अनजान शहर, अकेली लड़की और एक मसीहा

Posted by PREETY MAHAWAR
January 26, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

“अकेली लड़कियां खुली तिजोरी की तरह होती है, ऐसा सोचने वाले वाहेगुरु के गुनेहगार होते हैं, मैं इंसान हूँ इसलिए इंसानियत दिखाई, कोई बड़ा काम नहीं कर रहा, परेशानी में पड़े हर शख्स की मदद करना हम सब का धर्म हैं| कोई हिन्दू नहीं कोई सिक्ख नहीं कोई मुस्लिम नहीं और न ही कुछ और, सब इंसान हैं, और इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, आप बहादुर बच्चे हो, वाहेगुरु के बच्चे हो, आपको कभी कुछ नहीं होगा|” यह कहना था मेरी ज़िन्दगी में आये एक मसीहा का, जिन्होंने मुझे बाइज्ज़त अपने ऑफिस पहुचाया साथ ही मुझे इंसानियत और अपने वाहेगुरु के और करीब कर दिया|

यह बात सन 2015 की है जब मैं लुधियाना के दैनिक भास्कर अख़बार में एक स्टाफ रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थी| लुधियाना को मेनचेस्टर ऑफ़ इंडिया कहा जाता है तो आप अनुमान लगा ही सकते है की यह शहर देश के बाकी छोटे शहरों की तुलना में कितना बड़ा और भव्य होगा| उन दिनों मैं लुधियाना के सभी गलियारों से पूरी तरह से परिचित नहीं हुई थी| तब मेरे पास कोई वाहन भी नहीं था और मुझे इतने बड़े शहर में हर रोज़ दिन भर कभी ऑटों से तो ज़्यादातर पैदल ही सारे इवेंट्स, स्पॉट्स, इंटरव्यूज सब कुछ कवर करने होते थे|

सब कुछ दूर-दूर होने की वजह से, स्टोरीज कवर करते-करते अक्सर हर रोज़ मेरे पैरों में बड़े-बड़े छाले हो जाया करते थे| और कभी-कभी तो इतना चलना पड़ता था की पैरों से खून ही निकल जाता था| पहले-पहल ऑफिस में सबको मेरे छाले देख कर काफी अजीब लगता था पर धीरे-धीरे सबने आत्मसाध कर लिया की ये मैडम जब तक पैदल चल कर रिपोर्टिंग करेंगी तब तक इनके पैरों का यही हाल रहेगा| मैं हर रोज़ नियम से अपने पर्स में 100 रूपये के छुट्टे नोट और ज़रूरी बैंक कार्ड्स लेकर ही ऑफिस आती थी| मेरे पीजी से ऑफिस का सफ़र ऑटों से सिर्फ दस मिनट में दस रूपये में पूरा हो जाता था|

पर एक दिन ऐसा आया जिस दिन सुबह मैं अपना वॉलेट लेना ही भूल गई, जिसमे मेरे सारे पैसे और ज़रूरी कार्ड्स होते थे| बस अपना बड़ा हैण्ड बैग लिया जिसमे गिनती के सिर्फ 30 रूपये थे और ऑफिस के लिए निकल पड़ी| ऑफिस पहुँचते ही पैसे देने के लिए मैंने जब हैण्ड बैग में अपना हाथ डाला तो वॉलेट की जगह मुझे सिर्फ दस के तीन नोट मिले, मुझे लगा वॉलेट बैग की किसी दूसरी चेन में रखा हुआ है| और एक दस का नोट ऑटो वाले को दे दिया| और मोर्निंग मीटिंग अटेंड करके शहर से दूर जड़खड़ स्टेडियम में चल रहा एक बड़ा स्पोर्ट्स इवेंट कवर करने के लिए ऑटो में सवार हो गई| यहाँ बताना काबिलेगौर है की मेरे ऑफिस से जो एमबीडी मॉल के साथ था, वहां से स्टेडियम तक के शेयरिंग ऑटो के सफ़र में तकरीबन पौना घंटा तो लगता ही है|

इवेंट कवर करने जाने से ऑफिस आने तक का यह सफ़र एक अविस्मरनीय याद बन कर मेरे ज़हन में आज भी एकदम ताज़ा बना रहेगा, मुझे इसका बिलकुल इल्म नहीं था| स्टेडियम पहुचने के क्रम में मुझे बीच में लुधियाना बस स्टैंड उतर कर दूसरा ऑटो करना था| मैंने पहले वाले ऑटो से बिना किसी सोच के वह दूसरा दस का नोट भी दे दिया| बड़े ही आत्मविश्वास से अपनी मंजिल पर पहुचने के लिए तैयार थी मैं| मैंने जैसे ही दुसरे ऑटो वाले को स्टेडियम जाने को कहा, उन्होंने कहा शेयरिंग वाले ऑटो अभी वहां नहीं जा रहे, आपको स्पेशल ऑटो करना पड़ेगा| मैंने सोचा इतने वीरान से गाँव में मैं अकेली नहीं जाउंगी, मैं शेयरिंग में ही जाउंगी चाहे ज्यादा पैसे देने पड़े| मुझे लगा इतनी भीड़ है तो अपने कुछ पैसे बहार निकल कर रख लेती हूँ हाथों में और बैग को बंद कर के अपने पास दुसरे हाथ में पकड़ लेती हूँ| पर जैसे ही मैंने अपना वॉलेट निकलना चाहा, मैंने देखा की मेरे पास सिवाए दस रूपये के कुछ भी नही और न ही कोई डेबिट कार्ड|

मेरा मन उदास हो गया| एक तरफ अकेले होने का डर रह-रह कर मन में बढ़ रहा था तो दूसरी तरफ अपने काम के प्रति मेरी कमिटमेंट न पूरी होने का अफ़सोस| इस तरह दस मिनट बीत गया| मेरे मन में ईश्वर का सिमरन और ज्यादा तेज़ हो गया| मैंने ईश्वर से मन ही मन मुझे इस परेशानी से बहार निकलने की कामना की| मैंने इतना बोला ही की सामने एक ऑटो वाले अंकल ने मुझे कहा बेटा आप अच्छे घर से लगते हो, फिर यहाँ अकेले क्यों खड़े हो ? मैंने डरते-डरते उन्हें जवाब दिया की नहीं ऐसा कुछ भी नही| फिर मैंने उन ऑटो वाले अंकल को आलमगीर-आलमगीर पुकारते हुए देखा और काफी सवारियां आलमगीर गुरद्वारे जाने के लिए उसमे सवार होने लगीं| तभी अंकल जी ने मुझसे कहा बेटा जी आप मुझे बताओ मैं आपको वहां छोड़ दूंगा| मैंने बड़े आदर के साथ उन्हें बोला अंकल जी मेरे पास पैसे नही है, सिर्फ दस का एक नोट ही बचा है, उन्होंने बोला आप काफी इमानदार बच्चे लगते हो, कोई बात नहीं मैं आपको वहां छोड़ दूंगा, मेरा भरोसा करो और पुरे विश्वास के साथ बिना डरे अपने काम पर चलो|

एक अकेली लड़की होने की वजह से मुझे डर तो काफी लग रहा था लेकिन अपने काम के लिए मेरी जिम्मेवारी और अंकल जी की कही हुई वो बातें सुन कर मुझे मन के किसी कोने में ऐसा लगा जैसे अंकल जी झूठ नही बोल रहे और मुझे इनके साथ चले जाना चाहिए| मैं ईश्वर का सिमरन करते हुए ऑटो में बैठी, तब ऑटो में काफी भीढ़ थी| एक स्वाभिमानी इन्सान होने के नाते मैंने अंकल जी से कहा आप मुझे अपना बैंक अकाउंट नंबर दे दीजिये मैं आपके पैसे उसमे ट्रान्सफर कर दूंगी| और आपका एहसान ज़िन्दगी भर मेरे सर-मत्थे रहेगा| अभी आधा ही रास्ता पूरा हुआ था की उन्होंने बोला बेटे कोई बात नहीं, आप भी मेरे बच्चे जैसे ही हो, आप समझो की मैं अपनी बेटी को ही अपने स्कूल छोड़ने जा रहा हूँ| उनकी ये बातें मेरे मन में उनके लिए और भी सम्मान बढ़ा रही थी पर अकेली लड़की होने का डर भी मुझे बार-बार झकझोर रहा था|

आलमगीर गुरूद्वारे पहुच कर सभी सवारियां उतर गई सिवाए मेरे| मैंने गुरूद्वारे के सामने जैसे ही मत्था टेका तभी अंकल जी ने कहा बेटे आप मेरा मोबाइल नंबर ले लो, अगर वापिस आना हो तो मुझे बुला लेना मैं आ जाऊंगा| मुझे यकीन नही हुआ की इतने बड़े शहर में एक के बाद एक ऐसा चमत्कार कैसे हो रहा है| मेरी आँखों में आंसू थे और मैंने उनसे कहा नहीं अंकल अब मैं दोपहर में यहाँ की रिपोर्टर्स स्पेशल कैब से वापिस ऑफिस चली जाउंगी| आप मुझे अपना अकाउंट नंबर दे दीजिये| उन्होंने यह सुनते ही बोला, बच्चे अकाउंट नंबर नहीं मेरा फ़ोन नंबर लिखो और जब इवेंट कवर कर लो तो मुझे फ़ोन कर देना और यहाँ से अकेले कहीं मत जाना, मैं आपके एक फ़ोन करने पर अपने-आप आ जाऊंगा| और वो यहीं तक नही रुके, उन्होंने मुझसे पूछा खाना लेकर आई होना, वरना मेरा टिफ़िन ले लो, इसमें दो पराठे हैं, भूख लगे तो खा लेना| मुझे समझ नहीं आ रहा था की यह कोई चालाकी है या कोई चमत्कार| मैंने बड़े ही नम्रता से उन्हें कहा थैंक यू अंकल जी लेकिन मेरे पास टिफ़िन है मैं अब रात को ही खाना खाऊँगी, क्योंकि काम बहुत है और टाइम बिलकुल नहीं| उन्होंने कहा मेरा नंबर लिख लो| और मैंने उनका नंबर अपने मोबाइल में टाइप कर छोड़ दिया और सेव करना भूल गई और उन्हें अपना नंबर बता दिया| उन्होंने मेरा नंबर मेरे नाम से अपने मोबाइल में फीड कर लिया| जल्दी-जल्दी में मैं उनसे उनका नाम तक नही पूछ सकी और उन्हें हाथ जोड़ कर जैसे ही स्टेडियम जाने लगी, उन्होंने अपने दोनों हाथों को मेरे शीश पर रखा और कहा “आप वाहेगुरु के बच्चे हो, मेरा खूब सारा आशीर्वाद आपको”|

यह कह कर वो वहां से चले गए, और मैं ईश्वर का सिमरन करते हुए अपने काम में मशगूल हो गई| पूरा इवेंट कवर करने के कुछ मिनट बाद मैं भूल ही गई की मुझे वापिस रिपोर्टर्स की स्पेशल कैब में जाना है जो ओर्गनाइजर्स द्वारा प्रदत्त सेवा थी| जिसे आने में काफी वक्त था और मुझे पांच बजे की ऑफिस की इवनिंग मीटिंग के पहले-पहले वहां पहुचना था|

मैंने सोचा मुझे अब बाहर कहीं न कही कोई ऑटो मिल ही जाएगी. और मैं इसी सोच में स्टेडियम के बहार काफी आगे तक चलती गई और अपने फ़ोन पर किसी से एक और खबर डिस्कस करते-करते इतने आगे आ गई की मेरे दोनों पैरों से खून ही खून बह रहा था| मुझसे चला भी नही जा रहा था और जब मुझे अपनी सुध आई तो मुझे एहसास हुआ की इस घने जंगल से दिखने वाले गाँव में आस-पास दूर-दूर तक कोई पक्की सड़क तक नही है| और डर के मारे मैं इश्वर का सिमरन करती हुई जैसे-तैसे मेन रोड पर पहुँच ही गई| वहां भी दूर-दूर तक सिवाए बड़े-बड़े ट्रक्स के अलावा कोई दूसरा साधन दिख ही नही रहा था|

पूरी तरह से सुनसान वो सड़कें, शाम के चार बज चुके थे, तभी मेरे दिल में अपने पेरेंट्स और अपने भाइयों का ख्याल आया और मेरे आंसू तो अब रुकने का नाम ही नही ले रहे थे यह सोच कर की अगर वो यहाँ होते तो मुझे कभी ऐसे पैदल अकेले धूल-मिट्टी में चलने नही देते| उन्हें कितना बुरा लगेगा मेरी यह हालत के बारे में सोच कर| मैंने अपने ज़ख़्मी पैरों से कुछ दूरी तय की और देखा की दूर से एक ऑटो आ रहा है| तभी उन अंकल जी का ख्याल मुझे आया और अपने-आप उनकी कॉल मुझे आई, उन्होंने कहा बेटा जी मैं ऑटो वाला अंकल बोल रहा हूँ, आपका काम हो गया, मैं बीच में ही हूँ बस पहुच रहा हूँ आप स्टेडियम के बहार रहो|

ख़ुशी के मारे रोते-रोते मेरे मुह से सिर्फ एक ही शब्द निकला ‘हांजी’ और मैंने वहां रुक कर ऊपर आसमान में अपने प्यारे वाहेगुरु को तलाशना शुरू किया और कहा मैं सच में अपने वाहेगुरु की लाडली बच्ची हूँ, जो हर पल मुझे सुरक्षित रखता है, हमेशा मेरा ध्यान रखता है, मुझ पर हमेशा अपना आशीर्वाद बनाये रखता है| और वो ऑटो वाले अंकल जी एकदम से मेरे सामने अपना ऑटो ले आये| उन्होंने बोला आपने मुझे बताया क्यों नहीं की आप यहाँ हो, मैंने बोला था न बहार मत आना, अब देखा आपने यह इलाका कितना सुनसान है| उन्हें जैसे ही यह एहसास हुआ की मेरे पैरों से खून निकल रहा है और रो-रो कर मेरी आँखे लाल हो चुकी हैं उन्होंने भरी आँखों से मुझे कहा मेरे बच्चे जल्दी से ऑटो में आराम से बैठ जाओ मैं आपको हॉस्पिटल ले चलता हूँ, मैंने उनसे कहा अंकल जी अब आप आ गए होना, आपके वाहेगुरु के बच्चे को कुछ नही होगा|

मैंने इतना कहा ही, की हम दोनों ही रो पड़े| उन्होंने मुझे फिर आशीष दिया और पूरी इमानदारी से मुझे ऑफिस तक छोड़ा| ऑटो से उतरते ही मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ कर उनसे कहा मैं अभी ऑफिस से किसी से मांग कर आपके पैसे ला कर देती हूँ, आपने जो मेरे लिए किया वो कोई भी किसी के लिए नहीं करता आज की दुनिया में| और मैं ऐसे किसी की मेहनत के पैसों को अपने पास नहीं रख सकती और अब आप मना नहीं करेंगे| वरना मुझे पाप लगेगा| इतना सुनते ही उन्होंने मुझे कहा आप आज से वाहेगुरु के ही नहीं मेरे भी बच्चे हो, और पैसे की बात अब कभी मत करना, वाहेगुरु ने चाहा तो हम फिर मिलेंगे, मेरा नंबर तो है ही आपके पास| मैंने उनके पैर छुकर उनका आशीर्वाद लिया और उनसे कहा वाहेगुरु ने चाहा तो हम फिर ज़रूर-ज़रूर मिलेंगे|

वो दिन था और आज का दिन हम फिर कभी नही मिले| उनका नंबर सेव न करने की गलती मुझे अब भी कहीं खलती है| मुझे नहीं पता की वे साक्षात वाहेगुरु थे या सच में कोई इंसान, लेकिन ऑफिस पहुँचने के दौरान जो बातें उन्होंने मुझसे सांझा की, उससे मुझे इंसानियत के और उस परम पिता के और अधिक करीब कर दिया| यहाँ यह बात समझनी ज़रूरी है की अगर महत्ता देनी ही है तो इंसानियत को देनी चाहिए न की धर्म या किसी ज़ात को| इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नही होता| जब हमारे अन्दर इंसानियत का जज्बा होगा तब ही दुनिया में अपराध खत्म होगा और कोई भी लड़की बिना किसी डर के कहीं भी आ-जा सकेगी| मेरा सलाम आज हर उस शख्स को जो खुद को किसी धर्म के नही बल्कि अपने आपको एक इंसान मानते हुए अपना सर्वस्व इंसानियत को समर्पित कर देते हैं|

 

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