मैनिंजाइटिस की बीमारी से टूटने और उससे उबरने की मेरी कहानी

Posted by Priyanka Goswami in Hindi, My Story
December 9, 2017

मैंने ज़िंदगी में कभी बड़े-बड़े सपने नहीं देखे। हां ये ज़रूर ठाना है कि हाथ कभी मांगने के लिए नहीं बल्कि देने के लिए ही उठाऊं। अपने पहाड़ों के बीच कहीं छोटा सा आशियां बनाने का सपना रखती हूं, जहां खूब सारी सब्ज़ियां उगाऊं और शाम को ठंडी हवा संग चाय की चुस्कियां लेते हुए कुछ गाने सुनूं, किताबें पढूं और कविताएं सुनाऊं।

छोटी-छोटी खुशियों में खुश थी मैं, अपनी ज़िंदगी में व्यस्त और मस्त। शादी के बाद एक बहुत ही प्यारा और सपोर्टिंग पति और परिवार मिला, नौकरी भी अच्छी खासी चल रही थी। कुल मिलकर किसी चीज से न शिकवा था न शिकायत, लेकिन कभी-कभी रात को जब सुकून भरी नींद सोती तो बुरे सपने जगा देते और मैं सोच में पड़ जाती कि कहीं ज़िंदगी में कोई बुरा सपना ना आ जाए। और देखिए बुरे सपने का डर सच बनकर मेरी ज़िन्दगी में मंडराने लगा।

सर में अक्सर दर्द रहता था तो मैं डिस्प्रिन की गोलियां खा चैन पा लेती थी। बुखार आता तो आम जनता की तरह पेरासिटामोल, जिसे राष्ट्रीय दवाई घोषित कर देना चाहिए उसे खाकर सो जाती। यहां से शुरु हुई मेरी लापरवाही की दास्तां लेकिन इस गुनाह में मैं अकेली नहीं थी। बुखार नहीं उतरा तो डॉक्टर ने कहा एडमिट हो जाओ, ब्लड टेस्ट किया तो पता चला टाईफाइड है। कुछ दिनों बाद घर वापसी हुई तो हालत और खराब, सरदर्द के साथ लगातार उल्टियों और बुखार से जान जा रही थी।

अब हमने रूख किया एक नए डॉक्टर का उसने रिपोर्ट देखते ही कह दिया कि आपको तो कभी टाईफाइड था ही नहीं। ये सब सुनकर मन किया कि पुराने डॅाक्टर की खाट खड़ी कर दूं, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था। तब तक मेरी रातें सर पकड़कर वाॅशरूम में उल्टियां करते-करते जा रही थी। उस दर्द में एक पल भी हिमांशु (मेरे दोस्त/पति) ने ना मेरा हाथ छो़ड़ा ना आंखें मूंदी। लगातार उल्टियों की बदबू भी उसे विचलित नहीं कर रही थी। डॉक्टर दवाई देता पर मेरा सरदर्द और उल्टियां रूकने का नाम नहीं लेती तो मैंने खुद बिना डॉक्टर के सिटी स्कैन करने की ठानी।

सिटी स्कैन के वक्त कुछ अजीब सवालों से सामना हुआ जैसे “क्या आप कभी बेहोश हुई हैं, कभी मिर्गी जैसे दौरे आए हैं?” मैं डर गई थी, जान चुकी थी कि कुछ गड़बड़ है। रिपोर्ट्स आने के बाद हम एक न्यूरोलॉजिस्ट से मिले। उसने रिपोर्ट्स देखते ही कह दिया कि आपके ब्रेन में वॉर्म्स (कीड़े) हैं। ये सुनते  ही मेरा मन और मिचलाने लगा और मेरी हालत और बद्दतर हो गई, लेकिन उसकी दवाइयों से भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा।

अब हमने नए डॉक्टर की राह पकड़ी और अब इस नए न्यूरोलॉजिस्ट का कहना था, “आपके सर में कोई वॉर्म्स नहीं है।” अब तो मेरा हमारे देश के डॉक्टरों से पूरी तरह भरोसा उठ चुका था। खैर फिर उसने कहा कि एक MRI करा लीजिए तो यहां भी धोखा हमारे लिए नज़रे बिछा के बैठा था। MRI की रिपोर्ट के अनुसार सब नॉर्मल था। एक लड़की जो बिना पति के सहारे खड़ी भी नहीं हो पा रही है, लगातार उल्टियां कर रही है, उसे सर में असहनीय दर्द है और उसकी रिपोर्ट्स कहती है कि वो नार्मल है!

मेरे मन में अजीब सी नफरत पनपने लगी थी इस बिज़नेस के खिलाफ। हम तो पैसे की ये बर्बादी फिर भी झेल सकते हैं लेकिन वो लोग जो मुश्किल से दो वक़्त की रोटी खा पाते हैं, उनके लिए तो ये उनकी हत्या के जैसा है। लेकिन ये सोच भी ज़्यादा देर दिमाग में नहीं रह पायी क्योंकि अगले ही पल मेरे मुंह से झाग निकलना शुरू हो चुका था और जबड़ा एक तरफ टेढ़ा हो गया था। बाएं हाथ को उठाने की कोशिश की तो हाथ हिल नहीं पाया। आगे क्या हुआ याद नहीं, बस धुंधला दिख रहा था कि मैं गाड़ी में हूं और हिमांशु एक डर और उलझन के साथ मुझे पुकारते हुए गाड़ी चला रहा है। मैं हॉस्पिटल पहुंच चुकी थी, देह में सुईयां और बगल में घबराया हुआ मेरा ये दोस्त जो आंखों में नमी के साथ एक नकली मुस्कान लिए मेरा सर सहला रहा था।

ये वक़्त ज़िंदगी का वो वक़्त था जब सब कुछ मेरे सामने से गुज़र रहा था। मेरा बीता हुआ कल जहां मैंने दिल खोल के प्यार किया, दिल लगाया, दोस्ती की, कभी खुद टूटी तो कभी दूसरों का दिल भी तोड़ा। वो सारे चेहरे जिनसे मैंने प्यार किया, नफरत की, सब नज़र आ रहे थे। मैंने खुद में सबसे माफी मांगी और माफ़ भी किया। छी! कहां फंसे रहते हैं न हम, इतनी छोटी सी ज़िंदगी में नफरत को जगह देते हैं।

बीते कल के साथ मेरे सामने आने वाला कल भी हसीन सपने की तरह गुज़र रहा था। मुझे दिख रहा था मेरे पहाड़ों का घर, फ्योली और बुरांश  (एक तरह के पहाड़ी फूल) से भरा जंगल और उन्हीं जंगलों में मुस्कुराती विलियम वर्ड्सवर्थ की लूसी ग्रे। मैं उसे छूने के लिए उसके पीछे भागती हूं… सुनो रुको! अचानक नसों में लगी सुई अपनी जगह से हिल जाती है और खून की धारा पाइप से निकल कर हथेली में फैल जाती है। हिमांशु नर्स को बुलाते हैं, डॉक्टर ने पेन किलर दिए थे शायद क्योंकि दर्द में कुछ कमी थी। मेरी आंखें फिर बंद हो जाती हैं… पर अब लूसी ग्रे नहीं मिलती।

पता नहीं शाम कब हुई, मेरे सास-ससुर मेरठ से सीधा हॉस्पिटल आते हैं। दोनों मुझे देखते हैं और फूट-फूट के रोते हैं, लेकिन अब तक मैं आंखों से सूख चुकी थी। सच बताऊं तो लोग कहते हैं कि जब इंसान को लगता है कि ये उसका आखिरी वक्त है तो वो अपनों के बारे में सोच के बहुत परेशान होता है, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। सच में मैं उस तड़प में किसी के बारे में नहीं सोच पा रही थी। बस ऐसा लग रहा था कि कोई मेरी जान चुटकी में ले ले। लेकिन तब समझ आया कि मरना आसान है, मुश्किल है तो बस जीना।

फिर कुछ और दवाइयां, सर में दर्द और पूरे शरीर में झनझनाहट के साथ रात बीत गई। अगली सुबह कुछ और टेस्ट कराए गए और फिर एक बड़ी सी सुई से रीढ़ की हड्डी से पानी निकाला गया। नर्स ने कहा, “बहुत दर्द होता है ना इस प्रोसेस से?” मैं कुछ बोल नहीं पाई। वापस हॉस्पिटल का कमरा और सर सहलाता मेरा दोस्त अचानक कह पड़ता है कि “तू घबरा मत, मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगा।” मेरे आंसुओं की एक पतली सी नदी गालों के भंवर में अटककर तालाब बनाने की फिराक में थी शायद कि तभी रिपोर्ट्स आती हैं कि टीबी डिटेक्ट हुआ है, लेकिन ब्रेन में टीबी!

मेडिकल भाषा में मैनिंजाइटिस। “क्या? ये टीबी तो छाती से सम्बंधित बीमारी है न?” अपने आप से ये प्रश्न पूछते-पूछते इस बात की राहत  मिली कि चलो चार महीने बाद पता तो चला कि मुझे क्या हुआ है। मेरे ब्रेन के लेफ्ट, राइट और बीच के हिस्से में बहुत सूजन थी। टीबी के वायरस, मेनिनजेस को काफी हद तक क्षति पंहुचा चुके थे। मेरे सर में इतना दर्द था कि डॉक्टर सर्जरी की तैयारी करने लगे थे, लेकिन मैंने मरना ज़्यादा पसंद किया क्योंकि अब मेरा रत्ती भर विश्वास नहीं था इन डॉक्टर्स पर।

अपने रिस्क पर डिस्चार्ज हुई और फिर चला दवाइयों और 90 इंजेक्शंस लगाने का सफर। दवाइयों ने अंदर से खोखला कर दिया और रोज़ 90 दिनों तक इंजेक्शंस की कवायद ने मुझे तोड़कर रख दिया। सरदर्द में कोई कमी नहीं थी, बड़ी मुश्किल से कुछ खाती तो उल्टियां हो जाती। अब तो मेरा शरीर भी अजीब होता जा रहा था सब डबल दिख रहा था, हाथों में कम्पन थी, चक्कर ऐसे कि खड़ी नहीं हो सकती थी। बुखार वगैरह तो आम सी बात थी।

जब रात में सोती तो सिर्फ उपरवाले से ये कहती कि मेरे हाथ पैर चलते रहें, क्योंकि इंटरनेट पर जितनी कहानियां पढ़ी सबमें इस बीमारी ने लकवा और मिर्गी का अभिशाप देकर पेशेंट को छोड़ा था। जो मुझसे मिलने आता रोता था, ये सब मुझे अंदर तक डर और डिप्रेशन से घेर रहा था।

जब हम बीमार होते हैं तब किसी का भी मोटिवेशनल लेक्चर काम नहीं करता। मुझे तो चिढ़ होती थी जब कोई मुझे कहता कि प्रियंका उठो थोड़ा चलने की कोशिश करो, सबके साथ बाहर बैठो वगैरह-वगैरह, लेकिन ये छोटी-छोटी चीज़ें भी मेरे बस से बाहर थी। मैं इस बात से चिढ जाती कि सामने वाले अपने हिसाब से लेक्चर दे रहे हैं, उन्हें क्या पता मेरा शरीर किसी चीज की इजाज़त नहीं दे रहा है। बहुत नकरात्मक हो गई थी मैं, लेकिन मेरा परिवार हार कहां मानने वाला था और वो मेरे अंदर की प्रियंका को खड़ा करके ही माने।

हालत में सुधार नहीं दिखा तो फिर एक और डॉक्टर की राह पकड़ी इसने मेरी सारी दवाइयों की डोज़ कम की। शायद दवाइयों की कम डोज़ का असर था कि परिवार वालों की मोटिवेशनल स्पीच दिमाग में घुसने लगी और मैंने स्टीव जॉब्स को याद करके सोचा कि मरने से पहले क्या मरना? देखी जाएगी जो होगा।

अब मैं खुद हिमांशु के पास कंघी और तेल लेकर जाती, वो भी बड़ी मुश्किल से मेरे उल्टे-पुल्टे बाल बना ही लेता। सासू मां जब भी अपने काम से छुट्टी लेकर मेरे पास आती तो उनसे खाने का मन ना होते हुए भी कुछ खाने की फरमाइश करती। शाम को इंजेक्शन लगवाने से पहले ससुर के साथ चाय की चुस्की लेती।

मैं आईने के सामने खड़े होकर अपने टूटे शरीर को देखकर अब परेशान नहीं थी, बल्कि खुश थी कि चलो बिना जिम और डाइटिंग के मैं पतली दुबली हो गई। इस तरह से काफी हद तक मैंने इस बिमारी को हरा दिया है, अब वापस ऑफिस ज्वाइन किया है, खुश होकर काम कर रही हूं। बाकी लूसी ग्रे को तो नहीं लेकिन खुद को ढूंढते-ढूंढते अपने पहाड़ों की खाक छानने जल्द निकलूंगी।

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