जिस देश मे गंगा बहती है

Posted by storyteller avanish
January 30, 2018

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नही नही ये बिल्कुल कोई धर्म विशेष से जुड़ा हुआ पोस्ट नही है ना ही यहाँ मैं गंगा की विशेषता बताने जा रहा हु जो कि वैसे भी अब दो चार हिमालय के करीब के शहरों को छोड़ के कही और नही दिखती,खैर ये जो लाइन है वो राज कपूर साहब की मूवी की लाइन है जो अभी चंद रोज पहले मैंने दूरदर्शन पे देखा(बेहोश होने की जरूरत नही है, आज भी बारिश होने पे केबल गायब हो जाता है)

इस गाने की पहली लाइन होंठो पे सच्चाई रहती है जहाँ दिल मे सफाई रहती है,मैं बड़ा असमंजस में पड़ा कि क्या आज के परिपेक्ष्य में लेखक ये लाइन लिखने की हिम्मत कर पाता शायद हा और नही भी….उस दौर में भी ऐसे बहुत से लोग होंगे जो इन शब्दों से इत्तेफाक न रखते हो और आज भी ऐसे बहुत से लोग होंगे जो इन्ही शब्दो पे जीते मरते है। मेरे ये विचार तब और मजबूत हो गए जब उस दिन एक ऐसा वाक़या हुआ मेरे साथ मेरे मुंह से बरबस ही निकल गया,”हम उस देश के वाशी है जिस देश मे गंगा बहती है।

हुआ यूं कि उस दिन जब मैं ऑफिस जा रहा था हमेशा की तरह ऑटो में 5 लोग थे,अभी ऑटो कुछ दूर बढ़ी होगी कि एक महाशय को उतरने की कुछ जल्दी थी और ऑटो पूरी रुकी भी नही थी वो पैसा दिए और बड़ी तेजी से दूसरी राह पे पैदल निकल पड़े। कुछ दूर बाद मेरा गंतव्य आ गया मैंने ऑटो रुकवाया,पैसा देखे बचे हुए वैसे लेने के लिये ड्राइवर महोदय की ओर देख ही रह था कि अचानक मैं देखता हूं कि उसके चेहरे का रंग उतर गया है मुझे लगा कहि ऐसा तो नही की 50रुपये के नोट बंद हो गए हो और मुझे पता न हो,मेरे पूछे बिना ही वो एक बाद कि ओर इशारा करते हुए बोल पड़ा,”पीछे जो भैया उतरे है वो अपना बैग यही भूल गए”

मेरे लिए ये नज़ारा बड़ा अनोखा मालूम हुआ कि सामान छूटने के बाद एक ऑटो वाला इतना परेशान है क्योंकि मेरे निजी अनुभव से मुझे तो इतना ही पता है कि ऑटो में मोबाइल/पर्स छूटने के बाद वो सीधे यमलोक में जमा हो जाता है जो वही जाने पे ही मिलेगा आप कितना ही ढूंढ लो और ऑटो वाला भी जरूर यमदूत रहा होगा क्योंकि वो भी नही मिलता ढूंढने पे।

अब ऑटो में थे चार लोग चारो ओर से सुझाव आ रहे थे,की कहि बम तो नही,कोई जरूरी सामान होगा,किसी ने कहा पुलिस के पास जमा कर देते है ये बाद ड्राइवर महोदय को बिल्कुल पसंद न आई कि पुलिस को ही देना है तो खुद ही न रख ले दोनों ही स्थितियों में समान उसके मालिक को नही मिलना है फिर कुछ सोच विचार के बाद एक भयंकर आईडिया आया ड्राइवर महोदय को जैसा कि रामायण में आया था सुग्रीव को लछमन शक्ति के वक़्त की क्यों ना वापस गाड़ी उसी दिशा में ले चले जिधर वो सामान का मालिक गया था हो न हो वो भी आस पास अपने सामान को ढूंढता होगा।

वैसे तो ये विचार बहुत ही सरल लग रहा होगा सुनने में लेकिन मामले के गहराई में जाईये आप ऑफिस का टाइम वो भी ऑटो रेलवे स्टेशन की ओर जा रही हो न जाने कितनों की ट्रेन होगी उसमे से और ऊपर से ये विचार आया भी ड्राइवर महाशय को और सबसे बड़ी बात किसी ने कोई आपत्ति नही जताई सबके बीच इस विचार को लेके आम सहमति बन गयी जो नीतीश और लालू के बीच न बन पाई नही तो अलग नज़ारा होता बिहार की राजनीति का खैर राजनीति की बाते किसी और दिन वापस आते है मूल बात पे ऑटो में बैठे सारे लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को ताखे पे रखते हुए वापस ऑटो ने यू टर्न लिया और चल दिया उस लावारिस सामान के मालिक को ढूंढने की ओर…….

ऑटो वाले उस आदमी को ढूंढ पाया नही पाया,सामान उस आदमी को मिला नही मिला लेकिन मुझे अपने सवाल का जवाब जरूर मिल गया और अब मैं बिना किसी असमंजस के ये गाना लाउडस्पीकर में बजा सकता हु ,”हम उस देश के बासी के है जिस देश मे गंगा बहती है”……

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