कितना व्यवहारिक है देश में एकसाथ चुनाव होना?

Posted by Shahab Khan in Hindi, Politics, Society
December 2, 2017

भारत में काफी समय से चुनाव सुधार की बात की जा रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं ना कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। हर 5 साल में लोकसभा चुनाव, अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव, कभी लोकसभा उपचुनाव, कभी विधानसभा उपचुनाव, किसी राज्य में नगरीय निकायों के चुनाव। काफी समय से बहुत से राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की मांग है कि पूरे देश में सभी चुनाव लोकसभा/विधानसभा और अन्य चुनाव एकसाथ होने चाहिए।

एकसाथ चुनाव कराने के लिए जो तर्क है वो यह है कि इससे समय और पैसे की बचत होगी, बार-बार चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य रुक जाते हैं और जनता को असुविधा होती है। चुनाव के कारण राजनेता प्रचार में व्यस्त रहते हैं, इसलिए वो अपने क्षेत्र को समय नहीं दे पाते, क्षेत्र के विकास के लिए योजनाएं नहीं बना पाते आदि। हाल ही में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में देखा गया कि प्रधानमंत्री सहित अधिकतर केंद्रीय मंत्री कई दिन सब कुछ छोड़कर चुनाव प्रचार में व्यस्त रहे।

चुनाव आयोग और राष्ट्रपति ने भी पूरे देश में एकसाथ चुनाव करवाने की बात को सही माना है। नीति आयोग की सिफारिश के अनुसार 2024 में पूरे देश में चुनाव एकसाथ कराए जाने चाहिए। इस बारे में लोकसभा स्टैंडिंग समिति का सुझाव है कि एक बार में लोकसभा चुनाव के साथ देश के आधे राज्यों में चुनाव कराए जाएं और फिर उसके बाद बाकी के आधे राज्यों में चुनाव कराए जाएं।

तर्कों के आधार पर एकसाथ चुनाव कराना सही निर्णय लगता है, लेकिन इसमें बहुत सी समस्याएं भी हैं। भारत में वर्तमान में 29 राज्य और 7 केंद्रशासित प्रदेश हैं। 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से दिल्ली और पॉन्डिचेरी में चुनाव द्वारा सरकार का गठन होता है, बाकी 5 में केंद्र सरकार का शासन होता है। लोकसभा के साथ 29 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में एकसाथ चुनाव करवाने के लिए बहुत ज़्यादा अधिकारी/कर्मचारियों के साथ पुलिस की भी ज़रूरत होगी।

चुनाव में दूसरे विभाग के कर्मचारियों और सरकारी स्कूलों के टीचरों की ड्यूटी लगाई जाती है। एकसाथ चुनाव की दशा में कर्मचारियों/अधिकारियों की पर्याप्त उपलब्धता न होना समस्या बन सकती है। जब किसी राज्य में चुनाव होते हैं तो दूसरे राज्य से अधिकारी और रिज़र्व पुलिस फोर्स को ज़रूरत पड़ने पर बुला लिया जाता है, एकसाथ चुनाव होने की दशा पुलिस और सुरक्षा बालों की पर्याप्त उपलब्धता न होना भी एक बड़ी समस्या होगी।

पूरे देश में एकसाथ चुनाव करवाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों की सहमति बनानी होगी, ये भी थोड़ा मुश्किल काम है। वर्तमान में जिस तरह देश में राजनीतिक पार्टियों में आपसी खींचतान चलती रहती है, उसके अनुसार किसी बात पर आम सहमति बनाना ज़रा मुश्किल काम लगता है। एकसाथ चुनाव करवाने के लिए कुछ राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल बढ़ाना पड़ेगा और कुछ का कार्यकाल घटाना पड़ेगा इसमें सम्बंधित राज्य सरकार की सहमति या असहमति हो सकती है, ऐसे में ये भी एक परेशानी हो सकती है।

मान लीजिये किसी राज्य में किसी पार्टी की सरकार बहुत समय बाद बनी है और अभी सरकार बने सिर्फ एक या दो साल ही हुए हैं ऐसे में वहां की सरकार को विधानसभा भंग करने की लिए मनाना मुश्किल होगा। एक और उदाहरण से समझिये मान लीजिये किसी राज्य में सरकार का कार्यकाल 5 साल से अधिक बढ़ाया जाता है तो हो सकता है उस राज्य की विपक्षी पार्टी इसका विरोध करे ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टी को मनाना भी मुश्किल होगा।

अब मान लीजिये किसी राज्य में गठबंधन की सरकार बनती है और बीच में किसी कारण से गठबंधन टूट जाता है और सरकार अल्पमत की स्थिति में आ जाती है ऐसी स्थिति में या तो वहां फिर से चुनाव करवाने होंगे या फिर राष्ट्रपति शासन लगाना होगा। संविधान के अनुच्छेद 85 (ब) के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा भंग कर सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 174 (ब) के अनुसार राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार है।

अगर एकसाथ चुनाव में स्थानीय निकायों और पंचायतों को भी शामिल किया जाता है तो और भी कई समस्याएं आ सकती हैं। अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक स्थिति अलग-अलग होती हैं, मुद्दे भी अलग-अलग होते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों में छोटे-छोटे मुद्दे जैसे बिजली, पानी, सड़क, साफ-सफाई अादि होते हैं जबकि लोकसभा/विधानसभा चुनाव में बड़े और गंभीर मुद्दे होते है जैसे राष्ट्रीय नीति, विदेश नीति, आर्थिक नीति, रोज़गार, गरीबी, राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास इत्यादि।

स्थानीय निकाय चुनाव में आमतौर पर जनता की सोच लोकसभा/विधानसभा चुनाव के मुकाबले अलग होती है। जनता इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों के आधार पर अपना जनप्रतिनिधि चुनती है जबकि लोकसभा/विधानसभा  चुनाव में जनता राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर वोटिंग करती है। देश में अलग-अलग राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग हैं, ऐसे में अलग-अलग राज्यों में विभिन्न प्रकार की भौगोलिक परिस्थितियों जैसे बारिश, सर्दी, गर्मी, बाढ़, सूखा जैसी समस्याओं से निपटते हुए चुनाव करवाना भी एक बड़ी चुनौती है।

देश के कई राज्यों में नक्सलवाद भी एक बड़ी समस्या है, जब पूरे देश में चुनाव एकसाथ होंगे तो पुलिस और सुरक्षा बलों पर्याप्त उपलब्धता की कमी हो सकती है ऐसी स्थिति में नक्सल प्रभावित इलाक़ों में सुरक्षित तरीके से वोटिंग करवाना एक बड़ी चुनौती होगी। कई क्षेत्रों में चुनाव में हिंसा और बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं भी होती हैं। पुलिस और सुरक्षा बल की कमी के कारण ऐसी घटनाओं को रोकना भी बड़ी चुनौती होगी। चुनाव में सरकारी स्कूलों के टीचरों की भी ड्यूटी लगाईं जाती है, एकसाथ अधिक टीचरों को ड्यूटी पर लगाने से स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ेगा।

हाल ही में हर EVM में VVPT (Voter Verified Paper Audit Trail) लगाने के मुद्दे पर चुनाव आयोग का कहना था कि अभी आयोग के पास पर्याप्त बजट नहीं है इसलिए सभी EVM में VVPT लगाना संभव नहीं है। एकसाथ चुनाव के लिए सरकार को सरकार को चुनाव आयोग के बजट में भी इजाफा करना होगा।

एकसाथ चुनाव के लिए संविधान में संशोधन करना, राजनीतिक पार्टियों में सहमति बनाना, अलग-अलग राज्यों में सरकार का कार्यकाल घटाना/बढ़ाना, चुनाव आयोग को पर्याप्त बजट और स्टाफ, सुरक्षा बल उपलब्ध कराना, आम जनता की इस मुद्दे पर राय जानना आदि ये सब काफी लम्बी और उलझी हुई प्रक्रिया है। इन सबके अलावा एकसाथ चुनाव के लिए सबकी सहमति से एक निश्चित तारीख तय करना भी एक बड़ी चुनौती होगी।

देश में लम्बे समय से चुनाव सुधार की बात की जा रही है।  चुनाव सुधार में शामिल मुद्दों में राइट टू रिजेक्ट, राइट टू रिकॉल और लोकसभा विधानसभा चुनाव एकसाथ करवाने की बात अधिक होती है।

राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकॉल पर राजनीतिक पार्टियां तैयार नहीं हैं, एकसाथ चुनाव करवाने के मुद्दे पर ज़रूर कुछ पार्टियां सहमत हैं। 5 राज्यों में हुए विधासभा चुनाव के बाद EVM में छेड़खानी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया जा रहा है। एकसाथ चुनाव करवाना चुनाव सुधार की दिशा में एक बड़ा क़दम साबित हो सकता है, लेकिन अब ये देखना है कि ये कदम कितना व्यावहारिक साबित होगा।

 

 

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