एक्टिंग के नाम पर महिलाओं को केवल ऑब्जेक्ट का दर्जा देता है बॉलीवुड

Posted by Anoop Singh in Art, Hindi, Sexism And Patriarchy
December 4, 2017

महिलाओं के समान अधिकार के मुद्दे को लेकर सालों से बहस चलती आ रही है। जहां कई लोग इसे सही मानते हैं वहीं कुछ का नज़रिया यह भी है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। हालांकि बात जितनी कहने और सुनने में आसान लगती है, असल ज़िन्दगी में देखने पर वैसी है नहीं। समाज के किसी भी तबके में चाहे वो कोई भी हो ये भेदभाव देखने के लिए आपको अलग चश्मे की ज़रूरत नहीं है। देश की बाकी सभी इंडस्ट्रीज़ के मुकाबले बॉलीवुड को काफी चकाचौंध से भरपूर और हाई प्रोफाइल इंडस्ट्री माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि यहां के लोग ज़्यादा विचारशील और बुद्धिजीवी किस्म के हैं।

मीरा नायर द्वारा निर्देशित फिल्म सलाम बॉम्बे का एक दृश्य

अभिनय और गायन के क्षेत्र को छोड़ दें तो बॉलीवुड में महिलाओं के योगदान के नाम पर ऐसे चुनिन्दा नाम हैं जिन्हें आप चाहें तो उंगलियों पर गिन सकते हैं। बॉलीवुड में एक ख़ास मुकाम हासिल करने वाली महिलाओं में लगभग सभी नाम अभिनेत्रियों और गायिकाओं के ही हैं। ताज्जुब इस बात का है कि कुछ ही साल पहले अपने 100 साल पूरा करने वाले बॉलीवुड में महिलाएं सिर्फ इन दो ही क्षेत्रों में सिमट कर क्यों रह गयी? क्या सच में किसी महिला का बॉलीवुड में निर्देशक बनना या संगीतकार बनना आज भी एक चुनौती है। आइये एक नज़र डालते हैं कि बीसवीं सदी में किन महिलाओं ने निर्देशन और संगीत को अपना करियर चुना और एक अलग मुकाम हासिल किया।

निर्देशन की बात करें तो इसकी शुरुआत 1926 में ही हो गयी थी जब फातिमा बेगम ने ‘बुलबुल-ए-परिस्तान’ नामक फिल्म को निर्देशित किया। कई लोग तो उन्हें बॉलीवुड की पहली महिला निर्देशक का दर्ज़ा भी देते हैं। उनका सफ़र यहीं नहीं रुका बल्कि उन्होंने निर्देशन के साथ साथ राइटिंग और एक्टिंग में भी खुद को आजमाया। लेकिन उनके बाद फिर कई सालों तक ऐसी बॉलीवुड को कोई ऐसी महिला निर्देशक नहीं मिली जिसने प्रभावित किया हो।

इस कड़ी में फिर दूसरा नाम साई परांजपे का आता है जिन्होंने इतनी संजीदा फिल्में बनाई कि उन्हें आज भी लोग याद करते हैं। उनके निर्देशन में बनी ‘चश्मे बद्दूर’ और ‘कथा’ को आज भी पाथब्रेकिंग फिल्म का दर्ज़ा दिया जाता है। इसके बाद अपर्णा सेन, मीरा नायर, दीपा मेहता और कल्पना लाजमी जैसी निर्देशकों ने अपनी फिल्मों से जेंडर इनइक्वलिटी जैसे टर्म को तोड़कर रख दिया। साल 1988 में मीरा नायर के निर्देशन में बनी सलाम बॉम्बे को तो न सिर्फ देश में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति मिली।

बॉलीवुड में शुरुआत से ही संगीत को जितना महत्व दिया गया है उस हिसाब से यह खबर बहुत निराश करती है कि अभी तक ऐसी कम ही महिला संगीतकार हुई जिन्होंने संगीत के क्षेत्र में अलग पहचान बनायी हो।

बेशक जद्दन बाई (प्रसिद्द अदाकारा नर्गिस की मां) को बॉलीवुड की पहली महिला म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में जाना जाता है और इसके बाद सरस्वती देवी, इशरत सुल्ताना और उषा खन्ना ने इस फेहरिस्त को आगे बढ़ाया। लेकिन इनके बाद बॉलीवुड में संगीत के क्षेत्र में कोई और महिला अपना नाम स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाई।

ऐसे में यह सवाल उठाना लाजिमी है कि आज जब महिलाएं राजनीति से लेकर अंतरिक्ष तक पहुंच गई हैं तो आखिर किसी को इस बात की परवाह क्यों नही है कि महिलाएं एक्टिंग और सिंगिंग के अलावा बाकी क्षेत्रों को इग्नोर कर रही हैं या इन क्षेत्रों में उन्हें इग्नोर किया जा रहा है?

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