एक खत प्यारे देशवाशियों के नाम……..,

Posted by Abhinav Wayne
January 27, 2018

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मेरे भारतीयों,

26 जनवरी अर्थात भारतीय गणतंत्र का पावन पर्व हर बार की भांति इस बार भी बीत चुका है। ऐसे मौकों पर अक्सर अनेकों देशवाशियों की देशप्रेमी भावनाएं एकाएक प्रज्वलित होतीं है तथा अचानक शीतलहर की चपेट में आकर सुसुप्तावस्था को प्राप्त हो जाती हैं।

ऐसा होना संभवतः आज के व्यस्त दौर में स्वाभाविक भी है, क्योंकि अब शहरों तथा ग्रामीण अंचलों की गलियों में भारतीय लोकतंत्रात्मक गणराज्य के मौलिक विहंगम दृश्य यदा-कदा ही देखने को मिलते हैं, शायद इसका एक कारण हमारी लोकतंत्रीय गणतंत्रात्मक भावनाओं का  डिजिटलीकरण भी हो जाना है। हम धरातल पर देशप्रेम को कार्यान्वित करने के स्थान पर एक वर्चुअल स्पेस अर्थात सोशल मीडिया पर तिरंगे की फ़ोटो शेयर करने तथा वीर सैनिकों की फ़ोटो के नीचे वंदे मातरम लिखने को ही देश के प्रति अपना कर्तव्य मान बैठे हैं। ऐसा करने में कोई बुराई नहीं है और न ही यह गलत है परंतु कहीं न कहीं हम इसकी आड़ में अपने वास्तविक कर्तव्यों की बलि चढ़ा रहे हैं। हमारा विवेक इतना शिथिल हो चुका है कि हमें स्वयं ही ज्ञात नही कि कब हमने एक देश को अन्धरास्ट्रीयतावाद (chauvinism) अथवा छद्म राष्ट्रवाद की भट्टी में झोंक दिया है। आंखों पर पट्टी बांधकर हमने कब सत्तालोलुपों के हाथों अपनी वसुधैव कुटुम्बकम हिंदू संस्कृति को कट्टर हिंदुत्व तथा आध्यात्मिक फासीवाद में परिवर्तित कर दिया हमें पता ही नहीं चला । जिस धरती ने कभी हिंदू, बौद्ध, इस्लाम तथा ईसाईयत जैसे विशाल धर्मों को स्वयं में अद्वितीय रूप से समाहित किया उसे हमने कश्मीरी पंडितों, जुनैदों तथा अखलाखों की चीखों के साथ सरे विश्व मे तमाशबीन बनाया है। जिस देश की सावित्री माई, फातिमा बीबी तथा पंडिता रमाबाई ने आधी आबादी के अस्तित्व को व्यक्तित्व के रूप में पहचान दिलाई उनकी आकांक्षाओं को वापसी के रूप में हमने निर्भया तथा डेल्टा मेघवाल की क्रंदन करती आत्माएं दी हैं।

वास्तव में क्या हम भारतीय लोकतंत्रात्मक गणराज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं ? क्या हमारे नैतिक मूल्य तथा संविधान हमें यही सीख देते है?

कदापि नहीं !

देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाली वीरांगनाओं और वीरों तथा संविधान निर्माताओं ने जिस देश का स्वप्न देखा था आज वही भारत हमसे प्रश्न करता है कि हम संवैधानिक तथा नैतिक मूल्यों पर कितने खरे उतरे हैं ? यह प्रश्न सिर्फ राजनेताओं,नौकरशाहों अथवा पढ़े लिखे नागरिकों से ही नही है अपितु उन सभी से है जो भारतीय होने का दावा करते है। भारत एक राष्ट्र नही अपितु एक देश है और एक देश अपने निवासियों तथा मूल्यों से निर्मित होता है और भारतीयता का दावा करने वाले प्रत्येक नागरिक की देश के प्रति कुछ जिम्मेदारी भी बनती है।

जब हमारा संविधान लागू हुआ था उसके कुछ वर्ष पश्चात ही भारतीय सिनेमा में एक गीत अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ था ,                                    ” हम लाये है तूफान से किश्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के…….।।”

भारत को ब्रितानी हुकूमत के तूफानों से निकालने वाले मांझी तथा संविधान निर्माताओं ने जिस विशाल देश को संभाल के रखने का जिम्मा हमें सौंपा था वह आज संविधान के जरिये हमसे साक्षात्कार करना चाहते हैं। वह उस शपथ को याद दिलाना चाहते हैं जब हमारे पूर्वजों ने एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक गणराज्य को अंगीकृत, अधिनियमित तथा आत्मार्पित किया था।

हमें उस शपथ को स्मरण तथा अनुपालन करने के लिए किसी विशेष दिन का इंतजार नहीं करना चाहिए। जिन दिनों में हम चौराहों पर उग्र कौम विरोधी नारे लगाते हैं, दलितों तथा वंचितों पर सरेआम अत्याचार करते हैं, पोस्टर फाड़ कर तथा स्कूल बस पर पथराव कर अपनी झूठी भारतीयता का परिचय देते हैं, उन्ही दिनों में हम संवैधानिक पदचिन्हों पर चलकर तथा अपनी गलतियों को सुधारकर भारत को पुनः महानता के शिखर पर पहुंचा सकते हैं। यह किसी एक राजनेता अथवा तथाकथित समाजसुधारक के चुनावी वादों अथवा प्रयत्नों द्वारा संभव नहीं है, अपितु आप, मैं और हम सब का समुचित, संतुलित तथा सामूहिक साहचर्य इसे संभव बनाता है। इस प्रकिया को देश कहते हैं। और यही हमारी वास्तविक देशभक्ति होगी। एक ऐसी देशभक्ति जो तथाकथित राष्ट्रभक्ति से परे होगी तथा सुसुप्तावस्था में पड़े नागरिकों को जागने के लिए विवश करेगी। ऐसा इस संविधान, देश तथा जनता का विश्वास है।

– एक भारतीय

(अभिनव, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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