केवल पुलिस में सुधारों से नहीं हल होगी बढ़ते अपराधों की समस्या

Posted by Prashant Pratyush in Hindi, Society
December 7, 2017

सभ्यता की शुरूआत के बाद सामुदायिक जीवन* में इंसानी विश्वास ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाया। सामुदायिक जीवन के विश्वास ने व्यक्तियों की खामियों को दूर करने की सामाजिक कोशिशें भी शुरू की। पारंपरिक और आधुनिक दोनों ही जीवनशैलियों में तमाम सामाजिक कोशिशों के बावजूद इंसानी खामियों पर लगाम नहीं लग सकी। इसलिए समाज में प्रेम, बंधुत्व, भाईचारे के साथ अपराध, सभ्य और असभ्य समाज की खूबियां-खामियां बनी रही और समाज में “रामराज” जैसी परिकल्पनाएं* भी बनती-संवरती रही।

30 नवम्बर को राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) ने देश में अपराध के आंकड़े जारी किए। इन आंकड़ों में अपराधों में वृद्धि, विशेषकर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि तमाम राज्य सरकारों की महिला सुरक्षा के विषय पर गंभीरता की कलई खोलती है। ताज़ा आंकड़े महिला सुरक्षा के लिए राज्य सरकारों के मोबाईल एप और एंटी रोमियो स्क्वांयड जैसी कोशिशों को धता बता रहे हैं। ज़ाहिर है कि पुलिस तंत्र की कार्यशैली में सकारात्मक और प्रभावी बदलाव की अधिक ज़रूरत है।

किसी भी समाज में इंसानी खामियों को केवल सख्त कानून के सहारे नियंत्रण नहीं किया जा सकता है, इसके लिए जनचेतना और सामाजिक चेतना* का विकास भी ज़रूरी है।

शायद इसे देश की तमाम राज्य सरकारों ने कभी भी प्राथमिकता पर नहीं रखा। कोई भी समाज किसी भी अपराध के खात्मे के लिए पुलिस प्रशासन की ज़िम्मेदारी को प्राथमिक मानता है और अपनी स्वयं की ज़िम्मेदारी से मुक्त रहना चाहता है। जबकि किसी भी सामाजिक समस्या का समाधान सामाजिक संस्था और सामाजिक सहभागिता* के अभाव में संभव नहीं है। विश्व के देश जो अपराध नियंत्रण में अव्वल हैं, मसलन- सिंगापुर, आइसलैंड, नार्वे, जापान, हांगकांग, इन देशों ने कठोर कानूनों के साथ-साथ समाज की सहभागिता और ज़िम्मेदारी पर भी काम किया है।

फोटो आभार: flickr

मौजूदा स्थिति में भारत विश्व का सातवां सबसे बड़ा पुलिस बल वाला देश है, यहां तकरीबन 30 लाख पुलिसकर्मी हैं। ज़ाहिर है कि कानून व्यवस्था को सामान्य रखने में नाकामी, इच्छाशक्ति और पुख्ता रणनीति की कमी के कारण भी है। इससे निपटने के लिए एक व्यापक कार्ययोजना पर अमल करने की ज़रूरत है। साथ ही सामाजिक यथास्थिति से निपटने के लिए मानवीय मूल्यों के प्रति समाज को जागरूक करना अधिक ज़रूरी है क्योंकि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में अपराध की मनोवृत्ति* में काफी फर्क है।

शहरी क्षेत्रों में अपराध की मनोवृत्ति में जीवन में आगे बढ़ने की ललक और स्वयं के अंदर बेहतर होने का भाव है तो ग्रामीण अपराध की मनोवृत्ति लैंगिक एवं जाति के आधार पर अधिक है। लैंगिक और जाति के आधार पर होने वाले अपराधों का कारण परंपरावादी समाज में बंधुत्व भाव का नितांत अभाव है जिसके समाधान के लिए केवल कानून पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। आधुनिक होते हुए भारतीय समाज में आज भी जाति या मज़हब जानने के बाद घरों में चाय की प्यालियां तक बदल दी जाती हैं।

सामाजिक व्यवहार में बदलाव का अंदाज़ा यहां से लिया जा सकता है। इसके समाधान के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में व्यापक बदलाव करना ज़रूरी है। ज़ाहिर है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में अपराध के ग्राफ में बढ़ोतरी का एक कारण सामाजिक परिस्थितियों में प्रत्यक्ष* और परोक्ष* सामाजिक नियंत्रण का अभाव होना है।

हाल के दिनों में भारतीय सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में एक नहीं सैकड़ों इस तरह के उदाहरण मिल जाएंगे, जहां महिलाओं को अस्मिता के सवाल पर चुनौतियां मिली हैं। साईबर स्पेस में युवा लड़कियों की मुखर अभिव्यक्तियों पर कुंठित या खास मानसिकता वाले कमेंट या ट्रोल करने वालों की भाषा से इसे समझा जा सकता है। हाल के दिनों में इस मनोवृत्ति का विस्तार समान्य सामाजिक जीवन में भी हुआ है। दुर्भाग्य और शर्मनाक स्थिति यह है कि अन्य लोग या समाज-समुदाय इन चीजों पर फुसफुसा कर रह जाते हैं। इन स्थितियों से यह सिद्ध होता है कि सामाजिक व्यवहारों में हम लोकतांत्रिक चेतना के विकास से चूक गए हैं।

कहीं न कहीं सामाजिक-सांस्कृतिक सामाजीकरण, स्त्री-पुरुष समानता के मूल पाठ को समझाने में असफल रहा है जो महिलाओं के साथ समानता का भाव पैदा नहीं होने देता है। इस कारण समाज और सामाजिक सस्थाओं में भी लैंगिक समानता को लेकर श्रेष्ठता का भाव रहता है, जो सामाजिक व्यवहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध पैदा करता है।

देश में अपराध के आंकड़ों में सुधार के लिए ज़रूरी है कि अपराध नियंत्रण के लिए कठोर कानून के साथ पुलिस प्रशासन और समाजिक सहभागिता की ज़िम्मेदारी के लिए जागरूकता बढ़ाई जाए।

समाज और प्रशासन के बीच प्रभावी भागीदारी के अभाव में अपराध नियंत्रण एक दुरूह* चुनौती की तरह है। साथ ही लोकतांत्रिक तरीकों से सामाजिक और आर्थिक विषमता को कम किए बिना भी अपराध नियंत्रण असंभव है।

थम्बनेल और फेसबुक फीचर्ड फोटो आभार: flickr (फोटो प्रतीकात्मक है)

1- सामुदायिक जीवन- Community Living  2- परिकल्पनाएं- Hypotheses  3- चेतना- Conscience
4- सहभागिता- Cooperation  5- मनोवृत्ति- Disposition  6- प्रत्यक्ष- Direct  7- परोक्ष- Indirect  8- दुरूह- Tough  

 

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