लिविंग लेजेंड दिलीप साहब, हिंदी सिनेमा आपको हरदम याद करता है

Posted by Syedstauheed in Art, Hindi
December 12, 2017

सिनेमा का इतिहास उसे सभी स्थितियों में एक रूचिपूर्ण विषय बनाता है। इस नज़र से चलती तस्वीरों का सफर एक घटनाक्रम की तरह सामने आता है। इस संदर्भ में सिनेमा का शिल्प तकनीक के मुकाबले समय द्वारा निर्धारित होना, अधिक नज़र आता है। समय के साथ फिल्मों की दुनिया का बड़ा हिस्सा गुज़रा दौर हो जाता है। बीता वक्त, वर्त्तमान और भविष्य का एक संदर्भ ग्रंथ है, इसी तरह सिनेमा की मुकम्मल संकल्पना भी दरअसल अतीत से अब तक के समय में समाहित है। हिंदी फिल्मों का कल और आज, अनेक कहानियों को समेटे हुए है, तस्वीरों की कहानी के भीतर कई और कहानियां हैं।

हिंदी सिनेमा में यूसुफ साहब यानी कि दिलीप कुमार का योगदान, बीते वक्त की बात होकर भी सिनेमा के आज को दिशा दे रहा है। कलाकारों व तकनीशियनों के दम पर यह उद्योग संचालित है, ये शख्सियतें कभी न कभी फिल्म उद्योग के एक्टिव कर्मयोगी रहे। इनकी दास्तान सिनेमा की कहानी को और अधिक रोचक बनाती है।

एक निकट संबंधी की सहायता से युवा यूसुफ को पूना की फौजी कैंटीन में पहली नौकरी मिली थी, महज़ कुछ रुपए की तनख्वाह पर उन्हें सहायक के तौर रखा गया। वह अपने काम से खुश थे, लेकिन कैंटीन के बंद हो जाने के कारण काम जाता रहा। काम छूटा तो पिता गुलाम सरवर खान ने अपने फलों के कारोबार में उन्हें बुला लिया।

कारोबार के सिलसिले में एक बार उनका नैनीताल जाना हुआ। नैनीताल में उस समय देविका रानी और अमिय चक्रवर्ती आगामी फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के लिए उपयुक्त लोकेशन की खोज में आए थे। तब यूसुफ देविका रानी के बारे में नहीं जानते थे। देविका रानी से अंजाने में हुई मुलाक़ात से उनका भाग्य पलटा और देविका रानी ने यूसुफ को मलाड स्थित ‘बॉम्बे टाकीज़’ के दफ़्तर में मिलने आने को कहा।

कुछ दिनों तक यूसुफ वहां नहीं जा सके, इसके बाद एक बार फिर जब उन्हें बुलावा आया तो उन्होंने बॉम्बे टाकीज़ के साथ करार कर लिया। फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से यूसुफ खान ‘दिलीप कुमार’ के स्क्रीन नाम के साथ काम करने लगे। बिजनेस में व्यस्त यूसुफ के पिता फिल्म वालों को पसंद नहीं करते थे, पुत्र के सिने व्यक्तित्व को स्वीकार करने में उन्हें वक्त लगा।

जब दिलीप कुमार ने फिल्मों में अभिनय शुरू किया तो उस समय उनके समक्ष ‘मेरे सपनों के भारत’ की तस्वीर थी। देश में आज़ादी की लड़ाई चरम पर थी। आगे चलकर एक सहिष्णु, धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक और सार्वभौमिक मूल्यों वाले भारत का निर्माण होना था। निश्चित ही इन मूल्यों के दम पर ही आज़ादी का सपना साकार हो सका।

दिलीप कुमार सिनेमा में परिवर्तन के युग में आए थे। इस समय का भारतीय सिनेमा पुनर्जागरण से गुज़र रहा था, उस वक्त पूरा विश्व आर्थिक बदहाली के मझधार में फंसा हुआ था। एक मान्यता के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध से इस स्थिति में बदलाव आया। कह सकते हैं कि युद्ध और उससे उपजे प्रभावों से एक नए विश्व का उदय हुआ था। सिनेमा में भी यह समय नई प्रतिभाओं का उदय लेकर आया, हम देख सकते हैं कि कला के सारथियों की एक नई ज़मात हमारे सामने थी। भारतीय सिनेमा के आगामी दो दशक इन्हीं कलाकारों और तकनीशियनों के नाम रहे।

दिलीप कुमार की ही तरह लता मंगेशकर की प्रतिभा ने भी इस समय को परिभाषित किया। महबूब खान और वी शांताराम जैसे सुपरिचित फिल्मकारों से प्रेरणा लेकर बलदेव राज (बी.आर.) चोपड़ा, कमरुद्दीन आसिफ, राज कपूर और गुरु दत्त भी इस क्षेत्र में चले आए। संगीत के क्षेत्र में नौशाद और अनिल बिश्वास के साथ-साथ शंकर-जयकिशन, ओ.पी. नैय्यर और सलिल चौधरी का भी उदय हुआ। नई प्रतिभाओं के उदय ने नए ज़माने का प्रतिनिधित्व किया, आज़ाद भारत में अभी बहुत कुछ तलाश किया जाना बाकी था। दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों और भाषाओं के लोग सिनेमा के लिए आकर्षण का विषय बन रहे थे।

अब क्षेत्रीय संस्कृतियों की झलक फिल्मी गीतों में स्थान पाने लगी। यह गीत भाषाओं की विविधता को प्रतिबिंबित करने के प्रयास में जुटे रहे। अब फिल्मों की शूटिंग देश के दूर-दराज़ की लोकेशनों पर की जाने लगी। कश्मीर से लेकर असम-बर्मा बार्डर पर स्थित पर्यटन स्थलों को सिनेमा ने शेष भारत से परिचित कराया। दिलीप कुमार की ‘आज़ाद’ और ‘मधुमती’ इस दिशा में सहायक रही। इस पहल से पर्यटकों ने यहां आना-जाना शुरु किया।

दिलीप कुमार की फिल्मों ने अपने समय का सफल प्रतिनिधित्व किया, लोगों ने उनमें भारत की विविधता का अक्स देखा, यह उन यादगार भूमिकाओं का ही कमाल था। भारतीय सिनेमा में वो नेहरू युग की पहचान बनें, उनकी फिल्में पंडित नेहरू के सपनों को लेकर आगे बढ़ी।

मुगल-ए-आज़म के रिलीज होने के अरसे बाद भी दिलीप साहब की शोहरत व इज्ज़त का आलम उनके चाहने वालों के जुनून से पता चलता है। कहा जाता है कि किसी चाय की दुकान में रेडियो पर उनकी फिल्म का कोई गाना चल रहा होता तो ठहरकर सुनने वाले कद्रदानों की भीड़ जमा हो जाया करती थी।

मुगल-ए-आज़म ने आम दर्शकों के साथ शिक्षित व एलीट वर्ग में भी इश्क के प्रति एक अप्रतिम आकर्षण पैदा किया, प्यार की वह रोशनी जिसकी बदौलत उदासीन दिलों में उम्मीद का उजाला हो गया था। फिल्म में ‘अनारकली’ के किरदार के लिए उपयुक्त कलाकार की खोज बहुत दिनों तक जारी रही, फिर जाकर ‘मधुबाला’ का नाम सामने आया। सलीम की भूमिका के लिए दिलीप कुमार के नाम पर पहले से ही मुहर लग चुकी थी।

इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने बाद दिलीप साहब और मधुबाला का इश्क परवान चढ़ा। शूटिंग के दौरान एक-दूसरे से बनी पहचान धीरे-धीरे आकर्षण में तब्दील हुई, लेकिन फिल्म ‘नया दौर’ के ताल्लुक में एक मुकदमे से इस रिश्ते में तल्खी आ गई। तल्ख रिश्ते का असर मुगल-ए-आज़म की शूटिंग के दौरान महसूस किया गया।

फिल्म के एक दृश्य में सलीम को ‘अनारकली’ के रुखसार पर थप्पड़ लगाना था। शूटिंग के समय दिलीप कुमार ने मधुबाला को ज़ोरदार थप्पड़ मारा, सीन तो ज़रूर पास हो गया लेकिन दिलीप-मधुबाला की मुहब्बत के किस्से वहीं थम गए। ऐसा लगा कि नाराज़ मधुबाला फिल्म की शूटिंग छोड़ देंगी, लेकिन मधुबाला की किसी प्रतिक्रिया के पहले ही आसिफ बीच-बचाव करने आ गए। आसिफ साहब ने मधुबाला को सीन के लिए मुबारकबाद दी और कहा कि वह यह जानकर खुश हैं कि दिलीप आज भी उनसे पहली जैसी चाहत रखते हैं। यह इसलिए भी क्योंकि इश्क की वजह से ही दिलीप कुमार उस तरह पेश आए थे।

हिन्दी सिनेमा के इतिहास में मुगल-ए-आज़म एक मील का पत्थर है। कमरुद्दीन आसिफ की यह फिल्म सात वर्षों में बनकर पूरी हुई थी। शकील बदायुनी के इश्क और जज़्बात से भरे नगमों ने दिलीप कुमार-मधुबाला के किस्सों को रूह देकर, श्रोताओं का दिल जीत लिया था।

पचास दशक के आरंभ तक दिलीप कुमार हिन्दी सिनेमा की एक बड़ी शख्सियत बन चुके थे। दिलीप की पहचान देश के महत्वपूर्ण नायक के रुप में स्थापित हुई। फिल्मों में यादगार रूमानी किरदार निभाने वाले दिलीप कुमार ‘ट्रेजडी किंग’ के रूप में विख्यात हुए। यह कुछ यूं था कि मानो दिलीप और ट्रेजडी एक दूसरे के लिए ही बने थे। लेकिन इस ख्याति ने उन्हें टाईपकास्ट तो नहीं कर दिया था? हां! कर दिया था। एक साक्षात्कार में दिलीप कुमार ने इस छवि के नकारात्मक रूप से बोझिल होने की शिकायत की थी।

क्या दिलीप निजी जीवन में भी प्रेम से आकर्षित थे? सितारा देवी के शब्दों में यूसुफ साहब को निजी जीवन में भी प्यार हुआ था, अभिनेत्री कामिनी कौशल उन्हें सबसे अधिक प्रिय थीं। दिलीप कुमार और कामिनी कौशल ने कई यादगार फिल्मों मसलन नदिया के पार, शहीद, शबनम और आरज़ू से दर्शकों का बेहतरीन मनोरंजन किया। मसूरी से ताल्लुक रखने वाली कामिनी कौशल ने चेतन आनंद की बहुचर्चित फिल्म ‘नीचा नगर’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की थी। यह फिल्म प्रतिष्ठत कांस फिल्म समारोह में पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म थी।

दिलीप कुमार व कामिनी जी के बीच मधुर संबंध फिल्म ‘नदिया के पार’ के समय बढें और कामिनी कौशल के परिवारिक कारणों से यह प्रेम कहानी त्रासद अंत के साथ समाप्त हुई। इसके बाद पिछली बातों को भूलने की कोशिश कर रहे दिलीप कुमार के जीवन में मधुबाला का प्रवेश हुआ। मधुबाला के आने से दिलीप की ज़िंदगी में प्यार लौटा तो ज़रूर लेकिन तकदीर ने उनका साथ नहीं निभाया। दरअसल मधुबाला के पिता ‘अताउल्ला खान’ दिलीप कुमार के साथ उनकी नज़दीकियों से खफा थे। उन्हें लगा कि कमाने वाली मधु अगर कहीं चली जाएगी तो फिर घर कौन देखेगा?

गौरतलब है कि बड़े परिवार में मधु अकेली आमदनी का ज़रिया थीं, इस डर के वजह से पिता ने मधुबाला को दिलीप के साथ ‘नया दौर’ में काम करने से रोक दिया, यह रोल बाद में वैजयंतीमाला ने अदा किया।

इसके बाद दोनों ‘मुगल-ए-आज़म’ में ही एक साथ काम कर सके, उस समय दिलीप कुमार की मधुबाला से बातचीत बंद थी। कमरुद्दीन आसिफ़ दोनों को एक साथ लाने में सफल हुए, आसिफ की इस ऐतिहासिक फ़िल्म में दिलीप-मधुबाला के प्रेम को एक तरह से महान श्रद्धांजली मिली।

दिलीप-मधुबाला ने पहली बार ‘तराना’ में साथ काम किया था। इससे पहले की फिल्मों में कुछ एक सीन में ही दोनो साथ आए थे, लेकिन वह पूरी नहीं हो सकी। तराना में दिलीप कुमार और मधुबाला के पात्रों को बहुत सराहना मिली। इसमें कोई शक नहीं कि शकील बदायुनी के रूमानी नग्मों ने उस मुहब्बत को ज़िंदा रखा। बदायुनी ने जिगर मुरादाबदी और अख्तर सिराज की विरासत को आगे बढ़ाया।

आज गुज़रे दौर के फनकारों की विरासत को ज़िंदा रखने की ज़रूरत है। उन फनकारों के काम को दिलों में जगह देने से वह सदा के लिए अमर हो जाएंगे। आज के आपाधापी के युग में गुज़रा हुआ पुराना दौर भुला सा दिया गया है, वह वक्त दूर नहीं जब दिलीप कुमार जैसे फनकार भी वक्त के साथ भुला दिए जाएंगे।

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