2G: घोटाला खतम पइसा हजम

Posted by Rajeev Choudhary in Hindi, Politics
December 22, 2017

पूरी दुनिया घूमने के बाद यदि आपको अजीब सी मुस्कान के साथ कोई इंसान नज़र आए तो सोचना कि वो ज़रूर किसी जन्म में भारतीय रहा होगा। हम भी खुश होने के लिए अजीब-अजीब से तरीके ढूंढते रहते हैं। एक वो नोटबंदी हुई थी, जिसे मुद्रा परिवर्तन भी कहा गया। उस वक्त बहुत से लोग बेरोज़गार हुए, पर लोग खुश थे। खुश यूं थे कि अमीरों की हालत खराब है, पैसे वाले दु:खी हैं। अभी कुछ महीने पहले ही वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में बताया गया था कि हमारा देश हैप्पीनेस यानि खुशहाली के आंकलन में नेपाल, चीन और पाकिस्तान से भी पीछे है। मुझे यह खबर निराधार लगी, भला अपने नुकसान पर जश्न मनाने वाले लोग दु:खी कैसे हो सकते हैं?

याद है सबको वो 2G घोटाला हुआ था, उसमें अखबार में एक और सात के पीछे इतने ज़ीरो लगे थे कि अगर किसी बच्चें को लिखने के लिए कॉपी देकर ज़मीन पर बैठाकर उसे ज़ीरो लगाने को कहते तो आधे से ज़्यादा तो वह फर्श पर ही लगाता। लेकिन नेता लोग आरोप-प्रत्यारोप की माला बनाकर मंचों से उतरे ही नहीं। भाई घोटाले में इतने ज़ीरो थे कि ज़ीरो की माला बनाते तो पूरा मंच सुशोभित हो जाता।

आज जब मैंने 2G स्पेक्ट्रम की वो खबर पढ़ी जिसमें कोर्ट ने कहा कि घोटाला हुआ ही नहीं है तो अचानक मेरे ज़हन में सात साल पहले की हवा चलने लगी। वो समय जब देश का सदन गूंजा, राजधानी की गलियां गूंजी, न्यूज़ एंकर कुर्ते की बाज़ुओं को चढ़ा-चढाकर इस तरह सवाल पूछ रहे थे मानों अगर आरोपी इस घोटाले के पैसे वापिस नहीं करेंगे तो यह अपनी जेब से देने को तैयार हों। सत्ता पक्ष खुश था कि चलो पैसे आए, विपक्ष भी खुश था कि चलो मुद्दा मिला। न्यूज़ चैनल खुश थे कि खबर मिली, समर्थक भी खुश थे और विरोधी पार्टी के कार्यकर्ता भी उत्साह में बैनर लिए सड़कों पर डोल रहे थे।

इसके बाद देश में परिवर्तन की लहर चल पड़ी, बड़ी-बड़ी रैलियां हुई। कोई असली लाल किले पर खड़ा था तो किसी ने नकली से ही नए भारत का आईना दिखाया। हर जगह, हर रैली में भीड़ थी। हालांकि यह भारत देश है, यहां जिसका मूड होता है वही हज़ार-दो हज़ार बंदे लेकर रैली कर देता है, फिर चाहे 2G का मुद्दा हो, जीजाजी का हो या लालू जी का। 2G स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले के मामले के 17 आरोपियों में 14 व्यक्ति और तीन कंपनियां (रिलायंस टेलिकॉम, स्वान टेलिकॉम और यूनिटेक) शामिल थी। 2G घोटाला साल 2010 में सामने आया जब भारत के महालेखाकार और नियंत्रक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में साल 2008 में किए गए स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल खड़े किए थे।

2G स्पेक्ट्रम घोटाले में कंपनियों को नीलामी की बजाए पहले आओ और पहले पाओ की नीति पर लाइसेंस दिए गए थे, जिसमें कैग के अनुसार सरकारी खजाने को अनुमानित एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ था। हालांकि तब सीबीआई ने जो आरोप दाखिल किया था उसमें लगभग 30 हज़ार करोड़ के नुकसान की बात कही थी, पर आज सुनवाई हुई तो जज बोले एक धेले का नुकसान नहीं हुआ सभी आरोपी निर्दोष हैं। मतलब घोटाला सिर्फ वहम था और वहम की जांच तो हकीम लुकमान भी नहीं कर सका।

यही तो भारत है यहां भीख मांगना और भीख देना अपराध हो सकता है, पर घोटाला करना कोई अपराध नहीं है शायद? ऐसा नहीं हैं कि सिर्फ स्वतंत्र भारत में एक घोटाला हुआ है, दरअसल यहां कुछ हो ना हो घोटाले ज़रूर होते हैं। अब कहां-कहां तक, क्या-क्या नोट करें? किस-किस घोटाले का रिकॉर्ड रखें? मेरा तो अब टीवी खोलने को दिल ही नहीं करता।

कल एक मित्र बड़ी खुशी से फोन कर कह रहा था कि राजीव भाई 2G स्पेक्ट्रम का फैसला सुनकर ऐसा नहीं लगता जैसे बारात की एक पंगत जीम (सामूहिक भोज) कर दूसरी को कहती हो कि आ जाओ भाई तुम भी जीम लो। शायद उसका उदहारण भारत में सत्ता परिवर्तन और नेताओं की ओर इशारा कर रहा होगा?

हां मैं भारतीयों के खुश होने पर चर्चा कर रहा था, हम सिर्फ नोटबन्दी या घोटालों पर ही खुश नहीं होते। याद हैं ना सबको जब मायावती अपनी प्रतिमाओं पर अरबों रुपए खर्च कर रही थी तो उनके समर्थक कुछ इसी तरह खुश थे जैसे आज लोग पटेल की प्रतिमा बनने पर खुश हैं। जो लोग यह सोचते है कि इन प्रतिमाओं से क्या हासिल होगा, दरअसल यह रोतडू टाइप के लोग हैं। वो नहीं जानते इनसें नेताओं के कद पता चलता है। 5 से 6 फिट का नेता अचानक 100 फिट से ऊंचा हो जाता है, समर्थकों के पेट में भले ही रोटी न हो उनके पल्ले रोज़गार न हो पर वो खुश रहते हैं कि देखिये साहब प्रतिमा तो ऊंची बनी।

गोस्वामी तुलसीदास जी को यदि किसी ने फॉलो किया तो सबसे ज़्यादा देश के वोटरों ने किया जब तुलसीदास जी कहा था “कोऊ नृप होऊ हमें का हानी।” हो सकता है कि कल फिर कोई घोटाला हो जाए और समर्थक दूसरे दल की साज़िश बताकर झूम-झूमकर नाच रहे होंगे और पीछे बज रहा होगा ‘ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का…’

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