“तेरे बाउजी से मेरी बेमेल शादी हुई थी, उनसे कभी प्यार नहीं हुआ”

“जानती है पुत्तर मुझे तेरे बाऊजी के जाने का दु:ख कभी हुआ ही नहीं, कभी उनकी कमी भी महसूस नहीं हुई और न ही कभी रोना आया। याद तो आज तक कभी आई ही नहीं। सच पूछ, तो उनके जाने के बाद मैं पहले से ज़्यादा सुखी और खुश हूं। कहने को हमारी शादी हो गई, बच्चे भी हो गए, हमने सारे काम साथ कर लिए। पूरी ज़िंदगी एक साथ एक छत के नीचे गुज़ार दी, फिर भी प्यार कभी नहीं हुआ मुझे तेरे बाऊजी के साथ।”

मैं ये बातें सुनकर अवाक थी। मैं स्त्री का एक नया ही रूप देख रही थी, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। अम्मा की बातों को सुनकर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इन सारे मुद्दों पर एक बार फिर से सोचने की ज़रूरत है।

एक 80 वर्षीय घरेलू बुज़ुर्ग महिला के इस इकबालिया बयान ने मुझे इस विषय पर फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या हमारे समाज में एक स्त्री को ऐसी कोई बात कहने का हक है? वह भी उस ज़माने में जब स्त्रियों को मात्र घरेलू दायित्वों की पूर्ति और अपने पति के लिए भोग-विलास के साधन के रूप में देखा जाता था?

अगले कई दिनों तक अम्मा के ये शब्द मेरे दिलो-दिमाग पर छाये रहे और मैंने तय कर लिया कि अम्मा के इन विचारों को शब्दों में पिरोना है। वह कई बार मुझसे कह भी चुकी थी, “अगर पढ़ी-लिखी होती, तो अपनी डायरी या आत्मकथा ज़रूर लिखती। अपने दिल का सारा गुबार निकाल देती, दुनिया को बताती कि बेमेल विवाह के क्या दुष्परिणाम होते हैं।” पर अफसोस कि उन्हे पढ़ना-लिखना नहीं आता था।

अम्मा… जो कहने को तो मेरे दिल्ली वाले फ्लैट की मकान-मालकिन थी, पर उनके और मेरे बीच दिल का कुछ ऐसा रिश्ता है कि हम दोनों बिना कहे ही एक-दूसरे की ज़रूरत और भावनाओं को झट से समझ जाते हैं।

उनका नाम शांति देवी है पर मैं उन्हें प्यार से ‘अम्मा’ कहती हूं। धीरे-धीरे उनके घर के लोगों ने, यहां तक कि मुहल्लेवालों ने भी उन्हें ‘अम्मा’ कहकर बुलाना शुरू कर दिया था। वह मुझसे हमेशा कहती, “तूने तो मुझे जगत अम्मा बना दिया है री।” मैं जानबूझ कर मासूमियत से पूछती, “क्यूं अम्मा आपको बुरा लगता है?” जवाब में वो कहती, “नहीं बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है। तेरा जो दिल करे तू बुला, मुझे बुरा क्यों लगेगा भला? तू तो मेरी लाडो पोती है।” उनकी यह बात सुनकर मैं उनके गले में बांहें डाल कर झूल जाती।

एक बार अम्मा ने कहा, “बेटे तू इतनी पढ़ी-लिखी है, सुंदर भी है, अच्छा-खासा कमाती भी है, फिर तुझे अब तक कोई पसंद नहीं आया क्या?” मैं जवाब में कहा, “क्या कहूं अम्मा… मुझे तो हर तीसरे दिन कोई न कोई पसंद आ जाता है, पर प्रॉब्लम यह है कि यह पसंद किसी एक पर ज़्यादा दिन टिकती ही नहीं। कभी किसी की स्मार्टनेस से मुझे प्यार हो जाता है, तो कभी किसी की सादगी से। कभी कोई निठल्ला लेखक पसंद आने लगता है, तो कभी कोई बिजनेस मैन। अब आप ही बताइए कि मैं क्या करूं?”

अम्मा बोली, “मैंने कब कहा कि तू शादी कर ले! शादी कभी मत करियो पुत्तर, जी का जंजाल है। सिर्फ दोस्ती कर, ऐसे दोस्त बना जिनसे तू अपने दिल की हर बात कह सके। जो तेरी हंसी के पीछे छिपे दर्द को भी पढ़ सके। जब मेरी शादी हुई थी, तब मुझे शादी का मतलब भी नहीं पता था। अब सोचती हूं तो लगता है कि बचपन कितना आज़ाद था मेरा, अगर मेरा बस चलता या मैं तेरे ज़माने में पैदा हुई होती तो कभी शादी नहीं करती। गरीबों की सेवा करती, मदर टेरेसा जैसी बनती। शादी करके तो मेरी ज़िंदगी जैसे नरक बन गयी। मैं अकेली बैठकर घंटों रोया करती थी कि हाय, ये क्या हो गया। कहां फंस गयी मैं, क्यों हो गयी मेरी शादी?”

अम्मा आगे बोली, “जब बच्चे हुए तो यह तक पता नहीं था कि बच्चे हुए कैसे? जब वो मुझे मम्मी कहकर बुलाते, तो बड़ा अजीब लगता था। मैं उन्हें मना करती थी कि मुझे मम्मी न बुलाया करें। मेरे बच्चों को तो आज तक नहीं पता कि उनकी मां पर क्या-क्या बीती है, न उन्होनें कभी पूछा न ही मैंने कुछ बताया। दिमाग तो मालिक ने बहुत दिया, हुनर भी दिया। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई… सब आता था, पर कदर किसी ने नहीं की। इसलिए समझाती हूं बेटा कि शादी कभी मत करियो। मन में बहुत कुछ है, जिसे मैं दुनिया को बताना चाहती हूं, पर पढ़ी-लिखी नहीं हूं न, वरना अपनी आत्मकथा ज़रूर लिखती। लोग पढ़ते या नहीं मुझे नहीं पता, पर मेरे दिल का गुबार तो निकल जाता न।” ये कहते-कहते वह दु:खी और गंभीर हो गई।

मैंने उन्हें ढाढस बंधाने के लिए कहा, “छोड़िए न अम्मा, मैं कौन-सा शादी करने जा रही हूं। मुझे भी अपनी आज़ादी बहुत प्यारी है, आप सुनाइए कोई दूसरी बात।” अम्मा बोली, “मेरे पास नया कुछ कहां से आएगा लाडो सुनाने को? नया तो तेरे पास होगा। तू बाहर निकलती है, मैं तो सारा दिन यहीं चारपाई पर गुज़ार देती हूं।”

“फिर भी अम्मा आपके पास मुझसे ज़्यादा मज़ेदार कहानियां हैं। आपके बचपन की कहानियां, पाकिस्तान की कहानियां और आपकी ज़िंदगी से जुड़ी बाकी तमाम कहानियां। आप बस कहती जाइए, एक दिन मैं आपकी इन सारी कहानियों को लाऊंगी दुनिया के सामने।”

मेरी यह बात सुनते ही उनकी आंखों की की चमक बढ़ गई। उन्हें छिपाने की नाकाम कोशिश करते हुए उन्होंने कहा, “चल हट पगली, मेरी कहानी लिखेगी… ऐसा है क्या मेरी ज़िंदगी में जो तू लिखेगी? कोई मुझे पहचानता भी नहीं, तू अगर लिख भी देगी, तो कौन पढ़ेगा उस कहानी को?”

“क्या बात करती हैं अम्मा! कोई पढ़ेगा क्यों नहीं? आप देखिएगा, आपकी कहानी बेस्ट सेलर होगी, बेस्ट सेलर।” इस पर वह बड़े ही भोलेपन से पूछ बैठी, “वो क्या होता है पुत्तर?” उनका मतलब ‘बेस्ट सेलर’ से था। मैं उन्हें समझाते हुए बोली, “मतलब जो सबसे ज़्यादा बिके।”

यह सुनकर वह बहुत खुश हुई और अपनी ज़िंदगी को फिर से शब्दों में ढ़ालने लगी, “तू मेरे बचपन की कहानियां सुनना चाहती है पुत्तर पर क्या सुनाऊं‍? बचपन को किसी ने बचपन रहने ही कहां दिया। सन् 1952 में पंद्रह साल की उम्र में ही शादी हो गई। तब कोई समझ तो थी नहीं, केवल बचपना था। हम लोग किसान परिवार से थे, मालिक की मर्ज़ी थी तो शादी हो गई। तेरे बाऊजी उम्र में मुझसे 17 साल बड़े थे, उस वक्त उनकी तनख्वाह 100-200 रूपये महीना थी। मेरा तो पूरा परिवार भी अनपढ़ था, फिर भी मेरे आदमी से कभी मेरी लड़ाई नहीं हुई।”

अम्मा आगे बोली, “वो दिन-रात कमाने में लगे रहे और मैं घर के कामों में। 50 साल की उमर तक हम दोनों साथ रहे, लेकिन न तो कभी कहीं घूमने गए, न ही साथ में कभी शहर-सिनेमा ही देखा। हां साथ मिल कर बच्चे ज़रूर पैदा कर दिए, वो भी पैदा क्या किए समझ ले कि बस हो गए और फिर समय के साथ धीरे-धीरे बड़े भी हो गए। मैंने कभी अपनी कोई तमन्ना, कोई ख्वाहिश अपने आदमी के सामने नहीं रखी। न बाहर जाती थी, न किसी से बात करती थी, पर मुझे इस बात का किसी से कोई गिला-शिकवा भी नहीं। शायद मेरे रब को यही मंजूर था। अब इन्हें गुज़रे 20 साल हो गए, फिर भी मुझे कभी इनकी कमी नहीं खली, कभी दु:ख भी नहीं हुआ जाने का। मैंने सत्संग का रास्ता अपना लिया और पूरी ज़िंदगी अपने बाबाजी के सहारे गुज़ार दी। आज बच्चे इज्ज़त करते हैं। कमरे को किराए पर चढ़ा रखा है, उस पैसे से मेरा आराम से गुज़ारा हो जाता है। मुझे कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। दो बार हार्ट-अटैक भी आ चुका है अब तक, पर शायद मालिक ने अभी चंद सांसें और लिख रखी हैं, इसलिए ज़िंदा हूं, खुश हूं।”

जब वह अपनी ही रौ में बही चली जा रही थी, तो मैं बस चुपचाप उनको देखती रही। कितनी गहरी व्यथा छुपी थी उनके भीतर, जिसे सुनने की फुर्सत उनके किसी अपने के पास नहीं थी और एक मैं हूं कि उनकी बातें सुने बिना मुझे नींद ही नहीं आती थी। फिर उन्होंने मुझसे कहा, “न जाने तुझसे कौन से जनम का नाता है बेटे जो तुझे मैं अपनी हर बात कह देती हूं। वैसे तू भी तो आज के ज़माने की है फिर भी तुझे कैसे टाइम मिल जाता है मेरी बातें सुनने के लिए?” मैंने जवाब दिया, “मेरे पास आपकी बातें सुनने का हमेशा टाइम होता है अम्मा, आप इसकी फिक्र मत कीजिए। चलिए जल्दी से आगे बताइए अपनी कहानी।”

मेरी यह बात सुनकर वह खुश हो गयी और किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साह से उन्होंने कहना शुरू किया, “पाकिस्तान के बंटवारे के समय की उम्र कुछ याद नहीं, बस हल्की सी कुछ धुंधली यादें बसी हैं ज़हन में। लाहौर से पीछे डेरा समेल खां में मेरा जन्म हुआ था, वहां मुसलमानों ने आग लगा दी थी। मेरे कई रिश्तेदार उसमें जल कर मर गए थे, मेरे पिता भी वहीं छूट गए। हमें सिर छुपा कर रातों-रात वहां से भाग कर भारत आना पड़ा, मेरा भाई गुरदीप तब आठवीं क्लास में था। मेरी पिता की बड़ी जायदाद थी वहां, सब वहीं छोड़-छाड़ कर आना पड़ा। यहां आकर पहले-पहल हम हस्तिनापुर में रहे, वहां सरकार ने खेती के लिए ज़मीन दे दी, उसमें मेरा भाई काम करता था। हालांकि, दिल्ली आने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा। वहां सरकार ने खेत दिया था और यहां घर बनाने के लिए ज़मीन दे दी, रोज़गार तो खुद ही तलाशना था। भाई ने तो अपना बिज़नस जमा लिया पर मेरी ज़िंदगी नरक बन गई। यहां आने के कुछ ही दिनों बाद मेरी शादी हो गयी।”

फिर शायद वो अचानक से पुरानी यादों के किसी धुंधले सफर पर निकल पड़ी। कुछ देर के बाद जब मैं उन्हें आवाज दी, “अम्मा…अम्मा, कहां खो गयीं?” तब वह वापस से उसी मुद्दे पर आई।

यूं तो यह हर रोज़ का सिलसिला था, उनका कहना और मेरा सुनना। बीच-बीच मैं उनका मन रखने के लिए अपने ऑफिस की कोई बोरिंग-सी बात सुना दिया करती थी। एक दिन मैं सुबह-सवेरे इस इसरार के साथ उनके पास पहुंच गई कि अम्मा, मैं आपकी कहानी, आपकी आत्मकथा लिखना चाहती हूं। मेरी अचानक कही गई इस बात पर उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि सच में उनका सपना हकीकत बन सकता है। भावावेश में वह साफ-साफ कुछ बोल तो नहीं पाई पर गले लगाते हुए मुझे अनगिनत दुआएं ज़रूर दे डाली। फिर अचानक से जैसे उन्हें कुछ याद आया तो बोली, “हाय, पर मैं तुझसे लिखवाऊंगी क्या?”

एक ओर जहां उनकी खुशी का मानो कोई ठिकाना नहीं था, वहीं मेरे जेहन में एक नया स्त्री-विमर्श करवटें ले रहा था। उन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं था कि उनकी बातें, उनके खयालात मेरे स्त्री-विमर्श को एक नई दिशा देने वाले हैं।

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