जैसै-जैसै गाड़ी पटना से कलकत्ता की ओर बढ़ रही थी, मुझे लग रहा था मेरी प्रेयसी मेरे पास है

कलकत्ता जाने की तैयारी मैं जाने कब से कर रहा था। मेरी पहली प्रेयसी के गिटार की आवाज़ सन बारह से मुझे पुकार रही थी, उसका भेजा एक-एक गीत थोड़ा और रबीन्द्र को पास लाता। मुझे बेलूर के घाट, तस्वीरों से खींचते थे। स्मृति में गंध बहुत सालों बाद भौतिक एहसासों के बाद ही बस पाती है, उसके बाद भी उसे बार-बार रिकॉल करना असम्भव सा होता है। सन बारह में कलकत्ता जीतने और जीने के ख़्वाब देखने वाला प्रेमी, प्रेयसी के चले जाने के इतने सालों बाद कलकत्ता की गाड़ी में बैठा। उसने उम्मीदों की लिस्ट नहीं बनाई, उसको वो जंगल अब कहां याद थे जिनकी आवाज़ प्रेयसी के फ़ोन पर बात करते हुए वो सुना करता था और प्रेम भी कैसा कि हम कभी मिले ही नहीं और तब भी बिछड़ गए।

पटना शहर का प्रदूषण परेशान करता है, कई-कई किलोमीटर चलता हूं तो पेड़ झुंड में दिखते हैं और उन पर धूल की मोटी परत। सांस भी मानो धूल के एहसान की तरह टुकड़ों में मिलती है। ऐसे में बेलूर में रहना होगा, हावड़ा देखूंगा और सबसे बेहतर होगा उस हवा में सांस लेना, जहां कभी हवा के घरों में किसी के साथ रहते हुए बंगाली बारिशों के सपने देखे थे। पीली टैक्सी, हुगली, फेरी, हावड़ा ब्रिज, जन सैलाब और तुम्हारी सांवली हथेलियां नदी और हवा के बीच। सब बोझ छूट जाएंगे पटना की सड़कों पर और मैं दो दिन चुरा लूंगा तुमसे टिककर बिताने के लिए।

ट्रेन झटके से रुकी तो मेरी नींद खुली। सोया डग्लस डन पढ़ता हुआ था, उठा तो चौंकता हुए। नेरुदा की एक पंक्ति याद बनकर अटक गयी थी- “ये आख़िर पंक्ति है जो तुम्हारे लिए लिखता हूं, ये आख़िरी दर्द है जो झेलता हूं तुम्हारे लिए।” स्लीपर में ठंड तो हो ही जाती है, खिड़की और कम्पार्टमेंट की दीवार के बीच वो छोटी पतली सी जगह, हवा की तीव्रता बढ़ा देती है। मैंने अपने सर को नए लाल शॉल से लपेटा – पुराना जाने कहां छूट गया था – दिल्ली-बनारस!

अनदेखे शहरों में भी देखे से लोग होते हैं, पर उनका इतिहास अलग होता है। कॉलेज स्ट्रीट पर जितना ज़रूरी किताबें लेना था, उतना ही ज़रूरी कलकत्ता के हाट देखना भी था। भाषाई अंतर के बावजूद जुड़ाव की जो कड़ी थी उसको छूकर आना था।

बेलूर मठ से लोकल में लकड़ी की बेंच पर बैठा पहली बार कलकत्ता चला तो सामने बूढ़े पति-पत्नी बैठे थे, बंगाली अखबार पढ़ते हुए, साथ सफ़र करते हुए, साथ जीवन और अखबार शेयर करते हुए। उसने सब सफेद बाल सलीके से संवारे हुए थे और इस तरह से वो बूढ़ी सुंदरी अखबार का मनोरंजन पन्ना पढ़ती थी, मानो इसकी आदत उसे बरसों से रही हो। अपनी जगह, जहां, जितना चाहे वो फैल सकती थी। मुझे ईर्ष्या हुई, आखिर आप अपने सब शगल इसलिए ही तो करते हैं कि अनंत ब्रह्मांड में अपना स्थान तय कर सकें, चाहे वो कितना ही क्षणिक क्यों ना हो।

जाते हुए ट्रेन लेट होगी, ये भी तय था। आसनसोल गुज़रा, वर्दमान गुज़रा, अब मेरी पीठ बर्थ से अपना सामंजस्य नहीं बैठा सकी। हम भी कहां कभी ये कर पाए मेरी बंगाली नाटकों की नायिका। हम अपने प्रेम बदलते रहे और फिर हमारी गाड़ी कभी एक साथ किसी एक स्टेशन से कहां गुज़री।

जब बहुत बैगेज अपनी पीठ पर जमा हो जाता है तो लगता है जैसे कुछ रीढ़ में डंक घुसाए हुए है और तमाम कोशिशों के बाद भी वहीं जमा रहता है। ये जो भी है अपनी आकृति बदलता हुआ, कभी हल्का, कभी भारी होता हुआ, जीवन के जैसे पकड़े हुए, इसे बेलूर जाकर कुछ क्षण के लिए भुलाया जा सकता है।

रामकृष्ण परमहंस और मेरे जैसे नास्तिक आदमी के बीच संवाद के लिए क्या हो सकता है? एक विपन्न स्वप्न याद है, एक प्रकृति निर्मित पीली मिट्टी के घाट पर, गंगा भी जहां पीली थी। मैं और ठाकुर एक-एक अंगोछा लपेटे, काली की एक मूर्ति को डुबा देने की कोशिश करते थे। प्रतिमा कुछ दूर जाती थी और फिर ठहाके लगाते वापस हमारे पास आ जाती। जैसे हम अपने बोझ खो देना चाहते हों, अपने कष्ट डुबो देना चाहते हों और ईश्वर अगर होता है तो वो बार-बार हंसता हुआ।

नदी के उस ओर दक्षिणेश्वर मंदिर दिखता है, नदी पर हावड़ा और फेरी बोट्स, भीड़ लेकिन घाट पर आसानी से एकांत पाया जा सकता है। आखिर आपका एकांत भी आपके साथ सफर करता है, पर सपने में ये घाट नहीं थे, मिट्टी का रंग भी दूसरा था। विवेकानंद की आशा और नास्तिकता पर विजय वाला कोई अतुलनीय संघर्ष नहीं, फिर भी बेलूर कर्कगार्ड और हेगल को पसंद आता। आस्था की छलांग ने कैसे दुनिया बदली, कैसे सैकड़ों लोगों की मदद हुई और कैसे आपने अपनी लालसाएं छोड़ दी। बेलूर के गेस्ट हाउस का एक कमरा मुझसे दो दिन तक ये सब कहता रहा।

मुझे अपनी लालसाओं से बहुत प्रेम है, क्योंकि आप प्रेम नहीं करेंगे तो बिछोह नहीं झेल पाएंगे। बिछोह के बिना दर्द कहां है और दर्द के अनुभव के बिना सन्यास असम्भव है। प्रेम बिना चाह पैदा हो सकता तो हम मनुष्य हों इसकी आवश्यकता नहीं होती। राजकपूर से ‘मेरा नाम जोकर’ के एक सीन में राजेंद्र ने पूछा, “क्या तुम मीना से प्रेम करते हो?” राजू कहता है, “सवाल यह है कि क्या मैं प्रेम करता हूं?” राजू उस गाइड का भी नाम था जो चोर था, व्यसनी था और जिसने एक दिन संत वाला ताना-बाना लपेट लिया। किताब वाला राजू तो चोर था, भाग निकला – कलकत्ता शहर के मकान और प्रेयसी दोनों, उन कई दर्ज़न विरोधाभासों की तरह हैं, जिनके साथ एक कवि रोज़ जीने का अभिनय कर पाता है।

साल बीत गए, समेट लिया गया सब। जब सब बाहर की ओर सफ़र कर रहे थे, मैंने चढ़ते ही ट्रेन से ताकीद की कि वो मुझे अंदर ले चले। पटना के प्लैटफॉर्म पर जितना दूर उससे था, उतना ही दूर कलकत्ता में भी रहा। स्वत: की ओर दरअसल हम उस रोज़ ही बढ़ जाते हैं, जब हम उससे दूर निकलते हैं।

दो दिनों से क्या बदलेगा? मैं ट्रेन में बैठा और मैंने एक बार सोचा कलकत्ता। जैसे-जैसे गाड़ी पटना छोड़ती थी, वैसे-वैसे मुझे लगता है वह मेरे पास है, कलकत्ता में नहीं। उस रक्त की एक बूंद की तरह जो मेरे हृदय में बैठी रहती है और कहीं सफर नहीं करती। रबीन्द्र का वह गीत- “तुमि रोबे निरोबे हृदय मामो।” उसने एक खत और एक गीत हक से मुझे दिया, मुझे ना जाने ताउम्र उसको कितने खत और गीत लौटने हैं- पश्चाताप में नहीं, प्रेम में।

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