ग़ालिब को आम लोगों तक पहुंचाने वाले बाबर

Posted by Iti Sharan in Art, Hindi, Society
December 27, 2017

“हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।”

ग़ालिब का बरसों पहले लिखा यह शेर आज भी उतना ही ज़िंदा लगता है। ग़ालिब जैसे पास्ट से आने वाली फ्यूचर की आवाज़ हैं, तभी तो आज शायरी का शौक रखने वालों पर ग़ालिब की शायरी का खुमार खूब देखा जा सकता है। इस खुमार के बावजूद मिर्ज़ा ग़ालिब को समझना उतना ही मुश्किल भी है।

पटना के 40 वर्षीय बाबर एक ऐसे शख्स हैं जिन्होंने ना केवल ग़ालिब को समझा बल्कि ग़ालिब की कृतियों को आम लोगों तक भी पहुंचाया और इस कोशिश में लगातार लगे हुए हैं।

सब्ज़ी बाग में रहने वाले बाबर ने ग़ालिब को जिस कदर समझा है, ग़ालिब को उतना कम ही लोग समझ पाते हैं। पेशे से व्यवसायी बाबर, ग़ालिब को उन सभी लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं जो ग़ालिब को चाहते हुए भी समझ नहीं पाते। बाबर का कहना है, “आज ग़ालिब की कुछ आसान गज़लों से ही ज़्यादातर लोग वाकिफ हैं, लेकिन मैं ग़ालिब की मुश्किल गज़लों को भी लोगों के बीच लाना चाहता हूं।”

बाबर दिलचस्प तरीके से समझाते हैं ग़ालिब के शेर

बाबर फेसबुक के ज़रिये ग़ालिब को आम लोगों तक पहुंचाने की मुहिम में लगे हुए हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से बने फेसबुक पेज पर बाबर ग़ाशायरी को उर्दू, देवनागरी और रोमन, तीनों लिपियों में पोस्ट करते हैं। उसके बाद हर शेर के मुश्किल अलफाज़ (शब्द) का मतलब समझाते हैं। बाबर उस शेर पर एक टिप्पणी भी लिखते हैं। इन टिप्पणियों की खासियत यह है कि टिप्पणी उस समयकाल को समझते हुए लिखी गई होती है। ग़ालिब के व्यक्तित्व को समझने के कारण बाबर उनके किसी भी शेर को बहुत अलग नज़रिये से समझाते हैं।

“इमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र,
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।”

इस शेर को समझाने के लिए बाबर उस दौर की भी बात करते हैं। बाबर बताते हैं कि 1840 के बाद सीधे भारतीयों के धर्म पर हमला हुआ। कई लोगों को ईसाई धर्म अपनाने पर मजबूर किया गया। जिन शुरुआती लोगों को ईसाई धर्म अपनाने पर मजबूर किया गया उनमें से एक थे “मुहीब ए हिन्द” के संपादक मास्टर रामचंद्र (दिल्ली कॉलेज प्रेस), जो कि ग़ालिब के बहुत करीबी दोस्तों में से एक थे। ग़ालिब पर इस घटनाक्रम का बहुत गहरा असर पड़ा और जिसके बाद उन्होंने यह शेर लिखा।

बाबर ने ग़ालिब की गज़लों को गहराई से समझने के लिए उनकी फिलॉसफी, बायोग्राफी सब पढ़ डाली है। उनका कहना है, “ग़ालिब ऐसे शायर हैं जिनकी गज़लों को समझने के लिए पहले उन्हें समझना ज़रूरी है।”

ग़ालिब से हुआ प्यार था एक इत्तफाक

2007 में फेसबुक पर बाबर की नज़र ग़ालिब के एक ग्रुप पर पड़ी और बाबर उस ग्रुप के सदस्य बन गए। उस समय उस ग्रुप पर दूसरे शायरों के कलाम भी पोस्ट हुआ करते थे। बाबर को जब यह बात खटकी तो उन्होंने पेज के एडमिन को सन्देश भेजा मगर उनका कोई जवाब नहीं आया। ग्रुप में कुछ सीरियस लोग भी थे जो ग़ालिब को गहराई से समझना चाहते थे। जब बाबर ने ग़ालिब की शायरी को समझाना शुरू किया तो इन लोगों का ध्यान बाबर की ओर गया। ग्रुप के लोगों की बाबर से उम्मीदें बढ़ने लगी। लोग उनसे हर शेर पर सवाल दागने लगे, लोगों की इन उम्मीदों ने बाबर को और पढ़ने पर मजबूर किया।

इस बीच उन्हें एहसास हुआ कि ग़ालिब को समझने के लिए सिर्फ ग़ालिब की गज़लों को ही नहीं बल्कि ग़ालिब को समझना ज़रूरी है। ग़ालिब के प्रति इस खुमारी को देख कई साल बाद पाकिस्तान में बैठे ग्रुप एडमिन ने बाबर को जवाब लिखा और ग्रुप एडमिन बनने की बात कही।

इसके बाद बाबर ने ग्रुप में लोगों की राय लेकर उस ग्रुप को सिर्फ ग़ालिब तक सीमित कर दिया, साथ ही दूसरे शायरों की गज़लों के लिए रेख़्ता नाम से एक दूसरा ग्रुप बना दिया। इसके अलावा भी वो ग़ालिब के एक पेज को चलाते हैं, जिसे साढ़े तीन लाख से ज़्यादा लोग फॉलो करते हैं।

लोगों की उम्मीदों ने बनाया गज़लों का उस्ताद

आज फेसबुक पर बाबर की एक अलग पहचान बन चुकी है। बाबर शेरो-शायरी की इतनी गहरी समझ रखते हैं कि कई लोग उनसे गज़ल लिखने की कला भी सीख रहे हैं। बाबर बताते हैं, “मुझे भी पहले इन सबके बारे में कोई जानकारी नहीं थी लेकिन एक सहज प्रवृति थी जिसकी वजह से मैं शेरों को सुधार लेता था। जब मैंने दूसरों को गज़लों में सुधार सुझाना शुरू किया तो लोगों की उम्मीदें बढ़ने लगी।”

वो बताते हैं, “मुझे यह तक नहीं पता था कि ‘रिदम’ क्या होती है और उसे उर्दू में क्या कहते हैं, बाद में पता चला कि रिदम को उर्दू में ‘बहर’ कहते हैं और इस ज्ञान को “इल्म ए अरूज़” कहते हैं। फिर मैंने विस्तार से इल्म ए अरूज़ को पढ़ा और एक हद तक इसमें दक्षता हासिल की। लोगों को गज़ल और रिदम समझाने के लिए कुछ डाक्यूमेंट तैयार किए जिससे उत्सुक मेम्बर्स को बहुत फायदा हुआ और अब बाक़ायदा गज़लों की इस्लाह (सुधार) करता हूं और फेसबुक और स्काइप के ज़रिये शायरी की तकनीक सिखाता हूं।”

बाबर ने जब इस ग्रुप को ज्वाइन किया था तब ग्रुप में 2000 लोग थे, आज यह संख्या बढ़कर 8300 हो चुकी है। बाबर बताते हैं, “रोज़ाना 40 से 50 रिक्वेस्ट आते हैं, मगर मैं सबकी प्रोफाइल चेक करने के बाद ही रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करता हूं ताकि ग्रुप की क्वालिटी बरकरार रहे।”

ग़ालिब की रचना “कादिरनामा” को ला रहे हैं लोगों के बीच

बाबर ना सिर्फ ग़ालिब की गज़लों को ज़िंदा रखने का काम कर रहे हैं, बल्कि ग़ालिब की एक और बेहद दिलचस्प रचना “कादिरनामा” को भी लोगों के बीच लाने की कोशिश कर रहे हैं। ग़ालिब की सातों औलाद की मौत के बाद उन्होंने अपनी बीवी के भांजे आरिफ को गोद लिया था। आरिफ के दोनों बच्चों को फारसी और हिंदी सिखाने के लिए ग़ालिब ने कादिरनामा लिखा था।

कादिरनामा कविता के रूप में लिखा शब्दकोश है, जिसमें नज़्म के ज़रिये हिंदी और फारसी अलफाज़ सिखाए गए हैं।

“चाह को कहते हैं हिंदी में कुआं, दूद को हिंदी में कहते हैं धुआं,
दूध जो पीने का है वह शीर है, तिफ़्ल लड़का और बूढ़ा पीर है।”

आज बहुत कम ही लोग हैं जो ग़ालिब के कादिरनामा के बारे में जानते होंगे। मगर बाबर की कोशिश के कारण ही आज दुनियाभर में फैले पाकिस्तान की स्कूल चेन बिकन हाउस स्कूल सिस्टम के सिलेबस में कादिरनामा को शामिल किए जाने की योजना है। कादिरनामा को लोकप्रिय बनाने में बाबर का बड़ा हाथ है।

उर्दू से नहीं था कोई वास्ता

दिलचस्प बात तो यह है कि बाबर को उर्दू से ना ही कोई खास लगाव था ना ही कोई खास वास्ता। स्कूल के दिनों में थोड़ी बहुत उर्दू सीखी थी। बाबर कॉलेज के लिए जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए तब उनके पिता ने साफ कह दिया कि खत लिखो तो उर्दू में, वरना जवाब नहीं मिलेगा। बाबर को मजबूरन उर्दू में खत लिखना पड़ा। उनके पिता खत में गलतियों को सुधारकर वापस भेजते। यह दौर चलता रहा और बाबर की उर्दू ठीक-ठाक हो गई। एक दिन उनके अब्बू ने उन्हें उर्दू की बहुत मशहूर किताब की सीरीज़ “जासूसी दुनिया” पढ़ने को दी। बाबर को जैसे इस किताब से इश्क हो गया। इस सीरीज़ की 50, 60 किताबें उन्हें मिली। बाबर ने धीरे-धीरे सब किताबें पढ़ डाली और पचासवां भाग खत्म होते-होते उर्दू में रवानी आ गई।

फोटो आभार: Mirza Ghalib

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।