भारत में हिटलर की ‘नफरत पॉलिटिक्स’ नहीं चलेगी बॉस!

हमारे भारतीय परिवेश में आम रुप से हिटलर के समर्थक पहले भी पाए जाते थे, लेकिन आज ये बड़ी संख्या में पाए जा रहे हैं। ऐसे लोग न तो लोकतंत्र में भरोसा रखते हैं और न ही मानवीय स्पंदन में। यह सिर्फ व्यक्तिविशेष तक ही सीमित नहीं है बल्कि आजकल राजनीतिक दल भी नेताओं के लिए हिटलर की संज्ञा का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। जो हिटलर जर्मनी के लिए अभिशाप है, वह भारत में लोगों के लिए प्रासंगिक है!

मैं तो निजी रूप से आप पाठकों से आग्रह करूंगा कि यदि आपके आसपास का कोई भी व्यक्ति हिटलर बनने या हिटलर को नायक के रूप में पूजने का दावा करे तो उसे तात्कालिक प्रभाव से खुद से दूर कर दीजियेगा।

ऐसे लोग पहले समाज के लिए और फिर देश के लिए एक जटिल समस्या के रूप में उभरते हैं। यह एक विडंबना ही है कि बुद्ध, महावीर, गांधी आदि जैसे प्रेरणादायी लोगों की धरती पर हिटलर जैसे क्रूर दरिंदे के वैचारिक जगत को विशेष स्वीकार्यता प्राप्त है।

दरअसल हमारे देश में एक अवधारणा बनाई गई है कि तानाशाही से देश सही हो जाता है, इसलिए भी लोग हिटलर को एक नायक के रुप में पसंद करते हैं। किंतु दुर्भाग्यवश ऐसे लोग हिटलर का ऐतिहासिक रुप से कम अध्यन करते हैं और काल्पनिक अवधारणा के रुप में अपने भीतर ज़्यादा जीवित रखते हैं। ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि हिटलर एक प्रतीक या रुपक के तौर पर केवल तानाशाही को ही सूचित नहीं करता, बल्कि वो एक खास तरह के फासीवाद और तानाशाही को सूचित करता है।

नाजी जर्मनी पर एक पुस्तक छपी है जो हिटलरशाही के प्रभावों को सामने रखती है। बीते कुछ दिनों से उसे पढ़कर खत्म करने पर आमादा था ताकि आप लोगों के साथ कुछे प्रमुख बातों को साझा कर सकूं। पुस्तक का नाम है हिटलर्स विलिंग एक्ज़िक्यूसनर्स: आर्डिनरी जर्मन्स एंड द होलोकास्ट (Hitler’s Willing Executioners: Ordinary Germans and the Holocaust) और इसके लेखक हैं डेनिअल गोल्डहेगन (Daniel Goldhagen)।

वह लिखते है, “असल में फासिज्म की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जो अत्याचार हो रहे थे, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन हो रहा था, जो यहूदियों की निशानदेही के साथ हिंसक प्रवृति अपनायी जा रही थी; एेसा नहीं था कि जर्मनी के आम लोग उससे अवगत नहीं थे और उसके विरोध में थे।”

अर्थात विरोध हो रहा था लेकिन बिल्कुल ना के बराबर, लोग इसे सामान्य और स्वभाविक मानकर चल रहे थे। जब एक सामुदायिक हिंसा (ethnic violence) और लोकतांत्रिक संविधान (Democratic constitution) के पतन को लोग सामान्य रुप से स्वीकार करने लगते हैं, तो उससे फासिज्म के स्वीकार किए जाने की भूमिका बनती है। इसे भविष्य में उस मुल्क के इतिहास में अभिशाप के रुप में देखा जाता है। लिहाजा नागरीकों को यह सनद रहे कि फासिस्ट तानाशाही और दूसरी तानाशाही में फर्क होता है।

फासिज्म में हमेशा स्वतत आंतरिक शत्रु (Internal enemy) की कल्पना की जाती है। आपको महसूस कराया जाता है कि आपके देश के भीतर एक ऐसी किसी संस्कृति और समाज के विशेष लोग हैं, जिससे ये सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। जैसे नाजी जर्मनी में यहूदियों के साथ किया गया। हालांकि भारत में किसी को हिटलर या फासिस्ट कहना बिल्कुल गलत बात है। आज भारत की संस्कृतियां विविध भले ही हैं लेकिन लोकतांत्रिक चेतना इतनी जगी है कि यह संभव नहीं है। इसलिए इस बात की इतनी अतिशयोक्ति भी नहीं करनी चाहिए कि वह गलत युक्ति में तब्दील हो जाए।

इन तमाम मसलों के बाद भी हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि हमने तीन खांचे तय किए हैं- लेफ्ट, राइट और सेंटर। हम हर राजनीतिक दल को जबरन इन्हीं तीनों में से किसी मे घुसाने की कोशिश करते हैं। हम हर नागरिक के विचार, प्रश्न, सिद्धान्त आदि को इन्हीं खांचों में जबरन डालते हैं। परिणामस्वरूप यह हमेशा परेशानी पैदा करता है और हमारा बुनियादी विमर्श मुख्यबिंदु से भटक जाता है।

बहरहाल आप लोग भी हिटलर को विशेष रूप से पढ़िए और अपने आस-पास नवजात हिटलर को फासिस्ट हिटलर बनने से रोकिए। हिटलर भी एक अयोग्य सैन्यकर्मी था और देश के भीतर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी वाली हिंसक भीड़ भी अयोग्य और बेरोज़गार है।

सांस्कृतिक विविधता हिटलर को भी स्वीकार्य नहीं था और सांस्कृतिक विविधता इस हिंसक भीड़ के लोगों को भी स्वीकार्य नहीं है। इस तरह की कई समानताएं हिटलर और इस ज़ाहिल बेरोज़गार हिंसक भीड़ के बीच पाई जाती हैं। इसलिए संभलकर रहिए और अपने अर्जित ज्ञान को लोगों से साझा करके उन्हें भी हिटलर बनने से रोकिए।

फोटो आभार: getty images

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