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डियर ज़िंदगी, पास बैठो ना, साल खत्म होने पर तुमसे कुछ बात करनी है

Posted by Bimal Raturi in Hindi, Society
December 30, 2017

डियर ज़िंदगी,
आज जब साल खत्म होने को है तो तुमसे गुफ्तगू करने का मन हुआ। मैं दुनिया भर से बातें कर लेता हूं, फोन से, फेसबुक से, ईमेल से और कई तरह के प्रोग्राम में जा कर, लेकिन तुमसे रूबरू होने के लिए मुझे ज़्यादा वक्त लगता है। ये वक्त मैं इसलिए भी चाहता हूं क्यूंकि मैं थोड़ी बहुत बातचीत कर के तुम्हें यूं ही नहीं निबटा देना चाहता, मैं तुमसे जी भर के बातें करना चाहता हूं।

हम एक यात्रा पर हैं और वो यात्रा केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने तक ही नहीं सिमटी हुई है, बल्कि उस यात्रा में हम मानसिक रूप से साथ आगे बढ़ते हैं। इसमें हर एक पड़ाव हमें गढ़ता है, हमें परिपक्व बनाता है। गढ़ने के इस दौर में एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव के बीच जो कुछ भी हम अपने अन्दर बदलाव महसूस करते हैं, हम वैसे ही होते जाते हैं।

हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम, बुद्धू बक्से का हो-हल्ला, बगल वाली आंटी की गपशप, शर्मा जी के बेटे के नंबर, बगल वाली नेहा के फेसबुक अकाउंट में उसकी दुबई ट्रिप के फोटो, किसी नए नए लड़के का स्टार्टअप हमारी इस यात्रा में गहरा छाप छोड़ते हैं। कुछ को हम खुद में शामिल करते हैं तो कुछ को छोड़ देते हैं।

कभी-कभी लगता है कि ये यात्रा मेरी अकेले की है लेकिन जब हर शाम पापा की कॉल उठाता हूं और वो पूछते हैं कि दिन भर क्या क्या किया? तो लगता है कि मेरे दिन भर की यात्रा में वो भी शामिल हो गए। मां के हर दिन के खाने के सवाल पर उन्हें दिन के 3 टाइम के खाने का हिसाब देना भी उसी यात्रा का हिस्सा है। मैं ज़िंदगी की यात्रा में भीड़ की बात नहीं कर रहा लेकिन कुछ लोगों को अपनी यात्रा में शामिल करना ज़रूरी है, क्यूंकि किसी दिन अगर लगे कि मैं थक रहा हूं तो उनके संग इस थकावट को बांट सकूं।

ज़िंदगी में हम बहुत से ऐसे लोगों से भी रूबरू होते हैं, जिन्हें लगता है कि वो हट के हैं, अलग हैं, इंटलेक्चुअल हैं और बाकी लोग उन्हें नहीं समझ पा रहे हैं। कुछ दिन पहले जब किसी का व्हाट्स एप स्टेटस पढ़ा, “परिवार वाले दूर रहे …” तो हंसी भी आई, परिवार वाले दूर रहें तो नजदीक किसके जाना है? सिर्फ उन लोगों के जो आपको समझते हैं या आपकी तारीफ करते हैं? ये एकाकीपन की अवस्था है जो कुछ देर के लिए तो ठीक है पर लम्बे वक्त में ये इंसान को खोखला करने की ताकत रखती है। मेरे घर वाले मुझे नहीं समझते? क्या मैंने बैठ के उन्हें समझाया है? क्या मैंने उन्हें उनकी भाषा में उन्हें समझाया है? क्या मैंने कोशिश भी की? या ये खुद ही समझ के कि वो नहीं समझ पाएंगे हमने उन्हें कभी बताया ही नहीं!

हमारे सपने भी तो हमारी इसी यात्रा का हिस्सा हैं, कभी दूसरों के सपनों को मत जियो हां लोगों को अपने सपनों का सहयात्री बनाने में कोई हर्ज़ नहीं है। डॉ. कलाम की ज़िंदगी की कई बातें बहुत ज़ोरदार हैं, उनका एक सपना था, “प्लेन उड़ाने का”। ज़िंदगी के अलग-अलग मौकों पर उन्होंने कोशिशें की लेकिन कामयाब नहीं हो सके। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने इस सपने को नहीं छोड़ा और 2006 में सुखोई-30  एम.के.आई. उड़ाया। बचपन में पतंग उड़ाने से शुरू हुए एक सपने को उस उम्र के पड़ाव में जीना, बहुत हेई अलग किस्म के जज़्बे को हमारे सामने रखता है।

कोई भी सम्पूर्ण स्थिति नहीं होती पर हम कोशिश उसी की करते हैं। ऐसा शायद ही कभी होगा कि ऑफिस की टीम के सारे लोग अच्छे हो जाएं, बॉस कभी डांटे नहीं, पहली बार में ही मां-बाप सारी बातें मान लें, पहली गर्लफ्रेंड से ही बिना किसी प्रॉब्लम के शादी हो जाए या पहले ही राउंड में आई.ए.एस बन जाएं। ये सब कुछ नामुमकिन भी नहीं है बस उन सपनों को मरने नहीं देना है।

साल खत्म होने को है और ये वक्त है जब पिछली गलतियों पर झांक कर उन्हें न दुहराने की बात की जा सकती है। उन आदतों को बाय बाय करने का भी सही वक्त है जिनके बारे में सोचकर आप को लगता है कि इनके बिना भी ज़िंदगी बहुत चल जाएगी। उन लोगों को भी बाय बाय किया जा सकता है जिनके बिना ज़िंदगी ज़्यादा खूबसूरत होगी। प्यार फैलाइए अपने आस-पास क्यूंकि नफरत की इबारतें तो बहुत से लोग लिख रहे हैं लेकिन प्यार की सिफारिश बहुत कम लोग करते हैं तो ज़िंदगी की इस यात्रा में हर एक नए दिन खुद को गढ़ते रहिए।

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