हिंदुस्तान में आज विद्यार्थियों की जो स्थिति है, उसके लीये जिम्मेवार है गाँधी जी

Posted by rishi0404
December 16, 2017

Self-Published

भारत के आध्यत्मिक गुरु आचार्य रजनीश “ओशो” ने गांधी जी को बीमार दृस्टि वाला कहा उनके विचार उनके प्रवचन के संग्रह “देख कबीरा रोया “में प्रवचन न . 23 में गाँधी की रुग्ण दृष्टि शीर्षक में ओशो ने कहा

गाँधीजी ने दूसरी एक बहुत खतरनाक ईजाद की इस मुल्क में–धमकी की। अगर आप मेरी बात को नहीं मानते हैं तो मैं भूखा, अनशन करके मर जाऊंगा। इसका परिणाम हम हजारों साल तक भुगतेंगे। यह एक खतरनाक बात उन्होंने इस मुल्क को सिखा दी है। अब कोई भी नासमझ खड़े हो कर कह सकता है कि मेरी अंतरात्मा की आवाज है कि चंडीगढ़ पंजाब में होना चाहिए, नहीं तो मैं मर जाऊंगा! अब डरो उससे।

सत्याग्रह के नाम पर आत्महत्या की धमकी उन्हों ने सिखा दी। अगर कोई आदमी कहता है कि मैं आग लगा कर मर जाऊंगा तो आप यह मत समझना कि वह आदमी कुछ गलत कह रहा है, वह गांधीवादी चिंतन का ही फल है।

हिंदुस्तान की बहुत सी बीमारियां गांधीजी के अविचारपूर्ण चिंतन से पैदा हुई हैं। हिंदुस्तान में आज विद्यार्थियों की जो स्थिति है, उसके लिए गांधीजी बहोत हद तक जिम्मेवार है। हिं

चित्र नेट से साभार

दुस्तान की यूनिवर्सिटी, विश्वविद्यालय और स्कूलों से गांधीजी ने विद्यार्थियों को आजादी के लिए बाहर निकाला। रवींद्रनाथ ने इसका विरोध किया, तो रवींद्रनाथ देशद्रोही मालूम पड़े। एनीबीसेंट ने इसका विरोध किया तो उसकी इज्जत खतम हो गई। क्योंकि गांधीजी ने कहा, जब देश की आजादी का सवाल है तो पढ़ने का कोई सवाल नहीं है। पहले आजादी, फिर पढ़ना हम देखेंगे। रवींद्रनाथ ने कहा, यह खतरनाक बात आप कर रहे हैं, क्योंकि एक बार विद्यार्थियों की पकड़ राजनीतिक पर शुरू हो गई, तो इसे मिटाना मुश्किल हो जाएगा।

आज रवींद्रनाथ सही साबित हो रहे हैं, लेकिन उस दिन रवींद्रनाथ देशद्रोही मालूम पड़े थे। गांधीजी ने हिंदुस्तान के विद्यार्थी को उतार दिया राजनीति में, अब वह वापस नहीं लौटता। अब वह कहता है, हड़ताल करेंगे, कांच फोड़ेंगे, बस में आग लगाएंगे। हम कहते हैं कि तुम कैसे गांधी के बेटे हो, यह क्या कर रहे हो? वह कह रहा है, अब पढ़ना-लिखना पीछे, पहले राजनीति।

अब कब इससे छुटकारा होगा, कहना मुश्किल है। यूनिवर्सिटीज व्यर्थ पड़ी हुई हैं। आज वहां शिक्षा का कोई काम नहीं हो पा रहा है, क्योंकि राजनीति पहले। सारी दुनिया के विद्यार्थी अपनी पूरी शक्ति लगा कर पढ़ रहे हैं, सोच-विचार कर रहे हैं, खोज कर रहे हैं और हिंदुस्तान का विद्यार्थी राजनीति कर रहा है। कौन है उसका जिम्मेवार?

ध्यान रहें, विद्यार्थी को ज्ञान से बड़ी कोई आजादी नहीं है। युवकों को उपद्रवों में डालना ठीक नहीं है। उनको सारी शक्ति ज्ञान में लगा देनी उचित है। यूनिवर्सिटी के बाहर आकर लड़ाई लड़ लेंगे। फिर हिंदुस्तान में आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की कोई कमी थी? चालीस-पचास करोड़ का मुल्क है, क्यों विद्यार्थी को घसीटते हो? लेकिन सच बात यह है कि उपद्रव करवाया गया है। इससे हिंदुस्तान की सारी शिक्षा अस्त-व्यस्त हो गई है। कैसे व्यवस्थित होगी, कहना मुश्किल है।

अंग्रेजों ने हिंदुस्तान में दो सौ साल में शिक्षा का एक व्यवस्थित ढंग दिया था। गांधीजी ने वह सब अव्यवस्थित कर दिया। और कहा कि हम तो सिर्फ बुनियादी तालीम चाहते हैं। बुनियादी तालीम का मतलब है, चरखा चलाना सीखो, तकली चलाना सीखो, चटाई बुनना सीखो। आज पश्चिम का लड़का चांद पर जाने का उपाय कर रहा है और हमारा लड़का बेसिक एजुकेशन ले रहा है। वह यह कह रहा है कि हम तकली में से कैसे सूत निकालें? तो तुम निकालते रहो सूत, अमरीका के लड़के के सामने हारेंगे; बच नहीं सकते। खो जाओगे, मिट जाओगे। लेकिन यह वैज्ञानिक चिंतना हमें समझ में नहीं आ सकी।

और अब जब मैं ये बातें कहता हूं तो लोग मुझे गाली देने आ जाते हैं। वे कहते हैं कि आप गांधी जी के लिए ऐसा कहते हैं? गांधीजी से मुझे क्या लेना-देना है! कह इसलिए रहा हूं कि अगर यह अवैज्ञानिक चिंतन हमको दिखाई नहीं पड़ा, तो हम आत्मघात कर लेंगे।

यह हिंदुस्तान बुरी तरह से नुकसान में पड़ता जा रहा है। रोज हम गङ्ढे में उतरते जा रहे हैं और अंधकार में उतरते जा रहे हैं। अगर हम समय रहते चेत जाएं और चीजों को सोच लें, समझ लें और भविष्य का निर्णय ले लें और गांधीजी से सावधान हो जाएं।

लेकिन वह हम हो न पाएगा क्योंकि हमारी पुरानी आदत है कि अगर एक आदमी गलत बात कहता हो, लेकिन चरित्रवान हो तो हम उसकी बात मान लेंगे। जैसे कि चरित्र किसी बात के सही होने का सबूत है! एक आदमी कहता है, दो और दो पांच होते हैं और रात को मैं पानी नहीं पीता है, तो हम कहेंगे बिलकुल ठीक है। क्योंकि वह आदमी रात को पानी नहीं पीता है, वह दूध भी छान कर पीता है, वो चोरी-बेईमानी नहीं करता, वो शराब नही पीता। वह दो और दो पांच कहता है तो ठीक ही कहता होगा!

और मैं आपसे आखिरी बात कहना चाहता हूं कि हिंदुस्तान हजारो सालों से चरित्र को तर्क मान रहा है, इससे बहुत नुकसान उठा रहा है। चरित्र तर्क नहीं है, तर्क की अपनी जगह है जो चरित्र से बिलकुल अलग है। हिंदुस्तान में अगर कोई आदमी अच्छा चरित्र निर्मित कर ले तो फिर हम पूछना ही छोड़ देते हैं कि वह जो कह रहा है वह साइंटिफिक है, वैज्ञानिक है? हम कहते हैं, चरित्रवान है, बस फिर ठीक है। लेकिन ऐसा कोई ठेका है कि चरित्र से कोई ठीक होने का संबंध हो?

मैं गांधी जी को धार्मिक आदमी नहीं मानता हूं, एक अतिनैतिक व्यक्ति मानता हूं। जिन्होंने बहुत श्रम करके एक तरह का चरित्र निर्माण किया है। लेकिन वह सारा श्रम सप्रेसिव है, दमन का है। उनका सारा ब्रह्मचर्य, सेक्स का दमन है। उनकी सारी अहिंसा उनके भीतर जो छिपा हुआ भय था उस भय से बचने का उपाय थी।

इसलिए गांधीजी का व्यक्तित्व बहुत अर्थों में पैथालाजिकल है, मानसिक रूप से रुग्ण है। अगर उसको हमने आदर्श मान कर हिंदुस्तान के व्यक्तित्व को ढालने की कोशिश की तो हम सारे हिंदुस्तान को बीमार बना दे सकते हैं।

जरूरी नहीं है कि मेरी सारी बातें मानी जाएं। यह धोखा हम बहुत दफा खा चुके हैं इस मुल्क में। जरूरी नहीं है कि मैं जो कहता हूं, वह सब सही ही हो–ऐसा मुझे दिखाई पड़ता है, इसलिए मैं कहता हूं। और आपको जरूरी नहीं है मेरी बात मान लेने की। आप सोचना। अगर गलत हों तो उनको कचरे में फेंक देना, अगर ठीक मालूम पड़ें तो सिर्फ इस वजह से इनकार मत कर देना कि गांधीजी के विरोध में हम कैसे स्वीकार कर लें! उनकी मूर्तियां गांव-गांव में खड़ी हैं, खड़ी रहें, लेकिन हिंदुस्तान के भविष्य पर उनकी मूर्ति की छाप नहीं होनी चाहिए अन्यथा हिंदुस्तान भटक सकता है।

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