राजनीतिक साम्प्रदायिकता की चिंगारी अब मेरे अपनों के बीच पहुंच चुकी है

Posted by authoransari
December 20, 2017

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2014 के बाद बहुत कुछ बदल गया, चाहे शहर हो या गांव सब कुछ बदला हुआ है। लोग बदल गए हैं उनके विचार और समाज को देखने का नज़रिया भी बदल गया है ! मेरे पड़ोसी का लड़का जिसने कभी गुड मॉर्निंग के अलावा मुझसे कभी किसी और तरीके से अभीवादन नहीं किया वो अचानक ही एक सुबह ऑफिस जाते वक्त मुझसे जय श्री राम कहता है। अगर यह बदलाव अच्छा है तो बेहतर है अगर नही तो यह खतरनाक है ! मैं अक्सर जब भी उसे देखता हूँ तो यह सोचता हूँ जिस लड़के ने कभी सुबह उठ कर अपने माँ बाप को नमस्कार तक नही किया वो आज जिससे भी मिलता है जय श्री राम कहता है !

आप सोच रहे होंगे की भला जय श्री राम से मुझे क्या दिक्कत है ? आप सही सोच रहे हैं, लेकिन आपको बता दूं कि मुझे जय श्री राम से कोई दिक्कत नहीं है, मुझे बेचैनी हो रही है कि आखिर उस लड़के के जय श्री राम कहने के पीछे किस तरह का विचार दौड़ लगा रहे हैं ! मेरे ऑफिस में काम करने वाले ज़्यादातर लोग हिन्दू हैं, मुस्लिम बस पांच लोग हैं। उनमें से कोई जय श्री राम कह के मिलता है तो मुझे असहजता महसूस नहीं होती क्योंकि सालों से वो जय श्री राम कहते आ रहे हैं और जवाब में मैं भी जय श्री राम कह देता हूं।

मेरे डिपार्टमेन्ट में एक पाण्डेय जी हैं वो हर सुबह मेरे ऑफिस पहुंचने पर मुझसे जय बजरंग बली करके मिलते हैं और जवाब में मैं उन्हें हर बार की तरह जय बजरंग बली ही कहता हूं कभी-कभी वो सलाम भी कह देते हैं लेकिन उनका उच्चारण आज भी कुछ खास नहीं सुधर पाया है,  ठहर कर बोलते हैं तो सही तरीके से सलाम करते हैं वरना जल्दबाजी में वह अर्थ का अनर्थ कह देते है इसी लिए मैंने उन्हें कह दिया पांडेय जी आप जय बजरंग बलि ही बोलिये  आप पर जचता भी है !

अब वापस आते हैं, आप सोच रहे हैं कि जब मुझे ऑफिस के लोगो के जय श्री राम, जय बजरंग बली और जय कृष्णा इत्यादि इत्यादि से कोई परेशानी नहीं है तो फिर कुछ लड़को के जय श्री राम कहने से मुझे परेशानी क्यों हो रही है! संडे का दिन था, मैं घर पर था, दोपहर को खाना खा कर सो गया, शाम को उठा और बाहर के दरवाज़े पर खड़े होकर डूबते हुए सूरज को देख रहा था। अचानक से वो आया और बोला भईया आपके भाई लोग जीत रहे हैं , मैं समझ नहीं पाया ? क्या मतलब है तेरा कि मेरे भाई लोग जीत रहे हैं “अरे भईया आपके भाई लोग मैच जीत रहे हैं ” अरे भाई मेरे भाई तो अभी दुकान पे होंगे वो भला कौन सा मैच खेलेंगे , क्या आप भी समझे नहीं आज इंडिया पाकिस्तान का मैच है और पाकिस्तान मैच जीत रहा है ! इतना सुनना था कि मैं सन्न रह गया, पता नहीं मुझे क्या सूझा, मैंने उससे बोला अरे पगले अगर वो मेरे भाई हैं तो तू भी तो उनका भाई लगेगा ना यानि वो भी तेरे भाई ही हुए! इतना कहना था कि बस भड़क गया वो, भईया कुछ भी बोलो मगर उन्हें मेरा भाई मत बोलो। अरे तू नाराज़ क्यों हो रहा है, देख तेरी बहन मुझे राखी बांधती है तो मैं उसका और तेरा बड़ा भाई हुआ और अगर वो पाकिस्तानी क्रिकेटर मेरे भाई हैं तो इस लिहाज से तो वो तेरे भी भाई हुए न?

उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि राजनीती के द्वारा फैलाई गयी साम्प्रदायिकता की चिंगारी  मेरे अपनों के बिच भी पहुंच चुकी है ! आज हमारे शहर का ये आलम है की हर दस में से सात से आठ नौजवान किसी न किसी संगठन से जुड़ रहा है और सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित होकर समाज में असंतोष असुरक्षा की भावना को बल दे रहा है ! हाल में ही कुछ संघठनो द्वारा रैली निकाली गयी जो रैली हर साल सीधे रोड से होते हुए बिना कही रुके गुजर जाया करती थी वही रैली शाम के नमाज के वक़्त जब मस्जिद के करीब पहुंची तो वह रुक गई और डीजे का शोर और नारेबाज़ी होती रही! हम इस बात से इंकार नहीं करते कि हिंदुस्तान में हर किसी को अपने रीती रिवाज़ निभाने की पूरी आज़ादी है लेकिन क्या हम स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह के उकसाने वाले किसी भी तरह की हरकत को छूट दे सकते है !

कई दिनों बाद मुझे पता चला की मेरे मोहल्ले से भी बहुत लड़के उन संघठनो से जुड़ गए है जिसकी कई फोटोज सोशल मीडिया में अपलोड की गयी थी जिसमे से एक लड़का मेरा पडोसी भी है ! सबसे अजीब बात तो यह है की मुल्क की आजादी के पछत्तर साल बाद भी मुसलमानो से आज उनसे वफादारी का सबूत माँगा जा रहा और जिन संघटनो का इतिहास ही अंग्रेजो के तलवे चाटने से भरा पड़ा है आज वो हमे देश भक्त है की नहीं इसका सर्टिफिकेट दे रहे ! हमे हिन्दुओं से डर नहीं लगता डर लगता है तो हिन्दुत्वा के नाम पर फैलाई जा रही सांप्रदायिक विचार धारा से और उससे जुड़े लोगो से पता नहीं कब कहा से एक भीड़ आपके खिलाफ इकठ्ठी हो और आप को किसी चौराहे में मार के जला दे और फिर राष्ट्रवादी नारे लगने लगे जिसका दूर दूर तक राष्ट्रवाद से कोई लेना देना ही नही है !

जो संगठन दिन-रात एक करके आज लौह पुरुष पटेल जी को ज़बरदस्ती अपना इतिहासिक नेता बनाने पे तुला है वही दल और संगठन कल उसी लौह पुरुष को कोसता नही थकता था इनके पास कोई हीरो तो है नही इसी लिए ये दूसरे हीरो को गिडनॅप कर रहे है अब भला जो स्वर्गवासी हो गया है वो आ के थोड़ी न गवाही देगा की मेरा इन सांप्रदायिक लोगो से कोई लेना देना नही है जब आप पटेल नेहरू जी की जीवनी पढ़ेंगे तब आपको पता चलेगा की पटेल और नेहरू में कितनी घनिष्ट दोस्ती रही है और मरते दम तक रही मगर अफ़सोस की आज हम सब सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी से पढ़ के निकल रहे है इसी लिए हमे महापुरषो की लिखी खुद की जीवनी और इतिहासकारो  के किये गए रिसर्च से कोई मतलब नही हमारे लिए तो वही परम सत्य है जो सोशल मीडिया पे ठेला जाता है  ठेलते रहो !

जब भी समाज में असुरक्षा की द्वेष घृणा ईष्र्या की भावना प्रबल होती है तब तब लोग भटकते है और कानून व्यवस्था सब कुछ दाव पे लग जाता है ! आप खुद सोचिये की हम ये किस तरह का समाज अपने चारो तरफ बना रहे है कोई न्यायालय के ऊपर चढ़ कर तिरंगे की जगह भगवा को फहरा देता है और जय श्री राम का नारा लगाने लगता है फिर बाद में वही लोग राष्ट्रवाद का रोना भी रोते है ! एक अधेड़ उम्र के मजदुर को  उसी के शहर का एक राष्ट्रवादी व्यक्ति क़त्ल कर देता है और उसे लव जिहाद का बदला बताता है , ट्रैन में चलता हुआ एक सत्रह साल का लड़का जिस व्यक्ति को अपनी शीट देता है वही व्यक्ति उसका क़त्ल कर देता है और उसकी माँ अपनी सत्रह साल के बेटे की लाश देखती है जिन्दा बेटा भेजा था उसे मारा हुआ औलाद मिला !

मैं नहीं जानता की आप यह सब जो हो रहा है उस पर सोच विचार कर रहे है की नही और अपने आस पास फ़ैल रही सांप्रदायिक विचार धरा को रोकने की छोटी सी भी कोशिश कर रहे है की नही ! अगर आप नही कर रहे तो करिये क्योकि इससे पहले की यह सब चिंगारी भड़क कर अग्नि का रूप लेकर सब कुछ जलाने पे आमदा हो जाये उससे पहले ही हमे इन चिंगारिओं को बुझाना होगा वरना याद रखिये आग सिर्फ जलाना जानती है वो हिन्दू या मुस्लमान नही देखती

भारत की एकता और अखंडता को अगर बचाना है तो एक होना होगा हमे धर्म और जाती से ऊपर उठना होगा और समाजवाद की तरफ जाना होगा यही मार्ग है जिसे हमारे पूर्वजो ने खोजा था यही वह मार्ग जिसपे नेहरू और पटेल चले यही वह मार्ग जिस पर गाँधी जी चले और अब हमे भी इसी मार्ग पे चलना होगा ! अजीब बात तो यह है की यह लोग यह देख नही पा रहे या फिर अनदेखा कर रहे है की जिस राष्ट्रवाद का नाम लेकर बेगुनाहो की लाशे गिरा रहे है इससे राष्ट्र तरक्की नही कर रहा बल्कि तबाह हो रहा है जिस थाली में खा रहे है अब ये उसी थाली में छेद कर रहे है ऐसे लोगो को आस्तीन का साँप अगर कहे तो कोई बुरा नही है !

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