गरीबी के विरोध में पद्मावति जैसी उग्रता क्यों नही?

Posted by Ankit Shrivastava
January 16, 2018

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फिल्म पद्मावती का बिना देखे जिस प्रकार विरोध किया गया वह बहुत कुछ कह गया। इस घटना ने दो तीन बातें रेखांकित की-

पहला : मानसिक तौर पर समाज का एक तबका भीतर तक भयभीत है।
दूसरा : एक हद तक हम लोगों को संस्कृति मान बैठे हैं।
तीसरा : हमारे देश की एक बड़ी जनसंख्या आज भी अपने जीवन का नेतृत्व खुद नहीं करती है।

पहले तथा दूसरे बिंदु के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है मैं सीधे तीसरे बिंदु पर आता हूं। विरोध करना लोकतंत्र में हर नागरिक का अधिकार है। अतः जिन महानुभावों और माताओं ने किसी वजह से अपना क्रोध व्यक्त किया है, मैं उनका आदर करता हूं। पर इस पूरे घटना क्रम नें मुझे बार-बार खुद से यह प्रश्न पूछे पर मजबूर किया कि आखिर इस फिल्म को किसी ने देखा तक नहीं तो उसके विरोध का आधार क्या हुआ होगा? यह ‘पतीली देखकर चावल कैसा बना है’ बताने वाली स्थिति है। बहुत सोचा फिर शंका हुई कि यह अफवाहों द्वारा उद्वेलित विरोध भी तो हो सकता है।

आखिर विरोध प्रदर्शनों में जाता कौन है? विरोधियों द्वारा शहीद संपत्ति होती किसकी है? प्रश्न यह भी है कि अगर वह विरोध में ना जाएं तो क्या करें? यहां मैं आपको एक ग्राउंड रिपोर्ट से अवगत कराना चाहता हूं। विरोध प्रदर्शनों और रैलियों में आने वाली भीड़ के गांवों और पंचायतों में जब ग्रामसभा होती है तो चार से पांच लोग ही होते हैं और उनमें भी तीन से चार लोग तो ऐसे होते हैं जिनका होना अनिवार्य है अर्थात वह सरकारी ऑफिसर या जनप्रतिनिधि होते हैं।

आज की लोकतांत्रिक परिस्थिति में आर्थिक न्याय एवं अवसर की समानता केंद्र में हैं। संपूर्ण विश्व में आर्थिक कंट्रोल बढ़ता जा रहा है। सूचना क्रांति के बाद अवसरों की उपलब्धता बहुत बड़ी है। आज का आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि हमारी 83 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या को इंटरनेट उपयोग करना आता ही नहीं। इसका परिणाम यह है कि हम कुछ खास चीजों पर ही अटके हुए ज़िंदगी के आर्थिक मुहाने पर असुरक्षित महसूस करते हैं और यही असुरक्षा हमारे मन में किसी भी नई वस्तु को लेकर भय पैदा कर देती है।

दुनिया की रफ्तार ने हमें डरा दिया है और शायद इसी का परिणाम है कि 5 वर्ष पहले छात्र राजनीति के मुखिया लोग आज मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का कार्य करते नजर आ रहे हैं। हमारा समाज यह समझने को तो तैयार है कि सरकार की योजनाएं होनी चाहिए, हर पहलू पर सरकार की योजनाएं जरूरी हैं। पर हास्यास्पद यह है कि इस समाज को ना तो इन योजनाओं के निर्माण में कोई भूमिका अदा करने में रुचि है और ना ही लागू करने में।

यह समझना होगा कि हमारी आर्थिक स्थिति तब तक सुदृढ़ नहीं हो सकती जब तक हमारे पास एक सुदृढ़ आधारभूत संरचना सूत्र, स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था तथा पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम नहीं हो जाता। हम व्यक्तिगत रूप से तो पैसे कमा लेंगे, कोई बड़ा महल भी बना लेंगे लेकिन संपूर्ण भारतवर्ष के सड़क नहीं बना सकते। सभी अस्पतालों की देखभाल नहीं कर सकते और जब नहीं कर सकते तो जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर हम बीमार पड़ते ही रहेंगे। ऐसे में विकास और नवाचार कब होगा? भारत में हर साल दो करोड़ जनसंख्या सिर्फ स्वास्थ्य की समस्याओं के कारण BPL में चली जाती है।

हमें यह समझना होगा कि सरकार की योजनाओं का वाजिब लाभ न लेकर हम संपूर्ण तंत्र को कमज़ोर करते हैं। हम अपने सभी साथी नागरिकों को मजबूर करते हैं कि वह यथा-संघर्षपूर्ण स्थिति में बने रहें। वास्तव में अपनी भूमिका नहीं निभाकर हमने इस तंत्र को अपने हाथ से जाने दिया और पुनः तंत्र के ही शिकार हो गए। हमें यह समझना होगा कि आज कि इस खुले दौर में हम किसी से कुछ भी छिपा नहीं सकते। अगर कुछ संरक्षित करना ही है तो हमें उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रखना होगा उसे आनंद का स्रोत बनाना होगा चाहे वह संस्कृति हो या फिर लोकतंत्र।

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