मस्जिद-मंदिर के पत्थरों के आगे क्या इंसानी ज़िंदगी का कोई मोल नहीं?

Posted by Rajeev Choudhary in Hindi, Society
December 8, 2017

“अपने ही मन में डूबकर पा जा सुराग ए ज़िंदगी, तू अगर मेरा नहीं बनता, ना बन पर अपना तो बन!!”

कई दशक पहले पाकिस्तान की राजनीति में एक भूचाल आया था, वो भूचाल था मजहब का जब सियासी जमातें मंचों पर नमाज़ पढ़ती दिखाई देती थी। उस नमाज से पाकिस्तान के मुसलमानों को जो फायदा हुआ वो जगजाहिर है, कुछ ऐसा ही फायदा अब भारत के हिन्दुओं को भी होगा, क्योंकि अब यहां भी कोई जनेऊ तो कोई जौहर विवाद लिए खड़ा है। पता नहीं जनेऊ और टोपी से आगे और क्या होगा?

जब धर्म के मंचों पर नेता खड़े हों और राजनीति के मंचों पर साधू-संत या मौलवी तो देश के स्वस्थ लोकतंत्र और उसकी धार्मिक-सामाजिक समरसता को तानाशाह या किसी दूसरे देश की सेना नहीं, बल्कि धर्म या मजहब के सिरचढ़े भूत निगल जाते है। आस्था और धर्म के नाम पर सिर जोड़े जाते हैं, गिने जाते हैं, इसके बाद अपने-अपने पाले में लोग जमा किये जाते हैं और फिर इसके बाद चढ़ जा बेटा सूली पर भली करे करतार…

लोग भयभीत हैं पर आत्ममुग्ध हैं, हर किसी की सोशल मीडिया पर अपनी उंगली और अपनी सोच है। परसों अयोध्या कांड की 25वीं बरसी थी, जमकर शौर्य और काला दिवस मनाया जा रहा था। पता नहीं चला मस्जिद किसकी टूटी थी या मंदिर किसका बनेगा?

लोग 6 दिसम्बर को याद कर एक-एक पत्थर का दर्द बयां कर रहे हैं, लेकिन साम्प्रदायिकता के इस अग्निकुंड में कितने लोग स्वाह हुए किसी एक परिवार का दर्द लिखने की फुरसत किसे है? अयोध्या के पत्थरों का दर्द मुम्बई में सिलसिलेवार विस्फोटों से हज़ारों परिवारों की चीखों और  सिसकियों में बदल दिया गया। सब जानते है तब से अब तक सत्ताधिकारियों और पैरोकारों की सियासी जूतियां कितने पैरो में बदली गई, कितने पक्षकार आए और गए। यदि कुछ नहीं पता तो वो ये कि उस दिन सुबह घर से कौन निकला था और शाम को कौन घर पहुंचा?

भारत में तो एक मस्जिद टूटी थी, जिसका महत्व धर्म से ज़्यादा राजनीति से जुड़ा था, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में क्या-क्या टूटा इसका अंदाज़ा कौन लगा सकता है? पत्थरों के टूटने का गुस्सा न जाने कितनी माओं की ममता को निगल गया, अनुमान नहीं कितनी बहनों-बेटियों के साथ बलात्कार हुए और न जाने कितनी पत्नियों के सुहाग खो गए। धर्म-मज़हब के नाम पर औरतों का मज़हबी भीड़ का शिकार बनना कितना आसान सा होता है ना?

तस्लीमा नसरीन अपनी पुस्तक ‘लज्जा’ में लिखती हैं कि प्रसिद्ध ढाकेश्वरी मन्दिर में आग लगा दी गयी थी। 6 दिसम्बर को अयोध्या की तरह ही वहां भी पुलिस निष्क्रिय होकर सामने खड़ी तमाशा देखती रही। मुख्य मन्दिर जल कर राख हो गया। अन्दर घुसकर उन लोगों ने देवी-देवताओं के आसन को ध्वस्त कर दिया। नटमन्दिर, शिवमन्दिर, अतिथिगृह, उसके बगल में स्थित श्री दामघोष का आदि निवास, गौड़ीय मठ का मूल मन्दिर, अतिथिशाला आदि का ध्वंस करके मन्दिर की सम्पत्ति लूट ली गई। जयकाली मन्दिर को चूर-चूर करने के बाद ब्रह्म समाज की चारदीवारी के भीतर वाले कमरे को बम से उड़ा दिया गया।

वो लिखती है कि जहां भी नजर जाती विध्वंस और अवशेष के सिवाय कुछ भी नज़र नहीं आता था। डेमरा के शनि अखाड़े का मन्दिर भी लूटा गया, पच्चीस परिवारों का घर-द्वार सब कुछ दो-तीन सौ साम्प्रदायिक लुटेरों द्वारा लूटा गया। लक्ष्मी बाजार के वीरभद्र मन्दिर की दीवारें तोड़कर अंदर का सब कुछ नष्ट कर दिया गया। राय बाजार के काली मन्दिर को तोड़कर वहां की मूर्ति को रास्ते पर फेंक दिया गया। सुत्रापुर में हिन्दुओं की दुकानों को लूटकर, तोड़कर उनमें मुसलमानों के नाम के पट्टे लटका दिए गए। ऐसा ही हाल पाकिस्तान में भी हुआ था। बाबरी मस्जिद के बाद पाकिस्तान में तकरीबन 100 मंदिर या तो ज़मींदोज़ कर दिए गए या फिर उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया गया। आज वहां भी आस्था, खंडहर में तब्दील खड़ी दिखाई देती है।

पर क्या करें ‘लज्जा’ लिखने वाली धर्मविरोधी हो गई, मस्जिद तोड़ने वालों का विरोध करने वाले वामपंथी और सेकुलर पता नहीं क्या-क्या हो गए। लज्जा न पश्चिम में स्थित देश पाकिस्तान को आई, न पूरब के बांग्लादेश को और बेशर्मो की टोली तो आज भी यहां गर्व से घूम रही है।

मैं कोई नये साहित्य या धर्म का सृजन नहीं कर रहा हूं, बस सवाल रख रहा हूं कि क्या किसी देश में एक भी अल्लाह की मस्जिद है या कहीं ईश्वर का मंदिर हो? मैंने कहीं देखा नहीं। हां मस्जिदें बहुत हैं, जो टूटी थी वो बाबर की थी। अब कहीं नूरानी मस्जिद है, कोई शियाओं की मस्जिद है तो कोई चांद-सितारा, पर एक भी अल्लाह की मस्जिद नहीं देखी। कुछ ऐसे ही हनुमान जी के मंदिर देखे, राम और कृष्ण जी के मंदिर देखे, बाबाओं और संतों के मंदिर देखे पर कहीं एक भी मंदिर ईश्वर का नहीं देखा। किसी ने अल्लाह की मस्जिद या ईश्वर का मंदिर देखा हो तो बताना, मुझे भी दर्शन करने हैं?

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