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क्या आज के समय का फेमिनिज्म सिर्फ शहरों तक सीमित हो गया है

Posted by Shashank Mukut Shekhar
January 13, 2018

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‘फेमिनिज्म’ शब्द पिछले कुछ सालों में हमारे देश में सबसे ज्यादा चर्चा में रहे शब्दों में शुमार है. महिलाओं के अधिकार को लेकर महिलाओं खासकर नई लड़कियों का आगे आकर बात करना अत्यंत सुखद है. इस लड़कियों ने जिस तरह खुलकर जीने को लेकर आवाज बुलंद किया है, वे वाकई बधाई के हकदार हैं. हमारे समाज में व्याप्त पुरुष वर्चस्व को तोड़ने की दिशा में बढ़ाए गए इनके कदम ने एक क्रांति सी ला दी है. आज ये लड़कियां उन मुद्दों पर खुलकर और निडर होकर बात कर रही हैं जो कुछ समय पहले तक हमारे समाज में टैबू की तरह था. इसमें महिला सुरक्षा से जुड़े कुछ अहम सवालों को भी प्रमुखता से उठाया गया है.

एक लोअर मिडिल क्लास परिवार से आने के कारण मैंने महिलाओं की कई चीजों से जुडी भ्रांतियों को अत्यंत करीब से देखा है. मैंने अपने घर की महिलाओं को अपने अंतःवस्त्र को दुसरे कपड़ों के नीचे ढ़ककर सुखाते देखा है. इसी तरह माहवारी के समय कपड़ों का इस्तेमाल भी हमारे रुढ़िवादी समाज में लम्बे समय से चला आ रहा है. मैंने अपने परिचित लड़कियों और महिलाओं को ब्रा और पेंटी खरीदते समाज शर्म और झिझक भी देखा है.

एक पुरुष होने के नाते मैं यह स्वीकार करता हूँ कि लम्बे समय तक पुरुष महिलाओं की ब्रा-स्ट्रिप देखकर उत्तेजित होते रहे हैं. छोटे कपड़े पहनने के कारण लड़कियों की आलोचना और जिल्लत का सामना करना पड़ा है. पर आज की लड़कियों ने इन सभी टैबू बन चुकी धारणाओं को तोड़ने का काम किया है. इनके प्रयास से समाज में बदलाव भी आया है. इन  मुद्दों पर खुलकर बात किया जा रहा है. सोशल मिडिया पर लिखने वाली तथा पत्रकारिता संस्थानों में काम करने वाले लगभग सभी लड़कियां और महिलाऐं लम्बे समय से इन मुद्दों पर लिखती रही है. और आज भी बड़ी तादाद में इन मुद्दों पर लिखा जा रहा है.

ये मुद्दे जरुरी हैं. इनपर लिखा जाना भी जरुरी है. मगर इनसे इतर महिलाओं से जुड़े और भी कई मुद्दे हैं जिनपर लिखा जाना आवश्यक है. उन मुद्दों पर बात किया जाना तथा उसके निवारण के उपाय किए जाने जरुरी हैं. आज सोशल मिडिया से जुड़ा एक बड़ा युवा वर्ग(लड़कियां और महिलाऐं) शहरों में रहती हैं. वे अपनी बात खुलकर लिख रही हैं तथा अपनी सुरक्षा और आजादी को लेकर आवाज उठा रही हैं. मगर उन महिलाओं के मुद्दे भी उठाने जरुरी हैं जो इंटरनेट के दूर सुदूर गांवों में रहती हैं.

आज महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर जमीनी स्तर पर कार्य अत्यंत कम हो रहा है. गांवों में रहने वाली महिलाऐं आज भी बंधनों में जी रही हैं. उनके लिए आजादी आज भी एक सपना जैसा ही है. वे महिलाऐं और लड़कियां आज भी अपने पसंद से कपड़े तक नहीं पहन सकती. चूँकि वे मेनस्ट्रीम और इन्टरनेट से दूर हैं तो वे अपनी बात कहने में सक्षम नहीं हैं. उनकी समस्याओं पर बात किया जाना उतना ही जरुरी है जितना पिरियर्ड्स और ब्रा की स्ट्रिप पर. ये मुद्दे अत्यंत पुराने और धिसे-पिटे मालूम होते हैं और शहरी क्षेत्र की महिलाऐं/लड़कियां इन समस्याओं से निज़ात पा चुकी हैं. इसलिए उनका ध्यान इनपर नहीं जा पा रहा.

कई जगह ग्रामीण क्षेत्र के भीतरी इलाकों में महिलाओं की हालत आज भी छह दशक पूर्व जैसी ही है. वे महिलाऐं आज भी चूल्हा-चौका, जलावन-राशन और बच्चों के पोषण तक ही सीमित हैं. 50 प्रतिशत आरक्षण के बावजूद उनका जीवन अपेक्षित ही है. उनके उत्थान के उपायों पर कार्य तो दूर चर्चा तक अत्यंत कम होता. चूँकि उनके पास अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाने का उचित साधन नहीं हैं तो उनकी बातें और उनकी इच्छाएँ दबी ही रह जाती. उनके काउंसलिंग की बातें भी बस हवा-हवाई ही हैं.

आज शहरी महिलाऐं खुद पर हुए अत्याचार को लेकर हजारों की संख्या में सड़क पर उतर रही है. पर उन ग्रामीण महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को लेकर चुप्पी क्यों? क्या ग्रामीण महिलाऐं शहरी महिलाओं से भिन्न हैं? चूँकि देश की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों की हालत ही हमारे देश की वास्तविकता है. ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को आज भी सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध नहीं हो पा रहा. उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ विकट हैं. इसका कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पुरुषों का महिलाओं के स्वास्थ्य व समस्याओं के प्रति उदासीनता. और सरकार के दावे तो बस कागजी बात बनकर रह जाती है. यहाँ तक की वे महिलाऐं कई संवैधानिक अधिकार तक पाने से वंचित हैं. पर उनकी समस्याओं को लेकर शहरी लोगों द्वारा भी उचित मात्रा में आवाज बुलंद नहीं किया जा रहा. शहरी महिलाऐं बस अपनी समस्याओं तक ही सीमित होती प्रतीत हो रही.

 

उदहारण के तौर पर देखें तो शहरी क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाएं सामने आने पर बड़ी तेजी से पब्लिक मुद्दा बनता है. युवा ऐसे मुद्दों पर अपना विरोध जोरदार ढंग से प्रकट करते हैं. इससे उलट ग्रामीण क्षेत्रों में बलात्कार के कई मामले प्रेस/मीडिया और पुलिस तक भी नहीं पहुँच पाते. और कई दफा दोनों पक्षों में समझौते होने की बात भी सामने आती है. समाजसेवा से जुड़े व्यक्तियों के साथ काम करने के कारण मैं बिहार के ग्रामीण इलाकों में बराबर जाता रहता हूँ. उन सुदूर इलाकों में भी जाना होता है जहाँ गड्ढों से पटे सड़क और चारों और बिखरी गरीबी सरकार के विकास के दावे की पोल खोलती दिखती है. इन इलाकों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार(जिसमें ऊपर वर्णित बलात्कार संबंधी मामलों के हालात) का गवाह मैं खुद हूँ.

महिलाओं पर होने वाले शारीरिक व मानसिक अत्याचार ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यंत ज्यादा है. बाल विवाह, दहेज़ के कारण लड़कियों के जीवन का नारकीय होना बड़े स्तर पर आज भी जारी है. आज भी ग्रामीण महिलाओं की एक बड़ी आबादी अपने मूलभूल अधिकारों से वंचित हैं. मूलभूत अधिकारों से मेरा आशय खुलकर जीने की आजादी, लड़कियों की अपने पसंद से करियर चुनने की आजादी, महिलाओं का चूल्हा-चौका से इतर जिंदगी के दुसरे पहलुओं को महसूस करने की आजादी, अपनी पसंद का जीवनसाथी और दहेज़ के मुद्दों को लेकर कहीं भी ब्याह देने से बचने की आजादी वगैरह है. पर इसको लेकर माकूल आंदोलन नहीं हो रहे. उनकी आवाज बनकर शहरी महिलाऐं आगे क्यों नहीं आ रही?

अब सवाल उठता है कि ग्रामीण महिलाओं/लडकियों के इन मुद्दों पर शहरी महिलाओं को क्यों आगे आना चाहिए? उनके आगे आने से क्या फायदा होगा? सर्वविदित तथ्य है कि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के पास अपनी आवाज उठाने के लिए माकूल अवसर तथा रिसोर्सेस नहीं हैं. पारंपरिक मिडिया और आधुनिक डिजिटल मिडिया की पहुँच भी उनतक अत्यंत कम है. इंटरनेट तथा सोशल प्लेटफ़ॉर्म की पहुँच भी उनतक नाममात्र ही है. इस कारण उनकी परेशानियाँ दुनिया के सामने नहीं आ पाती. और शहरी क्षेत्र की महिलाऐं/लड़कियां इन सब रिसोर्सों से लैस हैं. उनके पास समस्याओं को लेकर आवाज उठाने तथा आन्दोलन करने के तमाम अवसर तथा प्लेटफ़ॉर्म मौजूद हैं.

ग्रामीण महिलाओं की आवाज बनकर शहरी क्षेत्र की महिलाओं के आगे आने से ग्रामीण महिलाओं की आवाज को बल मिलेगा. उनकी आवाजें जो इस पुरुष प्रधान समाज में दबी रह जाती है, वे शहरी महिलाओं के प्रतिरोध के स्वर बनकर फूटेंगे. ऐसा करने से ग्रामीण महिलाओं को बल व प्रेरणा दोनों मिलेगा.   

वर्तमान समय में सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए अनेकों कार्यक्रम तथा योजनाएं संचालित की जा रही है. पर अशिक्षा तथा जानकारी के अभाव में स्त्रियों(खासकर ग्रामीण) को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा. आज भी ग्रामीण क्षेत्र की महिलाऐं पुरुष-प्रधान मानसिकता से पीड़ित हो रही हैं. गर्भ तथा कुपोषण संबंधी समस्याएँ बदस्तूर जारी हैं. पर इन समस्याओं को लेकर फेमिनिस्ट सड़क पर क्यों नहीं आते? इनपर खुलकर बड़ी मात्रा में क्यों नहीं लिखा जाता? ये मुद्दे भी तो उतने ही जरुरी हैं.

आम तौर पर देखा जाता है कि शहरों में ग्रामीण महिलाओं के इन मुद्दों को लेकर तमाम तरह की गोष्ठियां और विमर्श होते हैं. ऐसी गोष्ठियों और विमर्शों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उपाय किए जाने चाहिए ताकि उनतक बात पहुँच सके. साथ ही इन गोष्ठियों और विमर्शों का विस्तार ग्रामीण क्षेत्र तक करने की आवश्यकता है. उदहारण के तौर पर पिछले वर्ष मैं सरकार तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा महिलाओं के मुद्दों पर आयोजित कुछ गोष्ठियों तथा सेमिनारों का हिस्सा बना. देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि महिलाओं के मुद्दों पर आयोजित गोष्ठियों तथा सेमिनारों में में महिला भागीदारी ही अत्यंत कम है. प्रयास यह होना चाहिए कि ऐसी चीजों में महिलाओं(खासकर ग्रामीण) की भागीदारी अधिक-से-अधिक हो.    

ग्रामीण परिवेश व मानसिकता ग्रामीण महिलाओं को सड़कों पर आने से रोकती है. टेक्नोलॉजी का अभाव व इन महिलाओं की इंटरनेट तक सीमित पहुँच के कारण इनकी आवाज दबी रह जाती. पर महिलाओं की समस्या पर जिस तरह की आवाज शहरी महिलाओं द्वारा उठाया जा रहा है, इन मुद्दों पर उनकी चुप्पी ख़तरनाक है. शहरी जनसँख्या ज्यादा संपन्न है. उनके पास सोर्स ज्यादा हैं. ऐसे में उनका यह कर्त्तव्य बनता है कि वे ग्रामीण महिलाओं की समस्याओं को अपना मान उनपर बात करे, विमर्श करे. विमर्श से इतर उसपर आवाज भी बुलंद करे.

ऐसा करने से महिला के अधिकारों के लिए संघर्षों के दायरे का विस्तार होगा. ग्रामीण महिलाओं के दबे स्वर शहरी महिलाओं का विरोध बनकर दुनिया के सामने आएँगे तो समाज को उनको बेड़ियों से मुक्त करना ही होगा. शहरी महिलाओं से प्रेरणा लेकर ग्रामीण महिलाऐं भी अपने अधिकारों के लिए घर से बाहर निकल पड़ेंगी. महिला उत्थान का मतलब किसी खास वर्ग की महिलाओं के उत्थान से नहीं वरण सम्पूर्ण देश व विश्व के महिलाओं के उत्थान से हैं. अतः जो संपन्न वर्ग है उन्हें ही दबे वर्ग की आवाज बनकर आगे आना होगा.

 

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