“हम आदिवासियों को सरकारी भीख नहीं, अपना हक चाहिए”

Posted by Raju Murmu in Hindi, Politics, Society, Staff Picks
January 3, 2018

आदरणीय महादेव टोप्पो जी की दो पंक्तिया याद आ रही हैं-

“वह धनुष उठाएगा प्रत्यंचा पर कलम चढाएगा, साथ में बांसुरी और मांदर भी ज़रूर उठाएगा,
जंगल के हरेपन को बचाने के खातिर, जंगल का कवि मांदर बजाएगा चढ़ाकर प्रत्यंचा पर कलम।”

ज़मीन का एक टुकड़ा महज़ भौगोलिक इकाई ही नहीं होता वरन इतिहास, संस्कृति, परंपरा और विरासत का केन्द्र होता है। जिस तरह से जनजातीय क्षेत्रों में उद्योगपतियों और नक्सलवादियों का दबदबा बढ़ा है, इसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ वहां की स्थानीय जनजातियों को ही उठाना पड़ रहा है। आखिर किसके पास जाएं वो अपनी फरियाद लेकर?

देश की सरकारें लंबे समय से ‘नक्सलवाद’ को रोकने के लिए इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर ऑपरेशन्स चला रही हैं और जंगल सैनिक छावनियों में तब्दील हो रहे हैं। ‘एंटी नक्सल मूवमेंट’, ‘ग्रीनहंट’ और ‘सलवा-जुडूम’ जैसी कोशिशों से क्या सचमुच जनजातियों की सुरक्षा मुकम्मल हो पाई है?

यह तो वही बात हुई कि कुल्हाड़ी डाल पर चलाने के बदले जड़ पर ही चलाई गई है। आज भारत के जनजातीय (होड़-होपोन) समुदायों को लोग उनके विशेष कल्चर या भाषा के लिए नहीं बल्कि ‘नक्सल’ के रूप में होने के लिए ज़्यादा पहचानते हैं, जो वाकई में इस देश के लिए बहुत ही शर्मनाक बात है।

इस देश के प्रथम निवासी (होड़ -होपोन) जनजातियों की पहचान के सामने एक सवाल खड़ा होता जा रहा है। मैं तो कहता हूं कि ज़रा नज़दीक से इन जनजातियों की सादी जीवन शैली को देखें! आप उन्हें कैसे ‘नक्सल’ कह सकते हैं? क्या भारत में कोई ‘नक्सल’ नाम की जनजाति पाई जाती है? आखिर क्या वजूद है इस ‘नक्सल’ शब्द का जिसे बड़ी शिद्दत के साथ जनजातियों के ऊपर चिपकाया जा रहा है? नक्सलवाद सिर्फ ‘जनजातीय’ क्षेत्रों में ही क्यों मौजूद है और नक्सलवाद को मिटाने के लिए होने वाली मुठभेड़ में मारे गए लोगों में ‘जनजातियों’ के ही लोग क्यों हैं?

शक के आधार पर जनजातीय लोगों पर नक्सली का लेबल लगाकर दी जाने वाली पुलिसिया प्रताड़ना और बिना सुबूत के जेल में डाल देना क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करता कि देश के इन मूलनिवासियों को समाप्त करने की कोई साजिश रची जा रही है? इन इलाकों के लिए भूमि और जंगल से सम्बंधित तमाम जनजातीय संरक्षण कानूनों के बावजूद सबसे ज़्यादा खनन से इन क्षेत्रों को ही खोखला और प्रदूषित किया जा रहा है, जिसकी निंदा आज तक किसी भी सरकार ने नहीं की। इन क्षेत्रों में कई तरह की समस्याएं हैं, जिससे यहां की जनसंख्या भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई है। जनजातियों की महिलाओं और बच्चों को स्वास्थ सम्बंधित कई समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, लेकिन इस तरफ भी सरकार की नज़र नहीं जाती।

जनजाति क्षेत्रों में स्थानीय आदिवासी महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर बलात्कार, प्रताड़ना और अत्याचार हुए और हो रहे हैं, लेकिन ना तो किसी राष्ट्रीय अखबार और ना ही किसी न्यूज़ चैनल में यहां की स्थानीय खबरों और मुद्दों को जगह मिल पाती है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? कहीं राजनीतिक और उद्योगपति वर्गों को डर तो नहीं लग रहा है कि खनिज सम्पदा से भरा यह क्षेत्र उनके हाथों से निकल ना जाए?

आज़ादी के बाद से आदिवासियों की सैकड़ों एकड़ ज़मीन उद्योग स्थापित करने के नाम पर ले ली गई, लेकिन विकास किसका हुआ? मुआवज़ा और विस्थापन जैसे इनके लिए मज़ाक बनकर रह गया। ये खुद सोने के महलों में रहते हैं और अगर आदिवासी अपने झोपड़े में भी रहना चाहते हैं तो ये उस झोपड़े को भी छीन लेना चाहते हैं।

आदिवासी सांसदों और विधायकों का पार्टी की मान मर्यादा का खयाल रखते हुए चुप्पी साध लेना अपने समाज के साथ गद्दारी नहीं तो और क्या है? किसी भी आदिवासी विधायक और सांसद को खुलेआम किसी भी डिबेट में हिस्सा लेते या सदन में अपने आदिवासी समाज के हक के लिए आवाज़ उठाते नहीं देखा है, आखिर समस्या क्या है? आखिर हम आदिवासियों के जनप्रतिनिधि कुछ बोलते क्यों नहीं? क्या पार्टी का सिद्धांत अपने समाज से बढ़कर है? या फिर सत्ता के लालच ने इन्हें अंधा बना दिया है? अब हमारे लोगों का यह फर्ज़ है कि अपने प्रतिनिधि से इन सभी विषयों पर सवाल पूछें। डर किस बात का! प्रतिनिधि चुनते समय तो किसी को कोई डर नहीं लगता। जो अयोग्य हैं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएं, योग्य व्यक्ति ही अपने समाज को लीड कर सकता है।

जिस तरह से पिछली और वर्तमान सरकारों ने कानून बनाए उनके दायरे में जनजातीय समुदायों को समेट पाना संभव नहीं, क्योंकि उनका तो खुद का अपना कानून होता है। इस कानून को आज तक किसी भी सरकार ने पूर्ण रूप से लागू नहीं किया, जिसे ‘पांचवी अनुसूची’ (schedule 5) के रूप में जाना जाता है। आज़ादी के 70 साल बाद भी ‘पांचवी अनुसूची’ (schedule 5) भारतीय संविधान के अनुरूप लागू किए जाने के लिए इंतज़ार कर रहा है।

मैं सरकार से आदिवासियों के लिए भीख की उम्मीद नहीं करता, मैं तो सिर्फ और सिर्फ उनके, हक, अधिकार और सम्मान की बात करता हूं। लड़ना आदिवासियों के खून में है और जब लड़ाई अपने सम्मान और हक की हो तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बिरसा मुंडा से लेकर तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हु जैसे हमारे वीर योद्धाओं ने विदेशियों के भी दांत खट्टे कर दिए थे।

भारत के सच्चे सपूत है हम, हमें दुनियाभर में इसका ढिंढोरा पीटने की ज़रूरत नहीं। हमने अपने दिलों में सबको स्थान दिया है लेकिन कितने बेशर्म हैं वो लोग जिन्हें आदिवासियो ने आश्रय दिया और वो इनकी ही जड़ें काटने में लगे हैं। इस देश के प्रथम वासी आदिवासी समुदाय की भाषाओं को दोयम दर्जे का बना दिया गया है। खिसियाहट ऐसी कि पहुंच गए अपना झंडा और काल्पनिक किताबें लेकर और अपनी घृणित योजनाओं को आदिवासियों के विरुद्ध इस्तेमाल करने!

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की राजनीति में बहुत अंतर है। इस देश का बड़ा हिस्सा कभी धर्म तो कभी जाति के आधार पर सरकार चुनता है। मैं डंके चोट पर कह सकता हूं कि वर्तमान सरकार भी अपने विशेष एजेंडे के कारण ही पूर्ण बहुमत में आई है।

ऐसे में देश की आबादी के 8% यानि कि जनजातियों के क्षेत्र में मौजूद नक्सलवाद और खनन के कारण वन क्षेत्रों से लोगों के विस्थापन को रोकना बहुत बड़ी चुनौती है। सरकार का एजेंडा सर्वहित का नहीं बल्कि धर्महित का है, जिससे इन जनजातियों से ज़रा भी मतलब नहीं।

वर्ण व्यवस्था से परे है आदिवासी समाज। होड़- होपोन समुदाय के लोगों को तथाकथित धार्मिक समुदायों से जोड़ना ठीक नहीं!  इनका ये सोचना कि इन्होंने इनके वजूद को ही मिटा दिया है, भ्रम में हैं ये लोग। जिस दिन ये जड़ें अपने वजूद से निकलकर ‘वटवृक्ष’ बनेंगी उस दिन भारत वास्तव में “भारत वर्ष” कहलाएगा। राजनीती और कूटनीति में यही तो होता आया है कि किसी को बर्बाद करना है तो उसे बदनाम कर दो। लेकिन इस बार यह इतना आसान नहीं होगा ‘होड़-होपोन’ समुदाय के लोग अब जागने लगे है। तीर के तीन किनारों की सौगंध इस बार हमारी बारी है, अब तीर भी हमारा होगा और कमान भी।

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