तीन तलाक़ के कानून पर हर आयामों पर हो चर्चा

Posted by AMARJEET KUMAR
January 15, 2018

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उच्चतम न्यायालय द्वारा इंस्टेंट ट्रिपल तलाक या तलाक-ए-बिद्दत को असवैधानिक करार दिए जाने के बाद ये खबर है की  केंद्र सरकार संसद के शीत कालीन सत्र में इस पर  क़ानून लाने जा रही है जिसमे तीन साल तक के सजा का प्रावधान है ।  किसी क़ानून के पीछे कई पेचीदगी होती है जिसका हर संभव मूल्यांकन करना आवश्यक है और इसलिए ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर कुछ महत्वपूर्ण विषयो पर ध्यान देना आवश्यक है जैसे अगर इंस्टेंट ट्रिपल तलाक  असवैधानिक और गैर कानूनी है तो सजा सिर्फ इस बात की होगी की किसी ने ऐसा करने की कोशिश की है । सवाल लज़्मी है की क्या  ऐसे मामलो में तलाक की सम्भावना कम होगी या बढ़ेगी ? इस बात  से इंकार नहीं किया जा सकता की ऐसे मामलो का अंत तलाक़ ही होगा तो इस क़ानून को लाने का फ़ायदा क्या है?  सच्चाई ये है की ये कानून जिसमे तीन  वर्ष की सजा का प्रावधान है लोगो के बीच चर्चा  और आकर्षण का विषय बन गया है जबकि ऐसे कई अहम् हिस्से है जिसपर बात करने की जरूरत है , तलाक़ जैसे मामलो  में  हमें संयम और दूरदर्शिता दिखाने  की जरूरत  होती है ताकि कोई गृहस्ति फिर से बसाई  जा सके ।    प्रस्तावित मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2017 पर  कुछ सवाल ऐसे ही जिसे पर बात करना जरूरी होगा जैसे तलाक़ के बाद महिलाओ के जीवन निर्वाह का प्रश्न वही पहली पत्नी के तलाक़ के बिना दूसरी शादी करना गैरकानूनी हो ऐसे कई मुददे है जिसपर गहन मंथन की जरूरत है ।

प्रश्न यह है की वर्तमान में जो अन्य कानून है वो कितने प्रभावी है तो जवाब ये है की वो मात्रा निषेधात्मक बन कर रह गए है जैसे आज कोर्ट में सैकड़ो ऐसे मामले लंबित है जिसमे पुरुष बिना शादी के दूसरी अविवाहित पत्नी को रखने का दोषी है जो कही न कही  हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 से किनारा करने की जुगत है जिसके  तहत बिना तलाक़ किसी भी शादी को गैरकानूनी बताया गया है पर इसका ये मतलब नहीं है की वो अप्रभावी है, नियम और कानून की प्रभाविकता उसके मानने वाले तय करते है न की तोड़ने वाले , वो लोग तो बस उस कड़ी का हिस्सा है जिसमे वो नियम और कानूनों के नकारात्मक पक्ष को ही देख पाते है । बहरहाल क्या  ऐसे में मुस्लिम महिलाओ के हितो का संरक्षण हो पायेगा जिसमे धर्म में बहुविवाह को मान्यता है । जवाब बस इतना ही है की कुछ मुद्दे सामजिक है जिसका निदान सामजिक होगा पर जहाँ क़ानून का प्रश्न हो वहां सरकार से ये अपेक्षा है की वो ऐसे मामलो में प्रभावी  निषेधात्मक क़ानून लाये ताकि वैसे व्यवहारों को रोका जा सके जिसमे तलाक़ के बीज बनते है।

अब बात जब एक प्रभावी क़ानून लाने की बात हो रहे है ऐसे में मुस्लिम समाज के  पैरोकारों को साथ लेकर चलना होगा हाल ही में केंद्र सरकार के मंत्री दवारा एक बयान आया जिसमे ये बात सामने आई है की ट्रिपल तलाक से सम्बंधित जो कानून बनाई जा रही है उसमे किसी भी सम्बंधित पैरोकारों समाज के लोगो से राय नहीं ली गई है ऐसे में एक प्रभावी कानून लाना क्या संभव हो पायेगा ये सवाल लाजमी है जबकि उच्चतम न्यायालय दवारा इस सम्बन्ध में ऐसी अपेक्षा की गई थी । मसला ये है की जो  कोई कानून किसी भी ख़ास धर्म या लोगो से जुड़ा हो ऐसे में एक सामंजस्य की अपेक्षा होती है वरना इस देश में ऐसे कानून की लम्बी सूची है जो सिर्फ क़ानून मात्र है । कमला भसीन जो महिला अधिकारों  से जुड़ी है उन्होंने घरेलु हिंसा अभिनियम 2005 के प्रभावी ने होने के पीछे कई सामजिक तर्क दिए है जिसमे पितृसत्ता का जिक्र किया है तो सवाल लाजमी है की अगर घरेलु हिंसा अभिनियम 2005 महिलाओ जिसमे मुस्लिम महिला भी शामिल है को अधिकार नहीं दिला पा  रहा है तो क्या हम ट्रिपल तलाक से सम्बंधित कानून को प्रबावी बना पाएंगे । महिला सशक्तिकरण की रूपरेखा तैयार करने में ऐसे कानून का महत्व तभी तक है जब  ये प्रभावी रूप से से लागू हो वरना सच्चाई ये है की महिला इन क़ानून का सहारा ले ही नहीं पाती है। समस्या ये भी है की मुस्लिम महिलाओ  में साक्षरता का प्रतिशत कम है और अधिकांश जनसंख्या गावो में निवास करती है ऐसे में कानून का प्रभावी  होना या न होना सामजिक स्थिति दवारा भी तय होती है ऐसे में क़ानून के प्रभावी बनाने में सामाजिक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

जहाँ मामला कानून के दुरूपयोग का है वहाँ क़ानून में  खामियों से इंकार नहीं किया जा सकता है उच्चतम न्यायालय द्वारा इंस्टेंट ट्रिपल तलाक या तलाक-ए-बिद्दत को असवैधानिक करार दिए जाने के बाद ही कई  मामले दर्ज किये जा चुके थे ऐसे में ये लाजमी है की ऐसे में कानून के दुरूपयोग की समस्या खड़ी हो सकती है  हाल के मामलो में उच्चतम न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न के मामलें (498 A)  गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया था जहाँ मामला इस क़ानून के दुरूपयोग का था हालांकि उच्चतम न्यायालय बाद में फिर इसे महिला अधिकारों के खिलाफ मानते हुए पुनः विचार के लिए रख लिया है । इस बात से साफ़ जाहिर होता है की कुछ मुद्दे ऐसे है जिसपर एक प्रबावी कानून लाना काफी मुश्किल होता है तभी तो न्यायालयो दवारा विभिन्न मामलो में कई फिसले बदलते रहते है । वास्तविकता ये है की ऐसे कानून में दोनों पक्षों के हितो का सामान रूप से ख्याल रखना पड़ता है क्योंकि मसला यहाँ दो अपने ही सदस्यों के हितो के टकरार से जुड़ा है और दोनों पक्षों पर नागरिक अधिकार सामान रूप से लागू करना न्यायालय का दायित्व होता है । कानून का दुरुपयोग कोई नई समस्या नहीं है बल्कि ऐसे कई मामलें आसानी से देखे जा सकते है ऐसे में आवश्यकता है की एक सशक्त व प्रभावी कानून लाया जा सके।

इंस्टेंट ट्रिपल तलाक के मामलें में कुछ ख़ास बातो का ख़याल रखने की आवश्यकता है जैसे क़ानून का स्वरुप निषेधात्मक होने के साथ साथ समस्या सुधारात्मक उपाए भी हो हमें इसे एक सामाजिक बुराई के तौर पर लेना है न की एक अपराध के रूप में । तो सरकार से अपेक्षा है की ऐसे  मामलें में जो शिकायत आती है उसे परिवार न्यायालय के अंतर्गत रखा जाए ताकि सम्बंधित परिवार से एक हल निकाला जा सके वही सुलह होने की स्थिति में सजा का  प्रावधान कम से कम हो ताकि परिवार को किस मुश्किल का सामना न करना पड़े । और सबसे बड़ी बात की तलाक़ होने की स्थिति में महिला के जीवन निर्वाह  के लिए समुचित कानून का प्रावधान हो । इस क़ानून में निपटारे में समय सीमा की  बाध्यता शामिल हो जो अन्य मामलो में भी अपेक्षित है  ताकि सम्बंधित परिवार को किसी अन्य समस्या का सामना न करना पड़े ।  हमें इस बात को उपेक्षित नहीं करना होगा की परिवार एक संस्था है और उसमे सभी सदस्यों की अहम् भूमिका होती है जो बच्चो के भविष्य की रूपरेखा तैयार करते है ऐसे में हमारा कत्र्तव्य परिवार बचाना होना चाहिए ।

 

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