गुजरात चुनाव: जातिवाद और हिंदुत्व काफी हैं, बाकी मुद्दों की किसे फिक्र है?

गुजरात में पार्टियों ने जिस तरह जातिवाद को हवा दी है, आखिर वो कौन सा जनादेश है जिसे इसका फायदा होगा? धर्म के नाम पर जो तल्खियां फैलाई जा रही हैं, उस आग से भला किसका घर रौशन हो सकेगा? मेरे लिए ये सवाल कोई नए नहीं हैं, शायद ये तब से हैं जब से मैंने राजनीति को समझने की कोशिश शुरू की है। गौरतलब है कि गुजरात में धर्म के नाम पर जो राजनीति चल रही है, कुछ ऐसी ही राजनीति उत्तर प्रदेश में कब्रिस्तान और शम्शान के नाम पर खेली जा चुकी है।

यह वही हिंदुत्व और जातीय समीकरण की बिसात है जो उत्तर प्रदेश और बिहार विधानसभा चुनाव में भी बिछाई गई थी। पारंपरिक रिवाज का रूप ले चुका ये एजेंडा अब तो हर चुनावी मौसम में दोहराया जाता है। बड़े बुज़ुर्ग सही ही कहते हैं कि ये जो सियासी गलियारे का राज-काज है, यहां जनेऊ और खिचड़ी पर तो चर्चा होती है पर रोज़गार और कृषि जैसे सवालों पर बात बदल दी जाती है।

अब गुजरात विधानसभा चुनाव में एक हफ्ते से भी कम समय बचा है। देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले, 2001 से 2014 तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं। मोदी और भाजपा के लिए यह चुनाव साख की लड़ाई इसलिए भी है, क्योंकि गुजरात में करीब 22 साल से भाजपा शासन करती रही है। मोदी पिछले आठ महीनों में करीब 10 से ज़्यादा गुजरात के दौरे कर चुके हैं। भाजपा पिछले कुछ राज्यों की तरह ही यहां भी नरेंद्र मोदी के चेहरे पर मतदाताओं को लुभाने की नीति पर काम कर रही है। इसी रणनीति के तहत ही प्रधानमंत्री 12 दिसंबर को दूसरे चरण का चुनाव प्रचार समाप्त होने तक करीब 50 सभाएं करने वाले हैं।

दूसरी तरफ गुजरात में राहुल गांधी भी सोशल मीडिया से लेकर चुनावी ज़मीन तक काफी सक्रिय नज़र आ रहे हैं, स्वाभाविक है कि यह भाजपा को रास नहीं आ रहा है। विपक्ष ने पहले से ही भाजपा का केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर घेराव कर रखा है, हर दूसरे दिन सरकार के प्रतिनिधियों को नोटबंदी और जीएसटी पर सफाई देनी पड़ रही है। प्रदेश की उलझन के बीच कॉंग्रेस सत्ता पर निशाना साधने की पूरी जद्दोजहद कर रही है, लिहाज़ा यह चुनाव पूरी तरह से भाजपा बनाम कॉंग्रेस है। कोई और दल चुनावी मैदान में ढंग से अपनी उपस्थिती भी नहीं दर्ज करा पा रहा है।

एक तरफ जहां दो दशक से अधिक समय से सूबे की सत्ता चला रही भाजपा अपनी बादशाहियत के लिए लड़ रही है, वहीं गुजरात में सत्ता से लंबे समय से दूर कॉंग्रेस, प्रदेश में फिर से अपने कदम जमाने की कोशिश कर रही है।

इस अखाड़े में धर्म और जातिवाद के समीकरणों की हर मुमकिन आज़माइश चल रही है। कौन हिन्दू है, कौन हिन्दू नहीं है। कौन गुजरात का बेटा है और किसने चाय बेची है। विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में भी बिल्कुल इसी तरह खुद को उत्तर प्रदेश का बेटा कहने की खूब होड़ मची थी। प्रदेश चाहे जो हो, असल मुद्दे नदारद ही रहते हैं।

मोदी के भाषण में अब अच्छे दिन के बोल सुनाई नहीं देते है, विपक्ष के वार में भी अब वो धार नज़र नहीं आती है। असल में कॉंग्रेस को भी जातिवाद की रणनीति ज़्यादा कारगर लग रही है। कॉंग्रेस की चालें खुद के ही गले की फांस साबित हो रही हैं। अगर बहस किसानों की मुसीबतों, रोज़गार, व्यापार और महंगाई पर होती तो ये वार-पलटवार सार्थक था। इधर-उधर की बातों से सिर्फ लोगों को भ्रमित किया जा सकता है, उनका भला नहीं किया जा सकता।

गुजरात में अन्य पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी की आबादी सबसे ज़्यादा करीब 40 प्रतिशत है, वहीं पाटीदार समाज की आबादी करीब 12 प्रतिशत है। इसका जोड़ 52 प्रतिशत बैठता है, अब यह संयोग तो नहीं हो सकता कि कॉंग्रेस और भाजपा ने करीब 55 प्रतिशत सीटें पाटीदार और ओबीसी उम्मीदवारों को दी हैं। दलित 7 से 8 प्रतिशत हैं तो मुस्लिम आबादी करीब 10 प्रतिशत है। पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल, ओबीसी वर्ग के नेता अल्पेश ठाकोर और दलित समुदाय के नेता जिग्नेश मेवानी की तिकड़ी से करीब 60 प्रतिशत वोटबैंक साधने की कॉंग्रेस की रणनीति जगजाहिर है।

योगी आदित्यनाथ को गुजरात की चुनावी जंग में उतारकर भाजपा अपने परंपरागत हिंदुत्व कार्ड का दांव पहले ही खेल चुकी है। राज्य मे हिन्दू आबादी तकरीबन 89 प्रतिशत है। दरअसल जातीय आंदोलनों के चलते भाजपा की गणित सही बैठ नहीं रही थी। कहीं ना कहीं राहुल गांधी की धार्मिक आस्था पर विवाद छेड़कर भाजपा ने अपने हिंदुत्व एजेंडे का रूख साफ कर दिया है। हालांकि टिकट वितरण में जातिवाद जरूर हावी नज़र आ रहा था पर भाजपा की नीति साफतौर पर जातिवाद बनाम हिंदुत्व को आज़माने की ही है।

कहने को तो उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव की सफलता से पार्टी का मनोबल बढ़ा है पर गुजरात में अभी की 116 सीट लाना भाजपा के कई दिग्गज खुद चुनौती मान रहे हैं।

जातिवाद, हिंदुत्व और आस्था जैसे मुद्दों से सत्ता को साधना जायज़ तो बिल्कुल नहीं हो सकता है। जिन मुद्दो पर असल बहस होनी चाहिए उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही है और फिजूल के विषयों पर नेता महाभारत लड़ने पर आतुर हैं। यह राजनीतिक रणनीति है या बस छलावे का पैंतरा? ऐसे में जो हो रहा है वह लोकतंत्र के साथ बेईमानी नहीं तो और क्या है?

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