Youth Ki Awaaz is undergoing scheduled maintenance. Some features may not work as desired.

अंतरराष्ट्रीय जगत भारत को जानने समझने के लिए राष्ट्रीय नेताओं के भाषणों का मोहताज़ नहीं

Posted by Himanshu Priyadarshi
January 12, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में प्रवासी संसद सम्मेलन  का उद्घाटन करते हुए प्रवासी भारतीयों को सम्बोधित किया और कांग्रेस  अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने बहरीन में प्रवासी भारतीयों के ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पीपल ऑफ इंडियन ऑरिजिन (जीओपीआईओ) के सम्मेलन में प्रवासी भारतीयों को सम्बोधित किया। विदित हो कि एक नेता ने अपने भाषण में देश प्रगतिवादी तस्वीर पेश की तो दूसरे ने स्याह काली। बाकी दोनों ने अपने अपने भाषणों में क्या-क्या उल्लेख किया वो सर्वविदित है इस पर चर्चा की आवश्यकता नहीं है बल्कि चर्चा का विषय ये है कि क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को विदेशी जमीन पर इस प्रकार सरकार की आलोचना करनी चाहिए थी जिसमें कि देश की भी आलोचना कर दी उन्होंने? इस प्रश्न का साधारण उत्तर है-नहीं।

 राहुल गांधी के इस कृत्य की देश-विदेश में चौतरफा आलोचना हुई और सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से तो लानतें भी भेजी गयीं उन्हें। क्या राहुल गांधी पहले नेता हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की तस्वीर को धूमिल किया अथवा चोट पहुंचाई? -नहीं। कई अवसरों पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पहले ही इस काम को अंजाम दे चुके हैं तब विपक्षी दलों ने उनकी इस काम के लिए खूब आलोचना की थी लेकिन क्या तब पार्टी नेताओं को उनके इस कदम की आलोचना करने को नहीं सूझा, अब यदि घर का कोई सदस्य कुछ गलत कदम उठाता है तो बाकी घरवाले उसे टोकते हैं कि नहीं?-टोकते हैं।
अब सवाल ये है कि देश के नेताओं द्वारा अंतरराष्ट्रीय पटल पर विपक्ष की आलोचना करते हुए अपने देश की नकारात्मक तस्वीर पेश करनी चाहिए या सकारात्मक तस्वीर? जबाब सभी जानते हैं लेकिन जो आरोप-प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है जो पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को जो कोसने में लग जाते हैं अथवा राष्ट्रीय राजनीति देश में ही सीमित नहीं रखना चाहिए? राष्ट्रीय नेताओं को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज को अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए छोड़ देना चाहिए जैसे कि सामरिक रिश्ते, व्यापारिक सम्बन्ध, अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध, तकनीकी आदान-प्रदान, आतंकवाद तथा पर्यावरणीय संकट जैसे मुद्दों तथा विषयों को तरज़ीह दी जानी चाहिए।
लेकिन अभी जो फोकट की आलोचना की जा रही है कि राहुल गांधी को विदेश में ऐसा भाषण नहीं देना चाहिए था या तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैसा भाषण नहीं देना चाहिए था या भविष्य में राष्ट्रीय नेताओं को ऐसा नहीं करना चाहिए अरे भई नेता लोग समझेंगे तब समझेंगे लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय जगत इन नेताओं के भाषणों के जरिये भारत को जानने समझने को मोहताज़ है?
अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र तथा मीडिया चैनल्स किसलिए हैं क्या उनकी नजर इस बात पर नहीं रहती कि दुनिया में कौन सा देश किस स्थिति से गुजर रहा है-अच्छी या बुरी? कौन सा देश गरीबी, भुखमरी, जातिवाद, अशिक्षा और बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से ग्रस्त है या कौन सा देश साम्प्रदायिकता का शिकार है या फिर किस देश में आतंकवाद का बोलबाला है या फिर पारिस्तिथिकी तंत्र बिगाड़ने में कौनसा देश और कितना-कितना प्रतिशत भागीदार है या फिर दुनिया का उभरता हुआ सितारा कौन सा देश है?……इत्यादि सबकुछ नजर में है।
हमारे नेता अंतरराष्ट्रीय पटल पर सरकार या विपक्ष की आलोचना करते वक़्त कमियों अथवा अच्छाइयों को उजागर करें या न करें लेकिन दुनिया की नजर हर छोटी से छोटी बात पर है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.