6 दिसंबर, जब राम के नाम पर रावण बने लोग

Posted by Shubham Srivastava
December 8, 2017

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6 दिसंबर देश के इतिहास का वो काला दिन है जिसकी टीस आज तक लोगों के दिल में नासूर बन के चुभ रही है। हज़ारों ने राम और अल्लाह के नाम पर रावण और हैवान का रूप धरा और लाखों ने अपनों को खो दिया। 1947 को देश आज़ाद हुआ। 1976 में संविधान की प्रस्तावना में 42वें संसोधन के साथ ये साफ़ कर दिया गया कि भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य है। पर शायद इसका अर्थ केवल देश के स्कूलों के नैतिक ज्ञान की किताबों में एक अध्याय को जोड़ने भर का था। हम 200 सालों से ज्यादा की गुलामी के खिलाफ जिस ‘एक हिंदुस्तानी’ के भाव से लड़ें, शायद 45 सालों बाद 1992 तक में वो ठंडा पड़ चुका था और हमें विभाजन के लिए एक और मुद्दे की ज़रूरत आ पड़ी थी।

 

धर्म के नाम पर 1940 के दशक में देश जिस हिंसा का गवाह बना उसने देश के हर कोने में खून की झेलम, चेनाब और गंगा बहा दी थी। शायद उस वक़्त मिट्टी में समाए खून की गर्मी ख़त्म नहीं हुई थी। उसके आग की तपन से एक नई पीढ़ी को गढ़ा जा रहा था, जो फिर से खून को स्याही बना कर धर्म, देश और राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा रचने जा रही थी।

 

सभी कानूनी प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय को वचनबद्ध करने के वावज़ूद जब 6 दिसंबर 1992 को 1,50,000 लोग अयोध्या की सडकों पर निकले तो रैली किस कदर हिंसक हो उठी, इसका अंदाज़ा हज़ारों की संख्या में सडकों पर पसरी लाशों को देख के लगाया जा सकता है। हर तरफ खून की लाली इंसान के सस्ते जान की गवाही दे रही थी। नेताओं की एक हूंकार पर सैकड़ों अपनी जान दिए जा रहे थें।

 

कई हिंदू संगठनों का दावा रहा है कि, प्रभु श्रीराम का जन्म ठीक उसी स्थान पर हुआ था जहाँ बाबरी मस्जिद थी। उनके इसी दावे ने उन्हें बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उस ऐतिहासिक हिंसा के लिए प्रेरित किया था।

 

अयोध्या काण्ड को हुए 25 साल हो चुके हैं, पर आज भी इस घटना की दस्तक देश की राजनीति के दरवाज़े पर होती रहती है। आज भी ये घटना राजनीतिक दलों के मैनिफेस्टो और नेताओं के भाषणों को ओजस्वी, तेजस्वी और ज़ायकेदार बनाने के लिए छौंके का काम करता है।

 

इस लंबे वक़्त में देश ना जाने कितने दंगों को झेला, ना जाने कितनों के लिए वो टीस आदत बन चुकी है। पर जिनकी आवाज़ ने लोगों को कुर्बानी का हौसला दिया, आज वो संसद में गूँज रही है और देश को समरसता और धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा रही। 25 साल बाद भी मामला सर्वोच्च न्यायालय की सीढ़ियों पर न्याय की गुहार लगा रहा है। पर लड़ाई आज भी खून को इंसाफ दिलाने की नहीं, बल्कि इस बात की है कि “कौन” उस जमीन पर माथा टेकेगा।

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