ग़ज़ल

Posted by विनोद तिवारी
December 12, 2017

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ग़ज़ल

सितम देखो हवा इस पश्चिमी का।
जनाज़ा उठ गया है सादगी का।

हवस का काफ़िला है साथ उसके;
भरम तुझको हुआ है आशिकी का।

उजालों के सभी हैं मीत यारो;
नहीं साथी है कोई तीरगी का।

बिका ईमान सिक्कों की खनक पर;
गिरा कद आज इतना आदमी का।

वफा के नाम से अंजान हैं जो;
हवाला दे रहे वो दोस्ती का।

चखे हैं उम्र भर बस रंज गम ही;
कहूँ मैं ज़ायका क्या चासनी का।

तड़पता दिल, सिसकती रूह “मानस”
सिला तुझको मिला ये आशिकी का।

विनोद तिवारी “मानस”

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