आजकल अधिकांश मीडिया तमाशा दिखा रही है, तमाशबीन बन हम सब देख रहें है-रोहित भदौरिया

Posted by bhadauriyarohitah
January 8, 2018

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प्रिंस गड्ढ़े में गिरा था, याद करो, जरा दिमाक पर ज़ोर डाल ही लो, वो तो हमारें जवानों की बहादुरी से गड्ढ़े के बाहर निकल आया था लेकिन 21वी सदी की अधिकांश मीडिया आज भी उसी गड्ढ़ों में टीआरपी के चक्कर में औंधें मुँह पड़ी हुई है. जैसी ही सोचती है कि अब बहुत हो गया अब इसके बाहर समाज के जीवन की तलाश करनी है, उसकें असल मुद्दों को उठाना है. किसानों, महिलाओं, बेरोजगारों, कामगारों इत्यादि की समस्याओं को उठाना है, उनकें बारें में अखबार में लिखना है, उनको टीवी पर प्राइम टाइम में दिखाना है, तभी कोई न कोई चुनाव आ जाता है. अगर देश में कोई चुनाव नहीं होता है तो बाहर के देशों में चल ही रहा होता है वहाँ के चुनाव कवर होनें लगतें है. वैसें एक बार मान भी लिया अगर कोई चुनाव न भी तो सास-बहूँ, बॉलीवुड ड्रामा, दीपिका, विरुष्का, भंसाली इत्यादि के बड़ी ख़बर वाली ख़बर असल मुद्दों को उठानें का समय ही नहीं देती.

अब देखों भाई, असल मुद्दें क्या है वो चिंदी चोर एक बार वोट देनें जानें वाली, कभी-कभी तो छुट्टी मार जानें वाली जनता थोड़ी ही न तय कर सकती और न ही उसकों तय करनें का अधिकार कम तन्खवाह पर प्राइवेट नौकरी करनें वालें पत्रकारों को भी नहीं होता, थोड़ी मोटी पगार पानें वालें एडिटर को भी नहीं होता, हाँ उसको भी नहीं होता. ख़बर बड़ी है या छोटी है वो तय इससें होता है कि प्रेस मालिक की कितनी कमाई है इसमें या फ़िर तय होती है राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों में?

वैसें मीडिया घरानों में एडिटर क्यूँ होता है ये भी समझ लो उसका काम होता है चुटपुंजिया ख़बरों को आप लोगों तक पहुँचाना, बड़ी ख़बर का सौदा पहलें ही तय हो चुका होता है, क्या गलत कह रहा हूँ, अरे आपकें दिमाक में यह सवाल पैदा होनें के लिए फेक न्यूज़ भी आप तक पहुंचाई जाती है, क्या नहीं पहुंची? वैसें छंटनी करनें का काम एक बार कर लीजियें तो यह कहानी भी समझ आ ही जाएगी.

वैसें हमारें देश के सत्ता पक्ष के नेताओं यहाँ तक कि विपक्ष के नेताओं के पास जुगाड़ मशीनरी इतनी तगड़ी है, पैसें जुटानें के पेड़ इतनें बड़ें-बड़ें है कि जरा सी देर में दुनियाँ हिला दें. कौन मीडिया वाला उसकें जुगाड़ में नहीं फिट बैठा, उसकें दरबार में नहीं आया उसका तो समझों काण्ड पक्का है, आख़िर बड़ें धंधें वालों का एनपीए खाली-पीली थोड़ी ही माफ़ हो जाता है. ये जुगाड़ हम सब समझतें तो है बस समझतें रहतें ही है, उखाड़ कुछ नहीं पातें.

वैसें भी जब सुबह टीवी का रिमोट लेकर चाय की चुस्की ले रहें होतें है हम तब उधर वालीं उनकी कॉल पर पहलें से सब निर्णय हो चुका ही होता है, हम दिन भर रिमोट पकड़कर झुनझुना हिलातें रहतें है, उनमे मगन रहतें है जो हमारी ख़बरें है ही नहीं, अब देखों किम जोंग उन बम फोड़ेगा तो फोड़ने दो न, या ट्रम्प और पहलें फोड़ेगा तो फोड़ने दो न, हम क्यूँ अपना दिमाक को दीमक लगवाएं. वैसें जब बम फूटेगा तो फूटेगा ही अपनी जिंदगी वैसें ही सरकार नें नरक बनाई हुई है उसकों दिखाओं न शायद दबाओं में आकर हमारें लिए वालें बिल पर बहस कर लें.

वैसें हमारें लिए उनकें दिलों में कोई स्पेस है ही नहीं, कितना ही तुम बोल लो ये वाला ठीक है ये वाला ख़राब है, ये वाला फलाना है, ये वाला धिमका है, जो सच लिखता-पढ़ता बोलता है उसमें तो मजा नहीं आता क्यूंकि आजकल मजा सबसें बड़ी चीज़ है आदत ही डलवा दी गई है, वैसें लेतें रहों मजा ही और कुछ मिलने वाला भी नहीं है, बिकी हुई ख़बरों से मजा ही मिल सकता है जो नहीं बिकती उस पर केस हो ही जाता है. ये जो है ऐसा ये डर नहीं हैं इसें हमारी-तुम्हारी भाषा में फटना कहतें है, ये क्या बोला भाई मैनें, वैसें भी बोलनें की आज़ादी है थोड़ी सी तभी बोला वरना क्या मजाल चुप बैठें ही है, सब तमाशा चल रहा है, हम सब देख रहें है, जो बोल रहा है वो मेरी नज़र में देशभक्त है किसी का भक्त नहीं वरना अलग-अलग तरह के वादियों का जमाना है ही. सच्चीं बोलूं तमाशा गज़ब है ये सब फ़िर भी, हँस लो तुम भी क्यूंकि और कर ही क्या सकतें.

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