हिमाचल के कसोल और तोश की पहाड़ियों में रेव पार्टियों का सच

Posted by Abhijeet Thakur in Hindi, Society, Travel
December 14, 2017

इस बार लद्दाख से लौटना मनाली के रास्ते हुआ, अमूमन हम श्रीनगर के रास्ते लौटते हैं लेकिन घाटी में हालात ठीक न होने का सुनकर बाकी साथियों ने विचार बनाया कि मनाली के रास्ते ही लौटेंगे। हमने लेह से मनाली के रास्ते में ही कुल्लू होते हुए कसोल जाने की योजना बना ली थी। रास्ते में जहां भी चाय-पानी के लिये रुके, हमने लोगों से कसोल और उसकी विशेषता के बारे में पूछा। ज़्यादातर लोगों ने कहा की वहां लोग ‘एन्जॉय’ करने जाते हैं।

अब क्या एन्जॉय करते हैं ये तो नहीं बताया सीधे-सीधे, लेकिन कुछ लोगों ने दबी ज़बान से बताया कि नशे का खुला बाज़ार है और देश-विदेश से आए सैलानी जमकर चरस और अन्य प्रतिबंधित नशे का सेवन खुलेआम करते देखे जा सकते हैं।

खैर, हम कसोल पहुंचे, पहाड़ियों के बीच भरपूर हरियाली और साथ-साथ तेज़ रफ्तार बहती नदियां देखकर प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। लेकिन एक उत्सुकता थी मन में कि ये ‘रेव पार्टियां’ कहां होती होंगी? कैसी होती होंगी? क्या-क्या होता होगा वहां? आखिर क्या ऐसी चीज़ है जो विदेशी सैलानियों और देश के कोने-कोने से आये अल्ट्रामॉडर्न युवक-युवतियों को कई किलोमीटर दूर पहाड़ों में खींच लाती है।

शाम से ही हम चार साथियों ने पार्टी के ठिकाने का पता करना शुरू किया। सबसे पहले टैक्सी वाले ने बताया की कसोल से लगभग 25 किलोमीटर आगे तोश आएगा। ये एक पहाड़ी गांव है, जहां गाड़ी नहीं जा सकती। गाड़ी पार्किंग में लगाकर हमने तोश गांव की चढ़ाई शुरू की। पहले गांव में पता किया, फिर कुछ कैफे में और आगे तक भी गए लेकिन पार्टी के ठिकाने का पता नहीं चल सका।

दिल्ली में लिफ्ट और एलिवेटर का धड़ल्ले से प्रयोग करने वाले लड़कों की सांसें पहाड़ियां चढ़कर फूलने लगी थी। आखिरकार नीचे आकर गाड़ी में बैठे और वापस चल पड़े, लेकिन ‘रेव पार्टी ‘ देखने की उत्सुकता अब भी थी। वापसी में थोड़ी दूर ही चले थे कि कुछ लोकल लड़के मिले, रुककर हमने पूछा, “भाई सुना है यहां पार्टियां-शार्टीयां होती हैं, आज की पार्टी कहां है?”

लड़का कूल था, उसने बताया, “कुछ दूर पर ही पुलगा गांव है, वहां जाकर एन्ड पॉइंट पर गाड़ी पार्क करो और पहाड़ियों पर ऊपर चढ़ जाओ। सौ प्रतिशत कन्फर्म पार्टी है।” यह सुनकर हममें वापिस जोश भर गया और हमने गाड़ी मोड़ दी पुलगा गांव की तरफ। एन्ड पॉइन्ट वाली पार्किंग तक पहुंचते-पहुंचते एक साथी ने जवाब दे दिया कि वो अब और चढ़ाई नहीं कर पायेगा। बचे हम तीन, क्षण भर के लिए तीनों ने एक दूसरे की तरफ देखा, सबकी आंखों में एक सी उत्सुकता के भाव थे। 9:35 के आस-पास चढ़ाई शुरू की थी तो किसी ने बताया था कि बस 15 -20 मिनट का रास्ता है, यही कोई 6-7 किलोमीटर बचे हैं।

लेकिन जिन्होंने भी ऐसा कहा, शायद ये देख कर कहा कि अगर वास्तविक ऊंचाई और दूरी बता देंगे तो कहीं लड़के उल्टे कदम वापिस न हो लें। असल दूरी 15 किलोमीटर के आस-पास रही होगी और उसमें भी ज़्यादातर हिस्सा चढ़ाई का था। दो पुल पारकर गांव पहुंचे और गांव पार करने के बाद एक और खड़ी चढ़ाई हमारे सामने थी। हमारी हालत खराब हो चुकी थी लेकिन पार्टी तक पहुंचना जैसे जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका था। सांसें फूलती रही, रुकते, टिकते और लुढ़कते हुए हम जैसे-तैसे 11:30 के आस-पास पार्टी स्थल तक पहुंच चुके थे।

रेव पार्टी में एंट्री

पहुंचे तो देखा कि रेव पार्टी का पहला नज़ारा कैसा होता है, नहीं तो अभी तक मात्र फिल्मों में ही देखा था या किसी हवाबाज़ दोस्त से सुना था जो शायद खुद यहां तक कभी नहीं आया होगा। विदेशी टूरिस्ट के लिये एंट्री 4000 और देसी लोगों के लिये 2500 रुपए बताई गई। कुछ लोग तो एंट्री के पास ही इधर-उधर गोल घेरा बनाकर चरस या अन्य प्रकार के नशे वाली सिगरेट रोल करने में जुट गये थे। बहरहाल हम इस सोच में थे कि तीन लोगों का 7 हजार 500 रुपया देना थोड़ा ज़्यादा नहीं हो जाएगा। नशेड़ी हम हैं नहीं और मानसिक संतुलन भी ठीक ही है।

खैर, इतने में दिल्ली पुलिस वाले मेरे दो मित्रों ने दिमाग चलाया और मोलभाव वाली तकनीक का प्रयोग करते हुए ‘स्टाफ’ का रेफरेन्स दिया। दूसरे साथी ने भी बार्गेन को सपोर्ट किया तो मैं भी कहां पीछे रहने वाला था। तरकीब सफल रही और तीन लोगों के लिये प्रवेश के द्वार 3000 रुपये में ही खुल गए। हाथों में एक एक रंगबिरंगा बैंड बांध दिया गया। उत्सुकतावश मैंने पूछा, “क्या-क्या है अंदर?” बाहर एंट्री पर खड़े बंदे ने बताया कि अंदर सब मिलेगा। खाने का, पीने का… और हम खुशी-खुशी आगे बढ़ लिए ये सोचते हुए कि हजार में ही सब कुछ इनक्लूडेड होगा अपने लिए।

वैसे वहां अंदर या बाहर जैसा कोई नज़ारा नहीं था, खुले आसमान के नीचे रस्सियों से बनाए गए घेरे में एक बड़ा टेन्ट जिसमें एक विदेशी मूल की महिला डीजे म्यूज़िक प्ले कर रही थी। कोई गाना नहीं, केवल म्यूज़िक। पता किया तो किसी ने बताया कि इसको ट्रांस म्यूजिक बोलते हैं।

कुछ छोटे टेन्ट लगे थे साइड-साइड में, सबसे बीच में आग जल रही थी और सैकड़ों लोग ज़मीन पर यहां-वहां बैठे हुए थे। एक टेन्ट में खाना पकाया जा रहा था और वहीं खाने-पीने का सामान मिल रहा था। घटिया सी व्हिस्की का एक पॉपुलर ब्रांड और ऐसी ही कोई वाहियात सी वोडका भी। बियर भी थी, हज़ार रुपये का एक कैन!

वहां सभी नशे में चूर थे या नशे की तैयारी में तल्लीन। जिनका हो लिया था वो अजीबोगरीब तरीके से नाच-झूम रहे थे। अगर सामान्य भाषा में कहें तो उन सभी को मनोवैज्ञानिक/मानसिक चिकित्सा की ज़रूरत हो जैसे।

हमें लगी थी प्यास, सोचा पीने को पानी तो मिलेगा ही, हज़ार रूपये की एंट्री फीस जो दी थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। पानी की एक बोतल 150 रुपये में खरीद कर गले को तर किया, लेकिन कसम से इस प्यास से नफरत सी हो रही थी। आमतौर पर एक पैक्ड पानी की बोतल से दो-चार घूंट मारने के बाद हाथ मुंह भी धो लेने वाले आज पानी को संजो-संजोकर पी रहे थे!

लेकिन सबसे भयावह नज़ारा था पार्टी का। वहां कौन किसके साथ है और कौन किसको जानता भी है या नहीं, पता लगाना असंभव था। वहां सब केवल नशे के पुजारी ही थे। चरस, गांजा, स्मैक, शराब इत्यादि बेहद महंगे रेट पर वहां उपलब्ध थे। भीड़ में सबसे ज़्यादा संख्या विदेशी सैलानियों की थी, सब के सब नशे में चूर।

चरस-वरस फूंकने वालों ने लॉलीपॉप हाथ में ले रखी थी। एक कश लगाते और फिर लॉलीपॉप चूसते। नशे करने के इतने सारे तरीके पहली बार प्रत्यक्ष रूप से देख रहा था। नशे में चूर कुछ जोड़े सरेआम प्रेम रस में इस कदर डूबे थे कि उन्हें तमाम क्रियाकलाप को सार्वजानिक करने में मानों विशेष सुख की अनुभूति हो रही हो।

बॉनफायर के आस-पास इनके नाचने की बेतरतीबी को काश मैं शब्दों में सही रूप से बयान कर पाता। ऐसा लग रहा था मानों सुन्दर-सुन्दर दिखने वाले बंदरों की पूंछों में पेट्रोल लगाकर आग लगा दी गई हो। जिसको देखो वही विक्षिप्त रूप से उछल-कूद रहा था। एक सात फुट का सूतली सा दिखने वाला विदेशी मूल का युवक इस डांस ग्रुप का प्रधान था। चौधरी भी बोल सकते हैं उसको, क्यूंकि उसके नृत्य को देखकर वाकई एक सामान्य मनुष्य की रूह कांप जाए। म्यूजिक वही था, ट्रांस वाला।

दिल में 3000 की एंट्री और 150 रुपये के पानी की बोतल का दुःख कम था, लेकिन इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि ये सैकड़ों लोग क्या इतनी दूर चलकर और चढ़कर सिर्फ और सिर्फ यही सब करने आते हैं?

मैं हर चेहरे को गौर से देखता जा रहा था, हर डांस मूव को देखकर सोच रहा था कि कभी प्रभुदेवा से मुलाकात हुई तो इस डांस के बारे में पूछूंगा ज़रूर।

खैर रेव पार्टी को देखने की हमारी उत्सुकता अब थम चुकी थी, थकान शरीर पर हावी हो रही थी और हम वापस चलने का विचार बना ही रहे थे कि वहां अचानक कुछ हलचल शुरू हुई। पीछे देखा तो कुछ पुलिस वाले पिस्तौल के साथ घेरे में प्रवेश कर चुके थे। मैंने मुस्कुराकर कहा, ये पार्टी क्लोज़ करने की तरकीब जान पड़ती है क्योंकि कार्रवाई तो कुछ होने से रही।

मुझे कोई विशेष हैरानी या भय का आभास नहीं हुआ, हम नशे में नहीं थे लेकिन बाकी दो साथियों ने निकल लेने की सलाह दी। मैं इससे आगे की कार्रवाई देखने के लिये रुकना चाहता था, मेरे अंदर का पत्रकार जाग रहा था लेकिन बाकी दो मित्रों ने कहा कि निकल लेना ही सही होगा।
खैर, हम बड़े आराम से निकल लिए। कुछ एक घंटे में नीचे पहुंचे और गाड़ी स्टार्ट कर निकल पड़े कसोल। कसोल में होटल पहुंचे और रात को जो नींद आई वो जैसे सदियों बाद आई थी।

पहाड़ियों से नीचे उतरते हुए सबसे खास बात ये हुई कि एक पहाड़ी कुत्ते ने मानो हमारे सुरक्षाकर्मी का काम किया। जब तक हम अपनी गाड़ी तक नहीं पहुंच गए, पहाड़ों के घुप्प अंधेरे में ये कुत्ता हमारे साथ ही चलता रहा। हज़ार रुपये के बदले जो बैंड उस बंदे ने कलाई पर बांधा था, उसे अब भी सहेज कर रखा हुआ है, अगली बार जाऊंगा तो हिसाब पूरा कर लूंगा। 150 रु. की पानी की बोतल का भी और एन्ट्री फीस का भी।

फोटो प्रतीकात्मक है।

 

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