असम की नागरिकता सूची से निकाले गए लोगों को कौन अपनाएगा?

Posted by Jitendra Kumar in Hindi, Human Rights, Youth Ki Awaaz news
January 30, 2018

असम में सिलचर के काशीपुर में रहने वाले 40 वर्षीय हनीफ खान पेशे से ड्राईवर थे। जनवरी 2018 के दूसरे ही दिन उनकी लाश उनके घर के पास एक पेड़ से लटकती हुई मिली। हनीफ की पत्नी कहती हैं कि हनीफ को डर था कि अगर उनका नाम नागरिकता सूची में नहीं होगा तो उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जायेगा। 31 दिसम्बर की आधी रात को जारी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC)  के पहले ड्राफ्ट में हनीफ का नाम नहीं था। और ऐसा कहा जा रहा है कि इस सदमे ने हनीफ को आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर किया।

यह समस्या सिर्फ हनीफ की नहीं थी बल्कि नागरिकता का प्रश्न लाखों लोगों के सामने खड़ा होने वाला है। असम में कुल 33 ज़िले हैं जिनमें से 9 ज़िले जो बांग्लादेश की सीमा से मिले हैं, अवैध प्रवासियों से सर्वाधिक प्रभावित बताये जाते हैं। असम संमिलिता संघ नाम के संगठन ने 2012 में एक जनहित याचिका डाली थी जिसमें 1 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1971 के बीच असम में आये विदेशी घुसपैठियों की जांच की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में NRC को अपडेट करने को कहा था।

असम में सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसका वादा किया था। इस तरह इसकी पहली लिस्ट 31 दिसम्बर की रात जारी की गई जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम शामिल हैं जबकि कुल 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की तरफ से जारी बयान में कहा गया है की 2018 में ही NRC को पूरा कर लिया जायेगा।

एक अनुमान के मुताबिक अंतिम सूची जारी होने के बाद ऐसे लोगों की संख्या कई लाख हो सकती है जो अपनी नागरिकता साबित करने में असमर्थ रहेंगे। ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि इन लोगों का क्या होगा जो अंततः राज्य विहीन होने की स्थिति में होंगे? क्या बांग्लादेश इनके पुनर्वास की ज़िम्मेदारी लेगा? भारत और बांग्लादेश के बीच इतिहास में आज तक कोई ऐसा समझौता नहीं हुआ है। न्यायालय द्वारा वापसी प्रक्रिया को स्पष्ट किये जाने के सवाल पर सरकार ने सीधे शब्दों में कह दिया की उन लोगों की वापसी संभव होगी जिन्हें बांग्लादेश सरकार अपना नागरिक स्वीकार करेगी।

हाल के वर्षों में घटनाओं पर यदि गौर करें तो एक बार भी ऐसा अवसर नहीं आया है जब दोनों देशों के नेताओं के बीच इस मुद्दे पर किसी तरह की बातचीत हुई हो चाहे प्रधानमंत्री मोदी का बांग्लादेश दौरा हो या शेख हसीना का भारत आगमन। भारत और बांग्लादेश के बीच आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी मानव तस्करी आदि मुद्दों पर बातचीत होती रहती है लेकिन अवैध प्रवासियों की समस्या पर कभी बात नहीं हुई। विश्व के कई देशों ने आपस में अवैध प्रवासियों की अदला बदली के लिए समझौते कर रखे हैं। कई देश अवैध प्रवासियों के प्रवासन हेतू उनके देशों को धन भी देते हैं।

अब जबकि मोदी सरकार की नीति “पड़ोसी प्रथम” उनकी विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा है ऐसे में भारत बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते खराब करना नहीं चाहेगा। वहीं दूसरी ओर चीन अपनी आक्रामक नीति के तहत भारत के पड़ोसी देशों में अपना निवेश बढ़ा रहा है और उन्हें तमाम तरह की सुविधाएं दे रहा रहा है। चटगाँव प्रोजेक्ट इसका एक उदाहरण है। इस परिस्थिति में अवैध प्रवासियों की वापसी आसान नहीं होगी। ये समस्या मोदी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती तो साबित ही होगी साथ ही अधिकतर निरपराध लोगों के सामने आस्तित्व का संकट भी खड़ा कर सकती है।

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