2002 के बाद भाजपा और गुजरात के मोदीमय होने की कहानी

2002 के गुजरात चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की जीत हुई थी। भले ही भाजपा ने गोधरा के मुद्दे को चुनाव प्रचार में शामिल करने से इनकार कर दिया था, लेकिन इन चुनावों में गोधरा का ही मुद्दा छाया रहा।

यही वजह थी कि मोदी का कद, एक हिंदू नेता के रूप में इतना बड़ा हो गया था कि इसके सामने गुजरात में भाजपा का कद भी बौना लग रहा था। वहीं दिल्ली में भी भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व, नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद से भयभीत था।

नरेन्द्र मोदी ने आने वाले समय में खुद की छवि में निरंतर सुधार करने के साथ, गुजरात राज्य की राजनीति को ही नया मोड़ दे दिया। मोदी ने अपनी छवि को उभारने के लिये अपनी शख्सियत को काफी बदल लिया। मसलन 2001 के आखिर में गुरु नानक जयंती के सिलसिले में गुरुद्वारा साहिब में हो रहे प्रोग्राम में मैंने नरेन्द्र मोदी को जब बतौर मुख्यमंत्री देखा था, इस समय वह बहुत सामान्य इंसान की छवि को प्रस्तुत कर रहे थे। दरमियाना शरीर, दाढ़ी में कुछ बाल हल्के काले रंग के भी मौजूद थे। जहां तक मुझे याद है मोदी ने हल्का नीला सफेद रंग का खादी कुर्ता पहन रखा था। बहुत ही सामान्य शब्दों में गुरु नानक जयंती पर इन्होंने सिख संगत को बधाई दी, कुछ शब्द कहने के बाद अक्सर चेहरे पर एक मुस्कान आ रही थी और हाथ आगे की ओर नम्र भाव में जुड़े हुए थे।

2002 के चुनाव के बाद, मोदी की शख्सियत में बहुत बदलाव आया है। अगर हम 2002 से 2007 के समय काल की ही बात करें तो मोदी के चेहरे के बाल अब पूरे सफेद रंग हो गए थे। अब उनका खादी कुर्ता भी अलग ही स्टाइल का हो गया था, अब रंग फीका नहीं था, मोदी अब पीले रंग के कुर्ते में भी दिखने लगे थे। उनकी शख्सियत में गंभीरता के साथ-साथ, समय के साथ आगे बढ़ने वाले चुस्त नेता की छवि को उभारा जा रहा था, लेकिन जो सबसे ज़्यादा बदलाव आया था वह था मोदी के भाषणों में। मोदी एक मजबूत वक्ता बनकर उभर रहे थे।

मोदी, जिस किसी भी सभा या सार्वजनिक मंच पर बोलते, अक्सर माहौल के अनुसार शब्दों के साथ चेहरे के हाव-भाव से लेकर, हाथों का भी अब ज़्यादा इस्तेमाल करने लगे थे। मसलन अगर किसी शिक्षण संस्थान, महिलाओं या बच्चों के सिलसिले में या किसी धार्मिक मंच से किसी कार्यक्रम में अगर वो शिरकत कर रहे होते तो उनके शब्द बहुत विनम्र होते। लेकिन जहां भी उग्र भाव का इज़हार करना होता जैसे सुरक्षा के संबध में, वहां मोदी की आवाज़ ऊंची ओर कठोर हो जाती। उनका हर शब्द नाप-तौल कर बोला गया होता था।

एक वक्ता के रूप में  मोदी ने अपना लोहा सभी चुनावी सभाओं में मनवाया। गुजरात के 2007, 2012 के  चुनाव हों या 2014 के लोकसभा चुनाव, मोदी अपने चलप्रतित लहजे में ही जनता के सामने आए। जब जब इन्हे विपक्ष पर हमला करना होता था तो विपक्ष या कॉंग्रेस जैसे शब्द ही इस्तेमाल होते थे। इस तरह मोदी अपना क्रोध या नारज़गी, एक संगठन के प्रति व्यक्त करने के साथ साथ, विपक्ष या विरोधी संगठन को एक विचारधारा के रूप में दिखाते थे।

अक्सर इनके निशाने पर गांधी परिवार होता था और मोदी इन्हें कुछ अलग ही नाम से पुकारा करते थे, मसलन ‘मैडम सोनिया’, मैडम लगाने का तात्पर्य सोनिया गांधी को विदेशी कहने की तरह था। वहीं राहुल गांधी को अक्सर शहजादा कहा जाता था। शहजादे से तात्पर्य राजनीति में परिवारवाद से भी था परंतु इसे राजकुमार भी कहा जा सकता है। अगर इस पर थोड़ा सोचें तो मोदी कांगेस के मुसलमान समुदाय के प्रति नरम रुख की और भी संकेत दे रहे थे।

दूसरे शब्दों में कहें तो कॉंग्रेस को हिंदू विरोधी करार दिया जा रहा था। विपक्ष के किसी व्यक्ति को निशाने पर रखने के संदर्भ में अक्सर मोदी व्यंग का प्रयोग करते थे। यहां समझने की ज़रूरत है कि विपक्ष को हास्य का पात्र बना देने से विपक्ष की गंभीरता ही खत्म हो जायेगी और जनता अक्सर मतदान करने से पहले राजनीतिक पार्टी की गंभीरता को ही ज्यादा तवज्जो देती है। अब समझा जा सकता है कि विपक्ष को क्यूं अक्सर गुजरात में हार मिलती थी।

अपनी योजनाओं की चर्चा करते समय उनके हाथों का मूवमेंट बढ़ जाता था, सुरक्षा के मुद्दे पर जब भी कोई शब्द आता तो मोदी अपना सीना जरूर थपथपाते। जरूरत के हिसाब से हाथ की उंगली को लोगों की तरफ रखकर सारी सभा की तरफ घुमाया जाता।

सबसे जरूरी जब मोदी को लगता कि उनके कहे गए शब्द सुनने वाले के जेहन में हमेशा के लिये बस जाने चाहिये तो मोदी अपने कहे हुए शब्द या वाक्य पर जनता की सहमती की मोहर ज़रूर लगवाते थे।

जब भी मोदी किसी भी मंच पर आते, हाथ जोड़कर धीमे-धीमे चलते हुये, सारी जनता का इस्तेकबाल दोनों हाथ जोड़कर, चेहरे पर गंभीरता के भाव से करते। वह ये बताने में कामयाब हो रहे थे कि वह एक राजा नहीं जनता के सेवक हैं। यही सब कारण थे कि मोदी का राजनीतिक कद इतना बढ़ गया कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जब तक वह गुजरात में रहे विपक्ष या विपक्ष का कोई भी नेता अपनी मौजूदगी का एहसास जनता को नहीं करवा सका। यहां तक कि भाजपा में भी कोई और नेता नहीं उभर पाया।

मंच पर मोदी के सिवा बाकी नेता बैठे ज़रूर होते थे लेकिन सिर्फ जगह की पूर्ति के लिये। सभा का रंग मोदी के भाषण से असली माहौल में आता था।

यही वजह है कि आज जब भाजपा, पटेल आंदोलन के साथ-साथ दलित और मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी झेल रही है तब भी भाजपा मोदी के सहारे स्पष्ट बहुमत मिलने का संकेत जनता में दे रही है। लेकिन ये बात सभी गुजरातियों को और देश की जनता को भली भांति पता है कि यहां भाजपा के हिस्से में जो भी वोट आएंगे वो सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी की लार्जर देन लाइफ की छवि के कारण ही होंगे।

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