फिरकापरस्त फिज़ाओं के बीच ताज़ी हवा के जैसी है सईद मिर्ज़ा की फिल्म ‘नसीम’

Posted by Syedstauheed in Art, Hindi
December 7, 2017

ज़िंदगी की कीमत बदलते वक्त के साथ हाशिए पर चली सी गई है। फिर चाहे वो आस-पास या पड़ोस में हुई कोई जानी या अंजानी मौत हो या जापान के हिरोशीमा या सीरिया या पेशावर में मारे गए दूसरे बेगुनाह लोग। फिरकापरस्त फिज़ाओं में बेकसूर ज़िंदगियों की मिटते भी हमने देखा है। आम आदमी के जीवन की भला क्या उपयोगिता? सरकारी महकमा छोटी से छोटी सरकारी संपत्ति को लेकर सजग रहा करता है, लेकिन क्या वो भीड़ में किसी एक चेहरे या आम आदमी की जीवन की सुरक्षा को लेकर भी इतना ही संवेदनशील होता है?

सामानांतर सिनेमा ने आम आदमी और हाशिए के सवालों को कई बार शिद्दत से उठाया। सामानांतर फिल्मों का इंकलाब यूं तो पार्श्व में चला गया, लेकिन उसकी गूंज कभी-कभार सुनने को मिल जाया करती है। कह सकते हैं कि संघर्ष का हौंसला आज भी सांसे ले रहा है। फिल्म महोत्सवों में दिखाई जाने वाली भारतीय फिल्मों को देखकर इस बात पर आप भी यकीन करेंगे। सामानांतर या नए सिनेमा की विरासत में सईद मिर्जा की शख्सियत का अपना ही स्थान है।

मिर्ज़ा की फिल्म ‘नसीम’ में बाबरी विध्वंस से पूर्व और उसके बाद उपजे देश के सामाजिक-राजनीतिक हालात का मार्मिक ब्योरा मिलता है।  साम्प्रदायिक तनावों से जूझता एक जरूरी संदेश। फिल्म में फिरकापरस्त तनावपूर्ण माहौल में मुस्लिम परिवार की मुश्किलों को व्यक्त किया गया है।

फिल्म की कहानी तीन पीढ़ियों के वैचारिक मतभेद को दिखाती है। एक पीढ़ी दादाजान की है जो किसी भी किस्म की धार्मिक उथल-पुथल को तात्कालिक मुश्किल मानने वाले भारतीय हैं। दूसरी पीढ़ी में उनका बेटा व बहु हैं। बेटा समझता है कि मुसलमान होने के कारण उन्हें दफ्तर में बेवजह परेशान किया जा रहा है। उनकी सोच अतिवादी नहीं, लेकिन हालात की उपज ज़रुर थी। मुश्ताक व जफर तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधियों के किरदार हैं। असुरक्षा में अतिवादी सोच से पीड़ित मुस्लिम युवा।

कहानी पंद्रह बरस की किशोरी नसीम और उसके दादा की भी है। बुज़ुर्ग दादा की भूमिका में शायर कैफी आज़मी ने प्रशंसनीय अभिनय दिखाया था। यह किरदार कैफी साहब का एक यादगार स्क्रीन अवतार था। संवेदनशील विषय पर आधारित होते हुए भी फ़िल्म में कहीं भी ‘हिंसा’ का वो कथित लोकप्रिय हिंसक प्रारूप दिखाया नहीं गया।

फ़्लैशबेक में कहानी परिवार की पुरानी यादों को लेकर आती है। दादा अपनी मरहूम बीवी को याद करते हुए अक्सर आगरा की पुरानी यादों में चले जाते हैं। मुस्लिम परिवारों में एक से अधिक निकाह करने का चलन होता है, किंतु इस परिवार में यह रस्म नहीं। जवानी में अहलिया की मौत के बाद भी नसीम के दादा ने दूसरी शादी का तसव्वुर नहीं किया। नसीम दादा से जानना चाहती है कि उन्होंने भला ऐसा क्यूं नहीं किया? दादा का जवाब देखिए वो फरमाते हैं, “इस मामले में डर यह था कि वो नहीं बल्कि उनकी अहलिया उन्हें छोड़ चली जाएगी” दादा के मासूम जवाब पर नसीम हंस पड़ती है।

उनकी इस स्वीकार्यता को अनुभव कर दर्शक भी किरदार की प्रशंसा कर जाएंगे। एक गंभीर विषय पर बनी फिल्म में हल्के-फुल्के लम्हे बना लेना काबिलेतारीफ था। पर मुश्किल दिन हंसी-खुशी के पलों के दुश्मन से थे। टीवी प्रसारण देखकर नसीम के पिता झल्लाकर बोल पड़े, “हम यहां जीना चाहते हैं, हमें बाहर क्यूं भेजना चाहते हो?” वतन छोड़कर कहीं और चले जाने के उन सभी मशवरों व दलीलों से नाखुश एक आदमी। इसी बीच त्योहार की रस्मअदाएगी भी मुहाने पर खड़ी थी।

इदुल-फ़ितर की घड़ी में सभी बुज़ुर्ग दादा को त्यौहार की मुबारकबाद देने जाते है। वह मीर-तकी-मीर की पंक्तियों को सुना रहे हैं, बीच में कुछ लाइनें भूलने लगे तो नसीम का साथी युवा ज़फ़र (के.के. मेनन) उसे तल्ख आवाज में पूरा करता है। जफ़र कहता है कि आज इन लाइनों के मायने बदल गए हैं। फिरकापरस्त माहौल में लोग खून के प्यासे हो गए हैं, एक-दूसरे को काट रहे हैं। ज़फर मुस्लिम समाज में व्याप्त असुरक्षा से उपजी कड़वी आवाज़ है। एक सीमा में उसे पीड़ित समुदाय का नुमाइंदा कहा जा सकता है पर हीरो नहीं।

लेकिन उस तंग माहौल में हर मुसलमान ज़फर जैसा नहीं, दादा उस कठिन माहौल में भी व्यवस्था को लेकर आश्वस्त हैं। अब जबकि बाहर की आबो-हवा (नफरत व फसाद) घर में भी दाखिल है (अतिवादी किरदारों की शक्ल में) नसीम के पिता अब्बा से पूछते हैं, “बंटवारे के बाद यहां रूकने का फैसला क्यूं लिया?” कैफी साहब ने हल्की आवाज़ में जवाब दिया “तुम्हें आगरा के घर में लगाया वो दरख्त याद है? उसे मैंने और तुम्हारी अम्मी ने बड़ी मेहनत से सींचा है।” अब्बा की बातों को सुनकर वह गुस्से में बड़बड़ाते हुए बाहर चले गए।

कुछ देर बाद नसीम दादाजान से मासूमियत में पूछती है, “क्या वाकई सिर्फ दरख्त ही वतन को गैर ना करने की वजह थी?” वह इसे कुबूल करते हैं! हम देखते हैं कि कुछ दिनों बाद दादा जी का इंतकाल हो गया। इत्तेफाक से वो बाबरी शहादत के दिन अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं। मुश्किल भरी फिज़ा में अमन की उम्मीद को बड़ा नुकसान हुआ। बदलते माहौल में दादा देश के सांस्कृतिक मूल्यों के नुमाइंदा थे। सरफिरा ज़फर उनके जनाज़े को देख ठंडी आवाज़ में बड़बड़ाता है, “आपके रुकसत होने का यह माकूल दिन है।” वाकई वो एक तरह से जायज़ बात कह रहा था, बाबरी विध्वंस एक पेराडाईम शिफ्ट नहीं था!

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