#क्या समाज़ मे अपनी जाती के नाम पर वर्चस्व पाना इतना जरूरी हो गया ???

Posted by Poonam Singh
January 25, 2018

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अभी – अभी कुछ ही हफ्ते पहले हमने देखा की जाती के नाम पर देश के महाराष्ट्रा राज्य मे हिंसक ने इतना बड़ा रूप ले लिया था की हमारे पुणे से बढ़ती हुई नफरत की आग मुंबई मे रुकी। इतना पथराओ हुआ, रेल व्येवस्था रोका गया, बस और कहीं कहीं तो बेकसूर लोगो की दुकानों को तोड़ दिया गया। मुंबई बंद भी करवाया गया हलकि सरकार ने रोकनी चाहिए परंतु जो मुंबई जाती धर्म से दूर रहकर काम करना सीख गया था , जहां के अलग अलग धर्म के लोग एक ही टिफ़िन या खाने की थाली बाँट ते हैं वही एक छोठी सी घटना ने हमारे मन मैं कहीं न कहीं जाती धर्म के बारे मे बोलने के लिए मजबूर कर दिया.

अब मुंबई मे हुआ तो राजस्थान के लोग पीछे कैसे हट जाए? आप जानते हैं की वर्तमान मे बस एक ही हल्ला है “पद्मावती” फिल्म। मुद्दा बना दिया गया की फिल्म मे राजपूतो को हताहत करने वाली बात कहीं गयी हैं।  “करनी सेना”  जिनका नाम हमने कभी नहीं सुना यहा तक की राजस्थान के लोग भी नहीं जानते होंगे परंतु इस से अच्छा मौका कैसे जाने देते। बस फिल्म का मुद्दा बनाकर सेना ने इस तरह लोगो को भटका दिया की वो ये सोचने पर मजबूर हो गए की क्या हम ये फिल्म देखे की नहीं।  कहीं कहीं आगजनी, सड़के जाम, रेल गाड़ी रोकना और आम आदमी को परेशान कर राजपूत करनी सेना क्या साबित करना चाहते हैं??? अपना वर्चस्व पाना समाज़ मे इतना जरूरी हो गया की जाती धर्म को मुद्दा बना कर हम समाज़ को बाँट रहे हैं।

हम हमेशा ये सीखते आए की ” मजहब नहीं सिखाता , आपस मे बैर रखना”  परंतु हम बिलकुल इनका उल्टा कर रहे हैं । मैं तो यही कहूँगी की “करनी सेना ” से की हम राजपूत कभी नहीं चाहते देश मे हिंसा हो, राजपूत तो प्रजा के लिए काम करते हैं परंतु आप तो समाज़ मे गलत संदेश देकर बस  उपहास के पात्र बन रहे हैं ।  और न ही लोग आपको अपने देश का नेता बना लेंगे । ये आग धीरे धीरे राजस्थान से लेकर गुजरात,मध्येप्रदेश, बिहार और मुंबई तक बढ़ती जा रही है, फिल्म के प्रसारण के रोक के लिए लोग इस तरह भड़कने लगे की  अपना कीमती समय बस हमारी जाती ही ऊंची हैं यही साबित करने मे लगे हैं।

जाती का इस्तेमाल तो सिर्फ नौकरी पाने तक ही सीमित रहे तो ठीक, बस किसी को हताहत नहीं करनी चाहिए। हम कहीं न कहीं 60 साल पीछे जा रहे है , जहां के लोग एक ही कुंवे मे पानी नहीं पी सकते थे। अगर किसी फिल्म के देखने पर इतिहास बद्दल रहा है, तो वही हम कहीं न कहीं बुरे समय का इतिहास बन रहे हैं।

हम अपना आने वाला समय खराब कर रहे हैं कहीं न कहीं जाती को मुद्दा बनाकर।

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