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।।तीन तलाक़ को तलाक़।।

Posted by Chaitanya Jha
December 30, 2017

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28 अगस्त 2017 देश के इतिहास को लोकसभा द्वारा एक ऐतिहासिक दिन दिया गया। जिस लड़ाई को 1980 के दशक में शाहबानो ने शुरू किया था ,लेकिन उसे अपने संघर्ष से अंजाम तक पहुँचाया शायराबानो ने। 1400 सालों से इस्लाम में चली आ रही तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत) की प्रथा को गैरकानूनी ठहराने वाली बिल लोकसभा ने ध्वनिमत से पारित किया। दरअसल, 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच द्वारा इस प्रथा को 3:2 के बहुमत से निरस्त कर दिया था। कोर्ट ने आदेश भी जारी किया था कि सरकार इस पर बिल लाये और कानून बनाये। इसी के तहत सरकार ने ये बिल लोकसभा में लाया। जहाँ बिल के पास हो जाने पर सरकार ने अपनी पीठ खुद थपथपाई और पीड़ितों ने इसे ईद से भी बड़ा दिन बताया, वहीं कुछ विपक्षी दल (एआईएमआईएम,मुस्लिम लीग,राजद, अन्नाद्रमुक) द्वारा इस बिल को लेकर मतभेद भी दिखा तथा तृणमूल कांग्रेस द्वारा न तो बहस में भाग लिया गया न ही वोटिंग की गई।

लोकसभा में 7 घंटो के बहस के दौरान, ओवैसी द्वारा इस बिल में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसे सदस्यों ने नकार दिया। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इसका विरोध किया है, बोर्ड के एक सदस्य जफरयाब जिलानी ने कहा कि इस बिल से मौलिक अधिकारों का हनन होगा, इससे इस्लाम को भी ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई है, और केंद्र सरकार इसे सियासी फायदे के लिए लाई हैं। इस बिल के पास होने से अब कोई शौहर अपने बीवी को तीन तलाक़ (लिखित, मौखिक तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम द्वारा) नहीं दे सकता है।अगर कोई शौहर तीन तलाक़ देता हैं तो उसे दोषी माना जाएगा, तथा उसे तीन साल तक कि सजा हो सकती हैं। इस बिल के तहत पीड़ित महिला और उसके ऊपर आश्रित बच्चों के लिए भत्ते का प्रावधान भी है, अगर बच्चा नाबालिग है तो उसकी जिम्मेदारी बीवी को ही मिलेगी। कहा ये भी जा रहा है कि, इस बिल से मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक समानता तथा न्याय भी मिलेगी,और महिलाएं अब तलाक़ के डर से महफूज़ भी रहेगी।

कुछ लोगों द्वारा ये भी कहा जा रहा है, कि ये बिल इस्लाम विरोधी तथा भावनाओं को आहत करने वाला लगता है, और शरिया के खिलाफ है। क्या सचमुच ये शरिया के खिलाफ है,या इस्लाम के खिलाफ है, इसे जानने के लिए हम इस्लाम की धार्मिक ग्रंथ कुरान की ओर रुख करेंगे। कुरान के अनुसार यदि कोई अपनी बीवी से अलग होना चाहता है, तो उसे पहली बार तलाक़ बोलने के बाद दो बार इद्दत की अवधि से गुजरना होता है। इस दौरान यदि शौहर चाहें तो बीवी को निक़ाह में ले सकता है।

कुरान के अनुसार तलाक़ के कुछ प्रावधान इस प्रकार है-:      1-एक बार तलाक़ बोलने के बाद तीन माह या तीन माहवारी की इद्दत गुजारी जाती है, यहाँ भी निकाह में वापस होने की सुविधा है, नहीं तो दुबारा तलाक़ बोला जाता है।

2-दुबारा तलाक़ बोलने के बाद फिर इद्दत की अवधि गुजारी जाती हैं, यहाँ भी निक़ाह में लौटने की सुविधा हैं, अगर नही तो तीसरी बार तलाक़ बोला जाता है।

3-इसके बाद चाह कर भी शौहर बीवी को निक़ाह में नही ले सकता है, यहां प्रावधान ये भी है कि तलाक़ का उच्चारण पूरे होशोहवास में होना चाहिए।

4-यहाँ प्रावधान ये भी है कि अगर औरत पेट से हैं तो, इद्दत की अवधि बच्चा पैदा होने तक हो सकता है।

जिस इस्लाम में औरतों को फूल की रखने का प्रावधान है, उस इस्लाम में तीन तलाक़ की तरह का घटिया रिवायत नही हो सकती है, बस कुछ मानसिक भ्रष्ट और नेताओं के द्वारा वोट बैंक के लिए इस रिवाज पर आँख मूंद कर भरोसा किया जाता है। इस्लाम में औरतों के साथ दुर्व्यवहार पर पाबंदी है, इसीलिए एक लम्बी प्रक्रिया है, जिससे अगर गलती में भी अगर तलाक़ बोला गया है, तो शौहर उसमे सुधार कर सकता है, तलाक़ के तहत शौहर को भी भूल सुधारने का मौका दिया जाता है।

अब सवाल ये है कि, क्या सिर्फ क़ानून भर बना देने से तीन तलाक बंद हो जाएगा, क्या बीवियां शौहर प्रताड़ित नहीं कि जाएगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश जारी करने के बाबजूद भारत में लगभग 100 तलाक़ हो चुका हूँ। इससे छुटकारा पाने के लिए हमे पुरूष प्रधान सोच से निकलना पड़ेगा। और बीवियों की भावनाओं तथा उनकी इच्छाओं का सम्मान करना पड़ेगा।

Source- कुरान शरीफ़।

लेखन-चैतन्य झा।

 

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