समर्थन का अंतर्द्वंद

Posted by Abhishek Sharan
December 11, 2017

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भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र है। इतने बड़े पैमाने पर चुनाव विश्व में शायद ही कहीं होता हो। तो ज़ाहिर सी बात है कि सारे राजनीतिक दल चुनाव प्रचार में अपनी पूरी शक्ति झोंक देते हैं। इसी बीच कई चीजें सोंचने पर विवश करती हैं, उनमे से एक है प्रधानमंत्री का चुनाव प्रचार करना। बहुत संभव है कि भारतीय लोकतंत्र की महानता की बाते पढ़ते पढ़ते ये पढ़ना थोड़ा अज़ीब लगे , परंतु कुछ तर्क भी पेश कर रहा हूँ।
भारत में प्रधानमंत्री का निर्वाचन आम चुनाव के माध्यम से होता है, अर्थात भारत के सारे मतदाता मतदान कर सकते हैं। अब जिस राजनीतिक दल को राष्ट्रपति महोदय सरकार बनाने का आमंत्रण देते हैं, वह दल बहुमत में होती है। कह सकते हैं कि गणतंत्रीय गणना के अनुसार समूचे भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करती है। अब वह राजनितिक दल प्रधानमंत्री के पद के लिए अपना एक नेता चुनती है। इस तरह से प्रधानमंत्री अप्रत्यक्ष रूप से समुचे भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अब बात करते हैं चुनाव प्रचार की। अगर प्रधानमंत्री किसी उम्मीदवार के समर्थन में चुनाव प्रचार करते हैं तो इसका मतलब कुछ ऐसा है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसे पुरे देश का समर्थन प्राप्त है वो किसी उम्मीदवार के लिए जनता से समर्थन मांग रहा है। उसके हार जीत पर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा रहा है। अगर वह उम्मीदवार जीत जाये तब तो ठीक है, परंतु कहीं अगर वह उम्मीदवार हार जाये तो एक सवाल निकल के सामने आता है। सवाल ये है कि जिस व्यक्ति (प्रधानमंत्री) को पहले से पुरे देश का समर्थन प्राप्त है , उसे फिर से जनता का समर्थन क्यों नहीं मिला और दूसरे शब्दों में उसके द्वारा समर्थित उम्मीदवार क्यों हार गया? तो कहीं ना कहीं यह एक अंतर्द्वंद पैदा करती है, पहले के समर्थन में जब वह प्रधानमंत्री बनता है, और बाद के समर्थन में जब एक प्रधानमंत्री समर्थित उम्मीदवार चुनाव हार जाता है।
क्यों ना इस अंतर्द्वंद से बचने के लिए प्रधानमंत्री पद को भी तटस्थ बनाया जाए। उदाहरण के लिए राष्ट्रपति का पद, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी राजनीतिक दल से निकल के आते हैं, लेकिन पदग्रहण के बाद तटस्थ होते हैं। हालांकि भारतीय शासन व्यवस्था में राष्ट्रपति कि भूमिका कितनी है और प्रधानमंत्री कि भूमिका कितनी है ये हमें भली भांति ज्ञात है। शायद इसी वजह से संविधान में प्रधानमंत्री को चुनाव प्रचार से रोका नहीं गया। लेकिन अब भी ऐसा प्रावधान लाया जाये तो इससे दो फ़ायदे होंगे, एक तो प्रधानमंत्री पद कि गरिमा बनी रहेगी दूसरा लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक दल से हमेशा ऊपर रहेगा।

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