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उनकी आशाएं हैं! आपको समझना है! उन्हें पूरा भी करना है!

Posted by PREETY MAHAWAR
January 25, 2018

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हम सब अपने जीवन में किसी न किसी से कभी न कभी कोई आशा तो हमेशा ही रखते हैं. कभी हमारी आशाएं बड़ी होती हैं, कभी बहुत छोटी सी. कभी उस आशा को पूरा करना हमारा जूनून बन जाता है तो कभी हम अपनी आशा के पीछे बेबस और लाचार से हो जाते हैं. परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों लेकिन दिल फिर भी यही कहता है की हमारी वह आशा पूरी ज़रूर होगी. कई बार हमारा दिमाग हमें उस आशा के पीछे न भागने के कई संकेत भी देता है लेकिन जब आपकी आशा सच्ची हो, आपका विश्वास सच्चा और अटल हो तो दुनिया की कोई शक्ति हमारी उस आशा को पूरी होने से नहीं रोक सकती.

हमारी दृढ़ता, हमारा कभी न डिगने वाला निश्चय और विश्वास ही है जो हमारी मासूम आशाओं को मजबूती देता है, उनमें सुनहरे पंख लगाता है. उसे पूरा करने की चाह, उस खूबसूरत सपने के साकार होने की ललक हम सब में कहीं न कहीं होती है. किसी को साइंटिस्ट बनाने की आशा है तो किसी को वकील, किसी को आईआईटी में दाखिला चाहिए तो किसी को ऑक्सफ़ोर्ड में, किसी को दुनिया का सबसे दौलतमंद इंसान बनना है तो किसी को सबसे खूबसूरत, किसी को ढेर सारे दोस्त बनाने हैं तो किसी को स्टेट टॉपर होना है, किसी को अपने माँ-पा का नाम रोशन करने की आशा है तो किसी को एक अच्छा और सभ्य समाज बनाने की.

ऐसे ही एक प्यारी सी आशा मेरी भी है किसी को मामूली पत्थर से हीरा बनाने की. इंसानियत यही कहती है की चाहे कोई आपको कितना भी ज़लील करे, कितना भी आपकी प्रीत को आपकी अच्छी बातों को अनदेखा या अनसुना करे, कितना भी आपको आसुओं के समंदर में ढकेले, हमें हमेशा अपने नेकी के पथ पर लगातार चलते हुए लोगों में प्यार बढ़ाना चाहिए. हमारी यही आशाएं है, जो हमें लगातार प्रोत्साहित करती है की हम वह करें जिससे किसी का भला हो. नेकी करें, और ज़रूर करें. क्योंकि आज दुनिया में प्यार, सद्भाव, मदद, देख-भाल, अपनापन, प्रीत, स्नेह, जैसे शब्दों का कोई मोल ही नहीं रहा. यह शब्द इंसानी ज़मात से कहीं ग़ुम से होते जा रहे हैं.

जो इंसानियत की राह पर चलते है, जिन्हें अपनी आशाओं को पूरा करने की सबल अभिलाषा होती है, उन्हें अक्सर लोग यही कहते हैं की ऐसा न करो, ऐसा करने से तुम खुद ही अपना नुक्सान कर रहे हो. देखा जाये तो कुछ हद्द तक उनकी यह बातें सही भी होती हैं, क्योंकि वे हमें अपना समझते हैं और हमें किसी भी तरह के दुःख से दूर रखने की भावना से ऐसा कथन करते हैं. पर क्या हमें वाकई ऐसा करने से रुक जाना चाहिए ? हमें अपनी आशाओं को पूरा करने से पीछे हट जाना चाहिए? क्या यह सोच लेना चाहिए की जो कीमती आंसू आपने किसी को सुधारने के लिए बहाए, अपना बेशकीमती वक्त जो आपने किसी को सुधारने में लगा दिया, वो पूजा, वो अरदास, वो सजदा, वो अता, सब कुछ जो आपने किसी को जानवर से इंसान बनाने के लिए की, सब ज़ाया हैं ?

“वो सुधर जायेंगे, तुम अपना काम करो, उनके लिए उनके वालिदान हैं, उनके भाई-बहन है, उनका मुकम्मल परिवार है, जब उन्हें कोई परेशानी नहीं तो फिर तुम्हे किस बात की फ़िक्र है, तुम अपनी ज़िन्दगी बनाओ” क्या यह बातें सुन कर हमें पीछे हट जाना चाहिए और अपनी इंसानियत को भूल कर अपनी आशाओं का गला घोट देना चाहिए ? क्या यह समझ लेना चाहिए की कोई दूसरा नहीं बल्कि खून के रिश्ते ही उन्हें सुधार सकते हैं, यह मान कर इंसानियत भुला देनी चाहिए ? क्या सिर्फ सेल्फ-रेस्पेक्ट का झंडा बुलंद रख कर, उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए ? दुनिया क्या कहेगी, दुनिया वाले क्या सोचते है, क्या चुगलियाँ करते हैं, इन फालतू की बातों की वजह से हमें अपनी इंसानियत भूल जानी चाहिये ? क्या दुनिया वालो के खाने पर हम पलते हैं ? या दुनिया वालों के कर्ज़दार है ? क्या जिन दुनियावालों के बारे में सोच कर हम अपने रिश्ते ख़राब करते हैं, जिसे दुनियादारी का नाम देकर हम अपनी इंसानियत को मार देते है, क्या वही दुनिया वाले या दुनियादारी हमारा बोद्धिक उद्धार करती है ? सोचिये और ज़रूर सोचिये!

इसका सिर्फ एक ही जवाब है “नहीं” “बिलकुल नहीं” “कभी नहीं”. हमें यह समझना चाहिए की जो लोग किसी के लिए खड्डा खोदते हैं, जो किसी की कही-सुनी आधी-अधूरी बातों पर विश्वास कर किसी का बुरा करते है, जो दूसरों को दुःख दे कर खुश होते हैं, जिन्हें इंसानियत का सिर्फ दिखावा करना आता है, जो वाकई दोस्ती के नाम पर कलंक हैं वो सिर्फ और सिर्फ दुनियावाले ही होते हैं. दुनिया और दोस्त के बीच का फर्क समझना बहुत ज्यादा ज़रूरी है हर उस इंसान के लिए, जो ऐसे बेशर्म लोगों के लिए अपने ही पाक रिश्तों को बर्बाद कर देते हैं. जिन्हें सिर्फ लोगों की झूटी शान, उनका खुद का बनाया हुआ आडम्बर, वो रसूक, वो रईसी, वो अश्लीलता ही अच्छी लगती है, जिनमे शुद्धता का लेश मात्र भी नहीं.

शायद इसीलिए कहा जाता है जैसी संगत वैसी रंगत. पर तब क्या जब आपको अपनी बुराइयों का पता हो फिर भी आप सच्चाई से मुह फेर कर, अपने सच्चे रिश्तों को बर्बाद कर के आगे चलते रहें ? अगर हाँ तो कब तक ? कभी सोचा है ? कभी सोचा है की जो आज आपको स्वर्ग जैसा दिख रहा है वह कल नहीं होगा ? क्या सोचा है जो झूठा स्वर्ग आपको आज सच लग रहा है उस झूठ के नीचे आपका भविष्य ही नहीं बल्कि आज भी धीरे-धीरे बर्बादी की कगार पर जा रहा है ? क्या कभी सोचा है की आज जो परिवार आपके झूठ को सच मान कर आपका साथ दे रहा है कल वो आपके साथ नहीं हुआ तब क्या होगा ? क्या कभी यह सोचा है की जो इंसान आपके लिए पूरी दुनिया से लड़ कर भी आपके लिए अच्छा सोचता है, आपकी सलामती की कामना करता है, आपको सही राह दिखाता है, अपनी सेल्फ-रेस्पेक्ट भूल कर आपके लिए हर वह काम करता है जिससे आपको सिर्फ और सिर्फ ख़ुशी ही हो, वह अगर दुनिया में ही नहीं रहा तब क्या होगा?

बस उसकी इतनी सी शर्त है की आप सुधरे, आप खुद की सच्चाई को समझे, अपनी और अपनी आत्मा से खिलवाड़ न करे, अपनी आँखें खोले और जाने की कौन आपका दोस्त है कौन दुश्मन, कौन आपके साथ आपके हर कदम पर चल पायेगा, कौन है जो आपको आपसे भी ज्यादा समझता है, कौन है जो बात-बात पर सिर्फ आपकी ही ख़ुशी चाहता है, कौन है जो दिखावे के लिए नही बल्कि दूर होते हुए भी दिल से आपके पास होता है, आपकी देख-भाल करता है. आपको उनके लिए जीना है. आपको तय करना है की आप उन्हें सहेजेंगे जो आपको कुछ नहीं समझते या फिर अपने खुनी रिश्तों के साथ उन रिश्तों को भी सहेजना है जिनके लिए आपकी एक मुस्कराहट ही उनकी मासूम सी आशा है.

आपको ही समझना है की आप उनकी भोली आशाओं को साकर करने में एक एहम किरदार निभाए. उनकी मासूमियत का मजाक न बनने दें. उनके एहसासों का, उनके प्यार और त्याग का सम्मान करें, उन्हें अपने साथ ही नही बल्कि अपने दिल के बहुत पास बड़े ही प्यार और आदर से सहेज कर रखे. तभी उनकी निश्छल सी प्यारी सी निक्की-निक्की सी आशाएं पूरी होंगी और इंसानियत अपने शबाब पर होगी.

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