हमारे बीच लड़कियां

Posted by shivam chaubey
December 5, 2017

Self-Published

कॉलेज कैंपस के गार्डन में बैठा हुआ था, पास ही दो तीन अल्टर टाइप लड़के डेरा जमाए हुए आस पास से गुजरने वाली लड़कियों का परिमाप नाप रहे थे, कुछ ही देर में एक नॉर्मल सी दिखने वाली लड़की उनके पास से गुजरी उसे देख के सारी आँखे उस पे इस तरह टिक गयीं जैसे कोई अजीब चीज़ देख ली हो। तभी उन्हीं में से किसी लड़के ने कमेंट किया “भाई! क्या साइज है यार.” लड़की सुनी वो अनसुना भी कर सकती थी लेकिन वो कुछ ठिठकी और पलट के उनके पास आकर बोली “मेरा 34 है, अपनी बहन का पूछ के आना..”

कसम से उन तीनों की हालत देखने लायक हो गयी थी, उसके बाद उनकी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं पड़ी या आस पास वालों की नुकीली नज़रें उन पर इस तरह पड़ी कि उन्होंने आँखे झुकाना ही जरूरी समझा और वहां से चले गए….!

एक और घटना “एक दिन कैंटीन के अंदर घुसते ही एक देहलिप्सा में डूबे हुए आशिक ने एक लड़की का हाथ पकड़ लिया जो उस लड़की के लिये बिल्कुल ही अजीब था  उसी वक्त उसने अपना हाथ छुड़ा कर एक सभ्य गाली के साथ अपने हाथ की उंगलियों को उसके गाल पर प्रिंट कर दिया जो कि उस लड़के के साथ भी बिल्कुल ही नया था और जाते जाते समझा गयी कि आगे से ऐसा करने को सोचे भी न…”

कुछ लोग आसपास ही थे उन्होंने उसको सपोर्ट किया और वो लड़का वहां से चला गया..!

ये थीं दो घटनाएं हमारी सामाजिक मानसिकता के स्तर को दिखाती हुई वैसे भी ऐसा कुछ ही मामलों में होता है जहाँ लड़कियां मजबूत बन अपनी आवाज उठा पाती हैं वरना अस्सी प्रतिशत मामले तो ऐसे ही दबा दिये जाते हैं।

व्यक्तिगत तौर पर ऐसी लड़कियों में हमेशा ही  काफी कुछ अलग होता है, वो अपने लिये लड़ना जानती हैं, कोई उनके परिमाप को नापे तो उसकी आँखें नोचना जानती हैं, कोई उनकी तरफ ऊँगली उठाये तो हाथ तोडना भी जानती हैं लेकिन हमारी सोसाइटी के अधिकतर लोग (गिने चुने लोगों को छोड़कर) ऐसे ही हैं जिनकी नज़रों में ऐसी लड़कियां बदचलन चरित्रहीन कुल्टा न जाने क्या क्या हो जाती हैं, क्योंकि हमारे समाज को आदत ही नहीं है ऐसी लड़कियों की जो अपने हक़ के लिये लड़ सकें, हम शुरू से ही उनको हाशिये पर रखते हुए आये हैं।

हम लड़कों को लाख बार समझाते रहते हैं कि सेल्फ रेस्पेक्ट सबसे जरूरी है या कहीं से मार खाकर मत आना और दूसरी तरफ हम लड़कियों को सही कहने के बजाय उनमें ही कमियां निकालने लगते हैं कि “तुम्हीं सही से नहीं चलती, तुमने ही ढंग के कपडे नहीं पहने थे, तुमने दुपट्टा नहीं डाला था, इतनी टाइट जीन्स क्यों पहन रखी थी, और भी इससे बुरा न जाने क्या क्या…..!”

जरा सोच के देखिये जब ये सब मुझे लिखने और आपको पढ़ने में नहीं अच्छा लग रहा तो सोचिये जिसको ये सब झेलना होता है उसको कितना बुरा लगता होगा….।

यही कारण है कि दस साल की चुलबुली नटखट सी बच्ची दस का पायदान पार करते अचानक ही उम्र से कुछ ज्यादा ही बड़ी, कुछ ज्यादा ही समझदार, कुछ ज्यादा ही गंभीर बन जाती है…कितना बुरा है कि हम इतनी जल्दी उनके हाथ से खिलौने छीन लेते हैं या उनको बचपन से ही किचन सेट जैसे खिलौने देकर ये बता देते हैं कि तुमको आगे जाकर यही करना है…!

हम अपने आसपास कई ऐसे लोगों को देखते रहते हैं जो सड़कों या चौराहों पर किसी लड़की-लड़के को साथ घूमते देखते हैं तो उनके दिमाग में पहली बात यही आती है कि ज़रूर दोनों कपल्स होंगे या कभी किसी लड़की को फ़ोन पर बात करते देखते हैं तो तुरंत सोच लेते हैं कि हो न हो अपने आशिक से ही बतिया रही होगी, क्यों भाई! उसके फ़ोन कॉल की सीमा उसके बॉयफ्रेंड तक ही है या आप भी यही करते हैं। ये हमारी मानसिक तुच्छता का ही परिणाम है कि हम किसी को भी शक की नज़रों से देखने के आदी हो चुके हैं।

 

आइये दूसरी बात करते हैं हमारे समाज में हर घण्टे सैकड़ों यौन शोषण बलात्कार और छेड़खानी के केस दर्ज होते हैं लेकिन उनमे से कितने दोषियों को सजा मिलती है और कितने ही बच जाते हैं वहीं दूसरी तरफ ऊँचे पदों पर बैठे लोग इन दोषियों का पक्ष लेते हुए लड़कों की नादानी बताते हैं, कहीं छेड़खानी को एक प्रायोजित कार्यक्रम बता दिया जाता है, समझ नहीं आता कि ऐसे लोग कुर्सियों पर बैठते ही अपनी बुद्धि से हाथ धो बैठते हैं क्या! और फिर ऐसे लोगों को कुर्सियां सौंपी ही क्यों जाती हैं, क्या इसलिये कि इन मामलों को दबा कर खत्म कर दिया जाये और दोषियों को अपने राजनैतिक परों की बदौलत खुली हवा में उड़ने के लिये छोड़ दिया जाए.

हमारे बीच कितने ही ऐसे अधेड़ लोग हैं जो संस्कार के नाम पर घंटो आपके कानों में अमृत वर्षा कर सकते हैं लेकिन ये संस्कार उनपे स्वयं पर लागू नहीं होते बस बाचने के लिये होते हैं…. ये लोग किसी लड़की की मिनी स्कर्ट पर पंचायत कर सकते हैं, किसी की टाइट टॉप को देख कर ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं जैसे उनकी आँखें उछल कर भीतर ही चली जाएँगी, बस अपनी आँखों और दिमाग को खुला रखिये ऐसे कितने ही लोग आपकी नज़रों में गिरने के लिये आ जायेंगे…!

हमारी क्लासेज में आज भी अधिकतर बच्चे ऐसे ही होते हैं जो प्रेम के एक ही अर्थ को समझते हैं, जिनको प्रेम पढ़ाते वक्त प्रोफेसर को चार बार सोचना पड़ता है, कबीर बिहारी जायसी पढ़ाते वक्त कई पद छोड़ देने पड़ते हैं, दलित और स्त्री विमर्श पढ़ाने पर कई शब्दों से किनारा करना पड़ता है, क्योंकि उनको पता होता है कि कई बच्चे ऐसे हैं जो शब्दों की गम्भीरता को छोड़कर हो हो करके हँसने लगते हैं, ऐसे लोग नख शिख वर्णन को शृंगार नहीं बल्कि सेक्स का पर्याय मान लेते हैं.

वैसे इनमें उनकी कोई गलती नहीं है हमारा समाज ही हमको गले तक इतने संस्कारी बन्धनों में बांध देता है कि ऐसे विषयों को किताबों में देखकर हम अचंभित हो जाते हैं कि! किताबों में ऐसा भी लिखा होता है.

ये हमारी सामाजिक संकीर्णता का ही परिणाम है कि हमको हर लड़की को बहन बनाना सिखाया जाता है, क्यों हमारा समाज एक लड़का और लड़की के बीच दोस्ती के रिश्ते को नहीं स्वीकार कर पाता है क्यों हमारे मोहल्ले के पड़ोसियों की दिलचस्पी ‘शर्मा जी के लड़के और शुक्ला जी की लड़की के साथ घूमने’ पर ज्यादा रहती है, ऐसे लोगों को दोस्ती का मतलब समझाने की जरूरत है और अपने दिमाग को घुटनों से ऊपर उठाकर सोचने की जरूरत है.

मैं इसको पढ़ने वाले हर व्यक्ति से अपील करता हूँ कि इन चीज़ों को थोड़ा तो लॉजिकल लीजिये, रूढ़ियों से थोड़ा तो किनारे पर चलने की कोशिश करिये. धीरे धीरे ही सही कुछ तो परिवर्तन आएगा. अपने बच्चों पर पाबंदिया कम करिये उनसे खुलकर पेश आइये वरना वे फूटेंगे तो काफी कुछ जलाने की क्षमता रखेंगे. रूढ़ियों से हटकर ही हम एक नए समाज की ओर ही बढ़ पाएंगे जहाँ लैंगिक समानता सिर्फ किताबों में ही न दिखे जहां आप परिवर्तन की जिद करके बैठें, एक ऐसा समाज जहां सबके लिये सम्मान हो, सबके लिये स्वतंत्रता हो, जहाँ संवैधानिक नियमों को रट कर भूलने के लिये नहीं बल्कि व्यवहारिकता में भी लाया जा सके, और एक ऐसा समाज जहाँ खुलने का मतलब शारीरिक खुलेपन (नंगई करने) से न होकर विचारों के खुलेपन से हो….!

 

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