महिलाओं के सवालों पर चुप्पी तोड़ने का भी रहा यह साल 2017

पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन में भी महिला सुरक्षा और महिला संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति ने विमर्श की सतह पर एक खास जगह बनाइ है। महिलाओं के सवालों पर सामाजिक संस्थाओं के प्रयासों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि कुछ दशकों पहले तक महिलाओं के सवालों पर बात करने की भी सहज स्थिति हमारे समाज में नहीं के बराबर थी। महिलाओं से जुड़ी छोटी-बड़ी या दबी-छुपी बातें गैर-ज़रूरी ही समझी जाती रही हैं।

मौजूदा दौर में महिलाओं के बहस-विमर्श का यह दायरा सभी महिलाओं के सवालों की सटीक अभिव्यक्ति है या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है? भारत जैसे देश में वर्गीय, जातीय और धार्मिक विविधता के साथ क्षेत्रीय, भाषायी, शहरी और ग्रामीण विविधताएं भी है। इसमें और भी कई श्रेणियां हैं जो एक महिला के सवालों को दूसरी महिला से अलग करती हैं। यह श्रेणीबद्धता दिखाती है कि समाज स्त्री-पुरुष के रूप में ही नहीं बंटा है, महिलाओं की आधी आबादी की दुनिया में भी कई तरह के वर्ग मौजूद हैं जो वर्गीय विश्लेषण की मांग करते हैं।

भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा संशोधित मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद 14 फरवरी, 2014 को जारी मतदाता विवरण से पता चलता है, “देश में कुल 814,591,184 पंजीकृत मतदाता हैं। इनमें से पुरुष मतदाता 52.4 प्रतिशत, महिला मतदाता 47.6 प्रतिशत और ‘अन्य’ श्रेणी के मतदाता 0.0035 प्रतिशत हैं। 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से 21 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में महिला मतदाताओं का अनुपात 47.6 प्रतिशत के राष्ट्रीय अनुपात से अधिक है। आठ राज्य/केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं, जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है।”

जिस अनुपात में महिला मतदाताओं का वोट प्रतिशत बढ़ रहा है उसे देखते हुए महिला अस्मिता के सवाल को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। ज़ाहिर है कि देश की कुल आधी आबादी के साथ कुल मतदाताओं का भी लगभग आधा हिस्सा होने के कारण महिलाओं के सवाल तमाम सामाजिक या सामुदायिक संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।

महिलाओं के कई छोटे-बड़े सवाल के सामने आने से उन पर हो रही बहस-विमर्श के लिहाज़ से साल 2017 काफी हद तक सफल माना जा सकता है क्योंकि महिला अस्मिता से जुड़े हुए कई सवाल हाशिए से उठकर चर्चा के केंद्र में अपनी जगह बनाने में सफल रहे। मसलन-

1. महिलाओं के पीरियड्स से जुड़े सवाल:

1.1- सबरीमाला मंदिर प्रकरण:

केरल का सबरीमाला मंदिर पिछले साल के अंत में बहस के केंद्र में आया। सबरीमाला मंदिर में किसी भी रजस्वला (पीरियड्स की उम्र वाली लड़कियों/महिलाओं) का प्रवेश वर्जित था। केरल के यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के विरुद्ध जनहित याचिका दायर की। क्या प्राकृतिक कारणों से महिलाओं को मंदिर में प्रवेश रोका जा सकता है? यह महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर भेदभाव माना जाए या नहीं, इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। यह मामला न्यायालय में लंबित है लेकिन इन बहसों ने महिलाओं नितांत निजी दायरे के सवालों को सार्वजनिक बहस का विषय ज़रूर बना दिया।

1.2- पीरियड्स के दौरान एक दिन की पेड लीव:

महिलाओं के पीरियड्स से जुड़े सवालों के साथ इस साल जुलाई में महिलाओं के पीरियड्स के दौरान एक दिन के सवेतन अवकाश (Paid Leave) भी बहस का विषय बना। इस बहस की शुरूआत इससे हुई कि पीरियड्स के समय महिलाओं को छुट्टी दी जानी चाहिए या नहीं? पीरियड्स के पहले दिन पेड लीव देने का चलन विश्व के कई देशों में पहले से है, भारत में यह कोशिश कोच्चि के एक मीडिया समूह “मातृभूमि” ने की जिसके बाद कई प्रतिक्रियाएं भी सामने आई।

इससे यह बात भी सामने आई कि तमाम किस्म के आरामदायक पैड्स के बावजूद पीरियड्स घरेलू और कामकाजी महिलाओं, दोनों के लिए ही एक तकलीफदेह स्थिति है। साथ ही साथ यह भी सामने आया कि भारत में अभी भी पीरियड्स के दौरान पैड्स इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम है। अधिकांश आधी आबादी मेंसट्रूअल हाईजीन के बारे में भी कोई जानकारी नहीं रखती है।

1.3- सेनेटरी नैपकिन पर GST:

पीरियड्स के तमाम बहसों के साथ सरकार द्वारा सेनेटरी नैपकिन पर 12% जीएसटी का लक्जरी टैक्स का मुद्दा न्यायालय के दरवाजे तक पहुंचा। न्यायालय की प्रमुख आपत्तियों में यह भी शामिल था कि जीएसटी जैसी अहम कमेटी में एक भी महिला सदस्य क्यों नहीं है? कई महिला संगठन सोशल मीडिया पर #Lahukalagaan नाम से एक कैंपेन में अपनी हिस्सेदारी से सैनटरी नैपकिन को टैक्स फ्री रखने का मुद्दा उठा रही हैं। इसके पहले #HAPPY TO BLEED जैसे कैंपेन ने, मेंसट्रूएशन के विषय में सामाजिक वर्जनाएं तोड़ने का प्रयास किया।

2. तीन तलाक

2.1- शायरा बानो केस:

तीन तलाक का मुद्दा इस साल राजनीतिक और सामाजिक हलकों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने वाला महिला मुद्दा रहा। उत्तराखंड की शायरा बानो ने पति द्वारा दहेज उत्पीड़न के बाद मायके भेजे जाने और तलाक दिए जाने के बाद अदालत का रूख किया। शायरा ने मुस्लिम समाज में व्याप्त बहुविवाह, तीन तलाक और निकाह-हलाला जैसी कुरीतियों को खत्म करने की अप्रील की। सुप्रीम कोर्ट ने अभी अपने फैसले को तीन तलाक तक ही सीमित रखा है और इसे गैर-कानूनी कहा है।

2.2- ट्रिपल तलक के खिलाफ बिल:

दिसंबर में यह मुद्दा फिर से सुर्खियों में है क्योंकि संसद में तीन तलाक की प्रथा को अपराध घोषित करने वाले बिल को पास कर दिया गया है। इस विधेयक के हिसाब से मौखिक, लिखित, ईमेल और एसएमएस सहित सभी तरीकों से दिये जाने वाले इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को अपराध माना गया है। इसके लिए तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

3. नाबालिक पत्नी से साथ यौन संबंध बलात्कार

सुप्रीम कोर्ट में इसी साल अक्टूबर महीने में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए, 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को बलात्कार घोषित किया। यदि पत्नी एक साल के भीतर शिकायत दर्ज करती है तो रेप का मामला दर्ज हो सकता है। जिन नाबालिगों के बाल विवाह हो चुके हैं और जो बाल विवाह के लिए तैयार की जा रही हैं उनके लिए अदालत का यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि वैवाहिक बलात्कार पर समाज और सरकार की चुप्पी आलोचना के घेरे में रही।

इनके अतिरिक्त मातृत्व लाभ संशोधन बिल, कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश का 12 से 26 हफ्ते किया जाना, हादिया का अपनी इच्छा से विवाह करने का मामला और कुछ राज्य सरकारों द्दारा अंधविश्वास पर रोक के लिए कानून जैसे महिलाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे इस वर्ष बहस के केंद्र में रहे।

साथ ही इस साल #मेरी रात मेरी सड़क, समाज में यौन शोषण के खतरनाक स्तर पर लोगों का ध्यान दिलाने के लिए #Meeto, अपने शरीर पर अपने हक और पहनावे को लेकर #mybodymychoice जैसे स्वत: स्फूर्त कैंपेन्स युवा लड़कियों ने शुरू किए जिन्हें महानगरों, शहरों और कस्बों में आम लोगों ने व्यापक समर्थन दिया।

कुल मिलाकर कहें तो 2017, महिलाओं के सवालों पर समाज की मानसिकता को जानने-समझने के साल के रूप में याद किया जा सकता है। युवा आधी आबादी के मन में अपने सवालों को लेकर बैचेनी और विस्फोट भी इस साल मुखरता से सामने आए जिसे काफी जनसमर्थन भी मिला। यह स्थिति महिलाओं के राजनीतक चेतना की मुखरता और पुरुष प्रधान सेटअप को चुनौति देने का प्रमाण है, जो आधी आबादी को आने वाले नये साल में उम्मीदों की एक नई किरन देती है।

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