे बेटी ही पैदा हुई पडोस की कुन्ती तीन पोतो की दादी बन चुकी है मुझे तो लगता है इस जन्म मे मुझे पोता नसीब ही नही होगा

‘माँ यहां साक्षी दर्द से कराह रही है और तू वहाँ चिल्ला रही है अन्दर आ ना’ विजय की आवाज सुनकर वो दरवाजा पटककर चली जाती है जो मरता है मरे मुझे परवाह नही ऐसे बडबडाते हुए,

साक्षी जो ये सब सुन रही है विजय से बोलती है मुझे माफ कर दो विजय मैं इस बार फिर तुम्हारी मां को पोता नही दे पायी और रोने लगी

विजय ने साक्षी को बहुत समझाया कहने लगा तुम परेशान न हो बस जल्दी से ठीक हो जाओ, मैं माँ को मना लूँगा

बेचारी साक्षी उसे तो अब ठीक होने से भी डर लग रहा है वो जानती है कि जब वो ठीक हो जाएगी उससे फिर एक पोते की माँग की जाएगी माँ तब तक उससे गुस्सा ही रहेगी जब तक वो फिर से गर्भवती न हो जाए,

साक्षी अब अपने परिवार से तंग आ चुकी है बार-बार बच्चे पैदा करना उसे बिल्कुल भी अच्छा नही लगता छोटा सा घर है और घर की आमदनी भी इतनी कम है कि अब उसे घर का खर्च चलाने मे भी दिक्कत हो रही है और उसकी सास कुछ समझना ही नही चाहती पोते के की एक झलक के लिए पगला सी गई है उन्हे तो साक्षी भी दिखाई नही पडती जो दिन पर दिन कमजोर होती जा रही है, जिन्दगी से तंग आ चुकी साक्षी आज बहुत बडा कदम उठाने जा  रही है,

आज साक्षी आत्महत्या करने जा रही है उसे एक बच्चा पैदा करने की मशीन बन के नही रहना, माँ के ताने नही सुनने, यहाँ तक की अब उसे अपने ही बच्चो की छोटी छोटी माँगो को पूरा न कर पाने का दर्द नही झेलना, आज उसे सारे बन्धनो सो मुक्त होना है……………….

कैसी अजीब विडम्बना है जहां एक ओर भारत देश मे लडकियाँ क्या कुछ नही कर रहीं, लडकियां हर एक क्षेत्र मे लडको से आगे निकल चुकी हैं चाहे वो खेल का मैदान हो या जंग का मैदान लेकिन यह भी एक कडवा सत्य ही है कि आज भी भारत देश मे रायपुर जैसे बहुत से गांव हैं जहां विजय की माँ जैसे लोग हैं जिनकी लडके की चाह मे साक्षी जैसी महिलायें आत्महत्या कर रही हैं,

कुछ लोग भले ही जागरुक हो गये हो लेकिन देश को जागरुक होने के लिए अभी बहुत समय इन्तजार करना पडेगा

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