गुजरात चुनाव: काँग्रेस का बनाया माहौल BJP ने लूट लिया

Posted by Vaibhav Singh in Hindi, Politics
December 19, 2017

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद जब नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 साल का कार्यकाल पूरा कर गुजरात विकास मॉडल के सहारे दिल्ली की सत्ता पर आसीन हो गए, तब से गुजरात राजनीतिक रुप से काफी अस्थिर रहा है।

मोदी के देश की सत्ता संभालने के बाद आनंदीबेन पटेल गुजरात की मुख्यमंत्री बनी। उसके बाद जब हार्दिक पटेल ने पटेल आरक्षण की मांग उठाते हुए पाटीदार आंदोलन शुरू किया तो मांग ना माने जाने पर पटेल समुदाय व्यापक हिंसक आंदोलन पर उतर आया। पाटीदार आन्दोलन के दौरान कानून व्यवस्था को स्थिर रखने में नाकाम रही आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा।

भाजपा ने स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए विजय रूपानी जैसे नए चेहरे को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, लेकिन गुजरात की स्थिति फिर भी नहीं सम्भली। वह भी आनंदीबेन पटेल की तरह नाकामयाब रहे और स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। पाटीदार आंदोलन शुरू के दौरान हुई हिंसा में पुलिसिया फायरिंग में 1 दर्जन से अधिक आंदोलनकारी मारे गए और उन युवाओं का नेतृत्व कर रहे हार्दिक पटेल एक नए चेहरे के रूप में राजनीति में स्थापित हुए।

गुजरात अभी पटेल आंदोलन से उबरा ही था कि गुजरात के विकास के पागल होने की सरकारी मुनादी 2015 की आर्थिक रिपोर्ट ने कर दी। गुजरात देश के शीर्ष पांच राज्यों से फिसलकर दसवें स्थान पर आ गया था। लेकिन गुजरात को अभी और अधिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दुर्दिन देखने थे।

11 जुलाई 2016 को कथित रूप से खुद को गौरक्षक कहने वाले असमाजिक उपद्रवी गुंडों ने गिर सोमनाथ जिले के ऊना गांव में मरी हुई गायों की खाल उतारने वाले 4 दलितों को गौहत्या के शक में पकड़कर बेरहमी से पीटा। इससे पूरे गुजरात में दलितों में आक्रोश फैल गया, संबंधित उपद्रवियों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर जांचकमेटी गठित तो कर दी गई, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में 18 दिन का समय लग गया। इन 18 दिनों के बीच में जो आंदोलन चला उसका नेतृत्व जिग्नेश मेवानी ने किया और गुजरात की दलित राजनीति को जिग्नेश मेवानी के रूप में एक युवा दलित नेता मिला।

इन दो घटनाओं ने गुजरात के जातीय समीकरण में तगड़ी हलचल पैदा कर दी और ओबीसी कम्युनिटी का नेतृत्व करने के लिए एसटी एकता मंच के जरिए अल्पेश ठाकोर का गुजरात की राजनीति में ओबीसी नेता के तौर पर 2016 में ऊना आंदोलन के आस-पास ही जन्म हुआ। जुलाई के बाद अभी माहौल शांत ही हुआ था कि भारत सरकार ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा कर दी। इसे काले धन के खिलाफ उठाया गया बड़ा और साहसिक कदम बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “वह देश और समाज के लिए कड़े और सख्त कदम उठाते रहेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी राजनीतिक कीमत क्यों नहीं चुकानी पड़े।”

नोटबंदी के बाद गुजरात अभी आर्थिक उठा-पटक से सम्भल ही रहा था कि 1 जुलाई 2017 को मोदी सरकार ने ‘एक देश एक कर’ का नारा देते हुए वस्तु एवं सेवाकर यानी जीएसटी लागू कर दिया। अब क्योंकि गुजरात की हवा में ही व्यापार है तो जीएसटी के बारे में फैली हुई अफवाहों और सरकार द्वारा जनित परेशानी के कारण गुजरात के सामान्य व्यापारी वर्ग में आक्रोश फैल गया।

गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद से ही देश में लगभग हर राज्य के चुनावों में अजेय साबित हो रही भाजपा और अपनी राजनीतिक अस्मिता बचाने के लिए पूरा विपक्ष, परोक्ष-अपरोक्ष रूप से एक दूसरे के सामने थे। गुजरात की महत्व आप सिर्फ इस बात से लगा सकते हैं कि 2019 में वापस सत्ता के लिए लालायित मोदी सरकार ने इसे अपना सेमीफाइनल समझा और विपक्ष ने इसे सीधे-सीधे प्रधानमंत्री की साख से जोड़ा।

प्रधानमंत्री की साख से जुड़ा होने के कारण और प्रधानमंत्री का गृह राज्य होने के कारण पूरे देश का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भविष्य इन चुनावों से जुड़ा हुआ था। गुजरात चुनावों का महत्व विपक्षी पार्टियां भी समझ रही थी, चुनावी विश्लेषक पैनी नज़रों से इन चुनावों को देख रहे थे और राहुल गांधी भी इस चुनाव की गंभीरता को बखूबी समझ रहे थे।

राहुल गांधी ने इन चुनावों को पूरी गंभीरता से लिया। वो सूरत में व्यापारियों से मिले, हार्दिक पटेल से बात की, जिग्नेश से हाथ मिलाया और अल्पेश ठाकुर को चुनावी टिकट दिया। गुजरात चुनावों में एक बड़ा ध्रुव बनकर उभर रही युवा शक्ति को राहुल ने अपने साथ लिया और बेरोज़गारी के मुद्दे को उठाया। राहुल ने हर रोज़ एक सवाल पूछकर भाजपा के खेमे में हलचल पैदा कर दी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अपने सवालों से असहज कर दिया।

सालों से राजनीति की प्रयोगशाला बने गुजरात में एक बार फिर राजनीतिक प्रयोग करते हुए काँग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व के मुद्दे को उठाया। इसी क्रम में राहुल गांधी ने काँग्रेस के चुनाव-प्रचार के दौरान गुजरात के 27 मंदिरों में पूजा-अर्चना की और गेम्स ऑफ गुजरात को एक रोमांचक रणक्षेत्र बनाकर हताश काँग्रेस में एक नई जान फूंक दी।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों की माने तो माहौल काँग्रेस की ओर बनता दिखा और कहा जाने लगा कि काँग्रेस गुजरात में विजयी होगी, लेकिन तभी काँग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं ने एक बड़ी गलती कर दी, जिसका खामियाज़ा राहुल गांधी को गुजरात चुनाव के परिणामों में भुगतना पड़ा। पहली गलती काँग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल ने की, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर की सुनवाई को टलवा दिया। बीजेपी ने इस मौके को पूरी सक्रियता के साथ भुनाया और चुनाव को हिंदुत्व मोड़ पर ला खड़ा किया जिससे काँग्रेस को नुकसान पहुंचा। दूसरी गलती काँग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘नीच’ कह कर कर दी, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लिए ‘नीच जाति ‘के रूप में लिया और गुजरात की हवा अपने पक्ष में कर ली।

मुकाबला कड़ा होता देख बीजेपी ने चुनाव को युद्ध मानते हुए और ‘युद्ध में सब जायज है’ के सिद्धांत का पालन करते हुए बेहद आक्रामक तेवर के साथ काँग्रेस पर हर तरीके से प्रहार करना शुरू किया। नई जमी काँग्रेस , बीजेपी के संगठित आत्मविश्वास से भरी मोदी जैसे करिश्माई नेतृत्व के सामने टिक ना सकी। परिणामस्वरुप बीजेपी ने गुजरात में 99 सीटें जीतकर फिर से बहुमत हासिल किया लेकिन काँग्रेस ने भी 77 सीटें जीतकर एक मजबूत विपक्ष खड़ा किया।

इतना तो तय है कि गुजरात चुनावों ने भाजपा को अपना विश्लेषण करने के लिए मजबूर ज़रुर कर दिया है, क्योंकि काँग्रेस ने जितनी भी सीटें गुजरात में जीती वो काँग्रेस की जीत नहीं बल्कि भाजपा की हार थी।

लेकिन विजय तो विजय होती है, भाजपा की जीत ने एक बार फिर यह साबित किया है कि आने वाले कुछ सालों तक के लिए देश में मोदी का कोई विकल्प दूर-दूर तक नहीं है।

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