कुछ यूं बीता पटना के युवाओं के लिए साल 2017

साल 2016 का एक लंबा हिस्सा पटना से बाहर बीता और लखनऊ जैसे खूबसूरत शहर में रहना हुआ। फिर 2017 की पहली तिमाही में मुंबई बसेरा बना, लेकिन अपने शहर के मोहपाश से ज़्यादा दिन दूर नहीं रहा गया और मैं मार्च के अंत में वापस पटना आ गया। मेरा अपना शहर पटना। लखनऊ और मुंबई जैसे शहरों में समय बिताने के बाद इस साल पटना से कई सारी चीजें एक्सपेक्ट करने लगा। तब से ही शहर की बेहतरी के बारे में ज़्यादा सोचना शुरू हुआ।

आज यह साल अपने अंतिम पड़ाव पर है। पूर्णिया जैसे छोटे शहर के एक युवा की नज़र से देखें तो पटना में रहना बड़ी बात है। कई अच्छी चीज़ें इस साल देखने और अनुभव करने को मिली लेकिन फिर भी इस साल ने निराश ज़्यादा किया। गौर किया तो पाया कि युवाओं के विकास के लिए ज़रूरी दर्जनों चीज़ें आज भी निराशावादी दौर से ही गुज़र रही हैं।

पटना यूनिवर्सिटी का शताब्दी समारोह

इस शहर में युवा प्रतिभाओं को पनपने की आज़ादी और मौके दोनों ही सीमित रहे। अक्टूबर महीने में पटना यूनिवर्सिटी (पीयू) ने 100 साल पूरे किए और इस अवसर पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शिरकत की। पीयू को सेंट्रल यूनिवर्सिटी घोषित करने की मांग हुई, लेकिन आज भी पीयू अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष कर रहा है। इसके कॉलेजों की सीटें खाली जाने की नौबत आ गई जो अत्यंत दु:खद है।

शिक्षा का बड़ा बाज़ार होने के बावजूद भी पटना अच्छी शिक्षण व्यवस्था के लिए संघर्ष करता रह गया। मेधावी विद्यार्थियों का दिल्ली, कोटा जैसे शहरों की ओर पलायन बदस्तूर जारी रहा, लेकिन आईआईटी, एनआईटी तथा  निफ्ट के स्टूडेंट्स ने अच्छा प्रदर्शन कर एक सुखद आस ज़रूर जगाई है।

कुछ ऐसा ही हाल युवाओं के लिए रोज़गार का भी रहा। अच्छी नौकरी की तलाश में युवाओं ने बड़े शहरों की ओर ही रुख किया। जो रह गए वो प्रतिभाशाली होते हुए भी मामूली सैलरी पर काम करने को विवश हैं। सरकार ने कौशल विकास मिशन के तहत बड़ी संख्या में युवाओं को प्रशिक्षित करने की बात कही, मगर इसका फायदा असल ज़मीन पर युवाओं को मिलता हुआ कम ही दिखता है। राज्य में इंडस्ट्रीज़ होने का सपना इस साल भी सपना ही रह गया। खेल के क्षेत्र में भी युवा प्रतिभाओं पर अंदरूनी राजनीति भारी रही।

प्रकाश पर्व

2015 में जब नीतीश कुमार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे तो मेरे जैसे युवाओं में खुशी की लहर दौड़ गई थी, मगर 2017 में राज्य में हुई कुछ राजनीतिक घटनाओं ने बेहद निराश किया। निराश इसलिए नहीं कि सरकार बदली बल्कि इसलिए क्यूंकि युवाओं का भरोसा टूटा। एक सफल शासन का भरोसा। इन सबके बीच एक युवा नेता का राजनीतिक पटल पर मजबूती से उभर कर आना अच्छा संकेत दे गया। साल के अंतिम दिनों में साहित्य के क्षेत्र से भी एक अच्छी खबर आई, युवा आलोक रंजन को प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया गया।

इसी साल सरकार ने करोड़ों रूपये खर्च कर प्रकाशोत्सव भी मनाया। यह युवाओं के सांस्कृतिक विकास के लिए एक सुनहरा उत्सव था, जिसमें युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बिहार संग्रहालय का निर्माण भी युवाओं के लिए एक सौगात की तरह है। युवाओं को गौरवशाली इतिहास सहित अन्य चीज़ों से जोड़े रखने के लिए बिहार संग्रहालय अत्यंत महत्वपूर्ण है। मगर आज शहर का मुख्य सांस्कृतिक केंद्र कालिदास रंगालय सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। इस कारण रंगमंच और सिनेमा के क्षेत्र में करियर बनाने का ख्वाब देखने वाले एक बड़े युवा वर्ग ने इस साल दिल्ली तथा मुंबई जैसे शहरों का रुख किया। सरकार द्वारा इस ओर ध्यान देने का बस आश्वाशन भर दिया गया, मगर हुआ कुछ नहीं। इसी तरह पत्रकारिता में रूचि रखने वाले युवाओं ने भी उन्हीं बड़े शहरों की ओर जाना ही उचित समझा।

इस साल पटना में युवाओं द्वारा ‘रोटी बैंक मुहिम’ की शुरुआत की गई। सामाजिक सेवा के क्षेत्र में युवाओं का यह कदम अत्यंत सराहनीय है। इसके तहत संपन्न घरों से रोटी कलेक्ट कर ज़रूरतमंदों में बांटने के मुहिम की शुरुआत की गई।

बिहार म्यूज़ियम

इस साल पटना के युवाओं के लिए जो सबसे अच्छी बात रही वह थी उनकी सोच का विस्तार। युवा, बिहारियों के प्रति विभिन्न तरह के स्टीरियोटाइप को तोड़ने के लिए खुलकर आगे आए। साथ ही समाज की बनी-बनाई रुढ़िवादी धारणाओं को तोड़ने की उत्सुकता भी युवाओं में खूब दिखाई दी। शहर में भले ही प्यार करने वालों के लिए स्पेस की कमी बढ़ रही है, मगर युवाओं ने एक प्यारे वातावरण के निर्माण में अपनी भूमिका बखूबी अदा की। कुछ युवाओं ने मिडिया, पीआर, फोटोग्राफी स्टार्टअप्स और लघु उद्योगों को शुरू करने का भी जज़्बा दिखाया और  कुछ को उसमें सफलता भी मिली है। युवा अपने दम पर एक नया निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं, यह देखना अत्यंत सुखद रहा।

पटना के युवा, शहर के गंगा घाटों के बनारस जैसा होने का सपना लम्बे समय से देखते रहे हैं, इन घाटों का विकास युवाओं के सांस्कृतिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। मगर विकास तो छोड़िये शाम 8 बजे के बाद वहां युवाओं का प्रवेश तक वर्जित कर दिया गया है।

आप अगर युवा हैं और नाईट आउट के बारे में सोच रहे हैं तो प्रशासन के सवालों और सख्ती से परेशान होकर अपना विचार त्याग देंगे। यह युवाओं को आज़ादी का हनन नहीं तो और क्या है? कई दफा तो मैं रात में फोटोग्राफी करने निकला और मुझे बैरंग लौटना पड़ गया।

मेरी नज़र में साल 2017 पटना और बिहार के युवाओं को एक बेहतर माहौल देने में असफल ही रहा। युवाओं के विकास में सरकार की नाकामी साफ़ ज़ाहिर होती है और बहुत हद तक यहां के लोगों की सोच भी। आज भी लिट्टी-चोखा तथा गोलघर को ही बिहारी पहचान का तमगा हासिल है, लेकिन मुझे यकीन है कि युवाओं द्वारा इस सोच को बदलने की कोशिशें ज़रुर रंग लाएंगी।

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