Youth Ki Awaaz is undergoing scheduled maintenance. Some features may not work as desired.

एक गुमनाम क्रांतिकारी

Posted by Bishwajeet Mookherjee
January 16, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

ज़िंदगी में स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण होती है या यूं कह लें, स्वाधीनता जीवन का मूल अर्थ है । मगर हमारे देश का इतिहास दो सौ सालों की पराधीन दास्तां को बयां करती है। साल 1947 में हमारा भारत देश दो सदियों की गुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद हुआ। उस वर्ष 15 अगस्त वह दिन था जब करोड़ों हिंदुस्तानियों ने आज़ादी की सांस ली।

200 वर्षों की गुलामी की दास्तां में से सौ सालो का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं से परिपूर्ण है । इस ऐतिहासिक क्रांति में योगदान करने वाले कई नाम आज विश्वभर में प्रसिद्ध हैं, मगर हिंदुस्तान को स्वतंत्रता दिलाने में लाखों ऐसे क्रांतिकारियों का भी हाथ है जिनका नाम इतिहास के पन्नो में कहीं गुम है। उन्हीं गुमनाम बहादुरो में से एक थे डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी ।

115 साल पहले, 16 जनवरी के दिन मुर्शिदाबाद के तेलसूंडी नामक गांव में लम्बोदर मुखर्जी का जन्म हुआ। अपने ननिहाल में पैदा होने वाले इस बालक का शायद दुर्भाग्य ही था जो उसे पिता का प्यार कभी नहीं मिल पाया। उनके जन्म के कुछ महीनों पहले ही पिता शिवराम मुखर्जी का देहांत हो गया। लम्बोदर का बचपन यूं तो कठिनाइयों से भरा हुआ था मगर जो आगे चल कर स्वतंत्रता सेनानी बने, उसे तो बचपन से ही संघर्ष करने की आदत होती है। उनकी बहादुरी इसी दास्तां से समझी जा सकती है कि जब वे केवल 14 वर्ष के थे, उन्होंने अंग्रेज़ों की राइफल से भरी एक बैलगाड़ी को लूट लिया।

प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद लम्बोदर एक कोयला खदान में बतौर प्रशिक्षु काम करने लगें, लेकिन खदान में मज़दूरों के व्यापक शोषण को देखने के बाद इनका मन वहां से उचट गया। कुछ ही समय बाद सन 1920 में वे सब कुछ त्याग कर स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। 1924 में वे चित्तरंजन दास के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन से आ जुड़े। उस वक़्त किसी ने सोचा भी नहीं था कि मुख्यधारा से कटे आदिवासियों की भी स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका हो सकती है। लम्बोदर मुखर्जी ने संथाल परगना को अपना कार्य क्षेत्र चुनते हुए लाल कुर्ता पार्टी का गठन किया। उनके नेतृत्व में इस पार्टी ने स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी दौरान वे गिरफ्तार भी हुए।

जेल से रिहा होने के बाद भी लम्बोदर मुखर्जी का संघर्ष जारी रहा। 1930 के दशक में उन्होंने संथाल परगना में सफाहोड़ आंदोलन का भी नेतृत्व किया। इस वक्त तक लम्बोदर, संथालियों के मसीहा बन चुके थे। आगे चलकर देवघर व दुमका क्षेत्र के संथाल आदिवासियों के बीच वे प्रमुख रूप से सक्रिय रहें। संथालों के बीच इनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि क्षेत्रीय ब्रिटिश अधिकारी भी इनके नाम से सतर्क रहते थे। यह वो वक्त था जब गांधी जी के स्वदेशी आग्रह को देश भर में फैलाने की कोशिश चल रही थी। इसी दौरान कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन को संथालियों के बीच प्रचारित करने के लिए डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का आगमन दुमका क्षेत्र में हुआ। उस वक्त किसी ने सोचा भी नहीं था कि जो इंसान लम्बोदर मुखर्जी की मदद से संथाल परगना में काँग्रेस के स्वदेशी आंदोलन को घर-घर पहुंचा रहा है वही आगे चल कर देश के प्रथम राष्ट्रपति बनेंगे।

इसी दौरान लम्बोदर हिंदू मिशन से भी आ जुड़े। बाबा धाम के नाम से प्रसिद्ध देवघर के शिव मंदिर में साल १९३३ में लम्बोदर मुखर्जी ने ही वहां के पंडों से लड़ कर मंदिर में ग़ैर ब्राह्मणों का प्रवेश करवाया। बिहार में आए साल १९३४ के भीषण भूकंप से मची तबाही ने उन्हें झकझोर दिया । उस वक़्त वे भूकम्प पीड़ितों की मदद के लिए मुंगेर जा पहुँचे ।

इसके बाद लम्बोदर की सक्रियता स्वाधीनता संग्राम में और भी बढ़ गई जब वे कांग्रेस से आ जुड़े। साल १९३५ में इनका विवाह एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार की कन्या उषारानी से हुआ, लेकिन विवाह के बाद भी इनकी सक्रियता में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई, बल्कि इन्हें अपनी धर्मपत्नी का भरपूर सहयोग मिलने लगा । लम्बोदर मुखर्जी के राजनीतिक गुरु रहे भवभूषण मित्र ने ही इनकी शादी करवाई ।

१९३९ का वह साल था जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपने फ़ॉरवार्ड ब्लाक के प्रचार प्रसार के लिए संथाल परगना आ पहुँचे । उस वर्ष की गरमियों की एक मध्य रात्रि में अंग्रेज़ी पुलिस की नज़रों से बचते हुए सुभाष चंद्र बोस दुमका में लम्बोदर के घर आ पहुँचे ।  मुखर्जी दंपत्ति के सहयोग और मित्रता से सुभाष इतने प्रभावित हुए कि लम्बोदर की पत्नी को अपना बहन बना डाला और इसी तरह उषारानी मुखर्जी संथाल परगना में फ़ॉरवार्ड ब्लाक की प्रथम सभा नेत्रि बनी ।

आंदोलन के दौरान मुखर्जी और उनके साथियों को अंग्रेज़ी हुकूमत से बचने के लिए विभिन्न जगहों पर भेष बदल कर रहना पड़ा । कभी देवघर में दर्ज़ी बन कर रहे तो कभी दुमका में कसाई बन कर उन्हे रहना पड़ा। उस समय के प्रसिद्ध होमियोपैथिक चिकित्सक डॉक्टर परेश बनर्जी , (मिहिजाम) के यहाँ लम्बोदर कई महीनों तक काम्पाउंडर बन कर रहें । कह सकते हैं कि यही वो वक़्त था जब उन्होंने होमियोपैथ की शिक्षा अंजाने में ही ग्रहण कर ली ।

उन दिनों जब रेडियो-टेलिविज़न की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी , मुखर्जी दंपत्ति साइकिल पर बाइसकोप लगाकर गांव-गांव आज़ादी के विचारों का प्रचार-प्रसार करते थे। इससे इनकी लोकप्रियता पूरे क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। उस वक़्त के सी. आई. डी. रिपोर्ट के अनुसार लम्बोदर मुखर्जी की लोकप्रियता डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से भी कई अधिक थी । इस वक़्त तक पूरे संथाल परगना में वे मारंग बाबा के नाम से मशहूर हो गए थे । वही उनकी पत्नी उषारानी को संथाल माता का दर्जा मिला। अब तक उनकी पहली पुत्री का जन्म हो चुका था। इसी दौरान उषारानी को दुमका में टेलीग्राम लाइन उड़ाने के जुर्रत में अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया। तब उनकी पुत्री भारती शांति निकेतन के नंदलाल बोस की देखरेख में रहने लगी।
लम्बोदर की गतिविधियों से तंग आकर इनके ख़िलाफ़ दुमका में मुक़दमा चलाया गया और इन्हें इस मुक़दमे में सज़ा हुई। साल १९४० के बीच में उन्हें नज़रबन्द कर मोतिहारी जेल भेजा गया । यहाँ एक ऐतिहासिक घटना हुई जिसने लम्बोदर मुखर्जी को डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी बना दिया । जिस शाम वे मोतिहारी जेल पहुँचे थे उस वक़्त दरोग़ा के घर पर मातम का माहौल था । उन दिनों मोतिहारी में कोलेरा एक जानलेवा बीमारी थी और दरोग़ा की बेटी भी इसी बीमारी का शिकार बन चुकी थी । तब लम्बोदर मुखर्जी ने ही होमियोपैथ चिकित्सा से उस बच्ची की जान बचाई ।
इस घटना के बाद उन्हें पुलिस द्वारा नगर के पैराडाइज़ होटल में होमियोपैथ चिकित्सा करने की अनुमति मिल गई, मगर प्रतिदिन उन्हें थाने में हाज़री देने जाना पड़ता था। इस दौरान उनकी पार्टी अपने क्षेत्र में काफ़ी घटनाओं को अंजाम देती रही। नज़रबन्द होते हुए भी लम्बोदर मुखर्जी मोतिहारी से हीं अंग्रेजों के ख़िलाफ़ गुप्त रूप से आंदोलन करते रहें ।
इस दौरान लम्बोदर मुखर्जी का नाम राष्ट्रीय स्तर के स्वतंत्रतासेनानियों की सूची में शामिल हो चुका था । १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं और नेताजी से क़रीबी ने आज़ाद हिंद फ़ौज में लम्बोदर की अहम भूमिका तय कर दी थी।
भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक पहले जिन स्वतंत्रतासेनानियों पर शूट ऐट शाईट का ऑर्डर दिया गया था उनमे से एक नाम लम्बोदर मुखर्जी का भी था । मगर आंदोलन शुरू होने से ठीक पहले ही मुखर्जी को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया । हज़ारीबाग़ सेंट्रल जेल में जहाँ लम्बोदर मुखर्जी को जयप्रकाश नारायण का साथ मिला वहीं जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी भागलपुर सेंट्रल जेल में उषारानी मुखर्जी की सहेली बनी । इसी दौरान भागलपुर सेंट्रल जेल में ही उषारानी ने एक बच्ची को जन्म दिया जो आगे चलकर भारतीय सेना की पहली महिला पैराट्रूपर बनी, १९७१ के युद्ध में उन्होने दुश्मनो को धूल चटा दी ।
सन १९४६ में जब देश में पहली बार अंतरिम सरकार का गठन हुआ तब कोंग्रेस के उम्मीदवार के रूप में लम्बोदर मुखर्जी को दुमका से निर्विरोध विधानसभा सदस्य चुना गया । आज़ादी के बाद के आम चुनाव में भी लम्बोदर मुखर्जी की सत्ता क़ायम रही । उन दिनों देश भर के कई प्रमुख राजनेताओं से लम्बोदर जी के अच्छे सम्पर्क रहें । देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के लिए दुमका में मुखर्जी दंपत्ति का घर आम पड़ाव था।
मगर लम्बोदर को राजनीति का भविष्य समझने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा और उन्होंने उसी दौरान राजनीति में अपनी सक्रियता को त्याग दिया । ये वह वक़्त था जब मुखर्जी दंपत्ति वापस से मोतिहारी आकर बस गये जहाँ ग़ुलामी के दौरान ही वे होमियोपैथ चिकित्सक के रूप में काफ़ी प्रसिद्ध हो चुके थे। राजनीति में उनकी सक्रियता भले ही कम हो गई थी मगर समाज सेवा में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी । वे आजीवन एक होमियोपैथ चिकित्सक एवं समाज सेवी के रूप में ग़रीबों की मदद करते रहें । राजनीति में उनकी पहचान कुछ ऐसी थी कि बिहार के लगभग सभी मुख्यमंत्रीयों का उनके घर पर आना आम हो चुका था । एक समय में वे देश भर के क़रीब सौ संस्थाओं के शीर्ष पदों पर रहें। लम्बे समय तक वे बिहार होमियोपैथ मेडीकल असोसीएशन के अध्यक्ष भी रहें । होमियोपैथ चिकित्सा पद्धति को बिहार में स्थापित करने का श्रेय काफी हद तक इन्हीं को जाता है। इन्हीं के प्रयासों से बिहार में न केवल होमियोपैथ बोर्ड का गठन हुआ बल्कि होमियोपैथ के चिकित्सकों को भी डॉक्टर की आधिकारिक उपाधि दी जाने लगी।

१९७० के दशक में देश की आइरन लेडी कही जाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी मुखर्जी दंपत्ति के अच्छे सम्पर्क रहें । इसी दौरान इंदिरा गांधी ने मोतिहारी में उषारानी मुखर्जी को उनकी स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका के लिए ताम्ब्र पत्र से पुरस्कृत किया । उन दिनो जे• पी• आंदोलन के बाद जयप्रकाश नारायण जब भी मोतिहारी आते तो लम्बोदर मुखर्जी से मिले बिना वापस नहीं जाते। उनके मोतिहारी निवास पर ही बिहार के मुख्यमंत्री रहे जगन्नाथ मिश्र व करपुरी ठाकुर की कई बैठके भी हुईं। डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी ने आजीवन अपनी पेन्शन  की राशि ग़रीबों में ही बाँट दी। जब तक वे होमियोपैथ चिकित्सक के रूप में सक्रिय थे, उन्होंने ग़रीबों का मुफ़्त में इलाज किया।

जहाँ साल १९८७ में कैन्सर से पीड़ित उनकी पत्नी ने देह त्याग दिया वहीं २६ दिसम्बर १९९४ को इस महान व्यक्ति ने संसार को अलविदा कह दिया। मगर उनके समाज सेवा की परम्परा डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी फ़ाउंडेशन के बैनर तले आज भी जीवित है।

विश्वजीत मुखर्जी

डॉक्युमेंट्री फ़िल्मकार

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.